कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/नेही नागरीदास का जीवन परिचय


भक्त कवियों में नागरीदास नाम के तीन कवि विख्यात हैं ,परन्तु राधा-वल्लभ सम्प्रदाय के नागरीदास जी के नाम के पूर्व नेही उपाधि के कारण आप अन्य कवियों से सहज ही अलग हो जाते हैं। नागरीदास जी का जन्म पँवार क्षत्रिय कुल में ग्राम बेरछा (बुन्देलखंड ) में हुआ था। इनके जन्म-संवत का निर्णय समसामयिक भक्तों के उल्लेख से ही किया जा सकता है। इस आधार पर नागरीदास जी जन्म-संवत १५९० के आसपास ठहरता है।

  • भक्ति की ओर नागरीदास जी की रूचि शैशव से ही थी। भक्त-जनों से मिलकर आपको अत्यधिक प्रसन्नता होती थी। एक बार सौभाग्य से स्वामी चतुर्भुजदास जी से आप का मिलाप हुआ। इनके सम्पर्क से रस-भक्ति का रंग नागरीदास जी को लगा और ये घर -परिवार छोड़कर वृन्दावन चले आये। यहाँ आकर आपने वनचंद स्वामी से दीक्षा ली ।

इस प्रकार रस-भक्ति में इनका प्रवेश हुआ। नेही नागरीदास जी हितवाणी और नित्य विहार में अनन्य निष्ठां थी। वे हितवाणी के अनुशीलन में इतने लीन रहते की उन्हें अपने चारों ओर के वातावरण का भी बोध न रहता। परन्तु इस प्रकार के सरल और अनन्य भक्त से भी कुछ द्वेष किया और इन्हें विवस होकर वृन्दावन छोड़ बरसाने जाना पड़ा।इस बात का उल्लेख नागरीदास जी ने स्वयं किया है :

जिनके बल निधरक हुते ते बैरी भये बान।
तरकस के सर साँप ह्वै फिरि-फिरि लागै खान।।