कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/नागरीदास की माधुर्य भक्ति


नागरीदास के उपास्य श्यामा-श्याम नित्य-किशोर ,अनादि ,एकरूप और रसिक हैं। ये सदा विहार में लीन रहते हैं। इनका यह विहार निजी सुख के लिए नहीं ,दूसरे की प्रसन्नता के लिए है। अतः यह विहार नितांत शुद्ध है। इसके आगे काम का सुख कुछ भी नहीं है :

राग रंग रस सुख बाढ्यो अति सोभा सिंध अपार।
विपुल प्रेम अनुराग नवल दोउ करत अहार विहार।।
श्री वृन्दाविपुन विनोद करत नित छिन छिन प्रति सुखरासि।
काम केलि माधुर्य प्रेम पर बलि बलि नागरिदासि।।

नागरीदास ने राधा-कृष्ण के इस नित्य-विहार का वर्णन विविध रूपों में किया है। निम्न पद में में राधा-कृष्ण के जल विहार का वर्णन दृष्टव्य है :

विहरत जमुना जल जुगराज।
श्री वृन्दाविपुन विनोद सहित नवजुवतिन जूथ समाज।।
छिरकत छैल परस्पर छवि सों सखी सम्पति साज।
नवल नागरीदास श्री नागर खेलत मिले चलै भाज।