देशप्रेम की कविताएं/भारती जय विजय करे - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

भारति, जय, विजयकरे ![१]

कनक-शस्य-कमलधरे !

लंका पदतल शतदल
 गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
 स्तव कर बहु-अर्थ-भरे ।

 तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
 धवल धार हार गले ।

 मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
 प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे !

संदर्भसंपादित करें

  1. कविता कोश-भारति, जय, विजय करे