द्विवेदीमंडल के बाहर की काव्यभूमि

द्विवेदीजी के प्रभाव से हिन्दी काव्य ने जो स्वरूप प्राप्त किया उसके अतिरिक्त और अनेक रूपों में भी भिन्न भिन्न कवियों की काव्यधारा चलती रही। कई एक बहुत अच्छे कवि अपने अपने ढंग पर सरस और प्रभावपूर्ण कविता करते रहे जिनमें मुख्य राय देवी प्रसाद 'पूर्ण', पं. नाथूरामशंकर शर्मा, पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', पं. सत्यनारायण कविरत्न, लाला भगवानदीन, पं. रामनरेश त्रिपाठी, पं. रूपनारायण पांडेयहैं। इन कवियों में से अधिकांश तो दोरंगी कवि थे, जो ब्रजभाषा में तो श्रृंगार, वीर, भक्ति आदि की पुरानी परिपाटी की कविता कवित्त-सवैयों या गेय पदों में करते आते थे और खड़ी बोली में नूतन विषयों को लेकर चलते थे। बात यह थी कि खड़ी बोली का प्रचार बराबर बढ़ता दिखाई पड़ता था और काव्य के प्रवाह के लिए कुछ नई नई भूमियाँ भी दिखाई पड़ती थीं। देशदशा, समाजदशा, स्वदेशप्रेम, आचरणसंबंधी उपदेश आदि ही तक नई धारा की कविता न रहकर जीवन के कुछ और पक्षों की ओर भी बढ़ी, पर गहराई के साथ नहीं। त्याग, वीरता, उदारता, सहिष्णुता इत्यादि के अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंग पद्यबद्ध हुए जिनके बीच बीच में जन्मभूमि प्रेम, स्वजाति गौरव आत्मसम्मान की व्यंजना करने वाले जोशीले भाषण रखे गए। जीवन की गूढ़, मार्मिक या रमणीय प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ी। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने कुछ ध्यान कल्पित प्रबंध की ओर दिया।

दार्शनिकता का पुट राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' की रचनाओं में कहीं कहीं दिखाई पड़ता है, पर किसी दार्शनिक तथ्य को हृदयग्राह्य रसात्मक रूप देने का प्रयास उनमें भी नहीं पाया जाता। उनके 'वसंतवियोग' में भारतदशासूचक प्राकृतिक विभूति के नाना चित्रों के बीच बीच में कुछ दार्शनिक तत्व रखे गए हैं और अंत में आकाशवाणी द्वारा भारत के कल्याण के लिए कर्मयोग और भक्ति का उपदेश दिलाया गया है। प्रकृतिवर्णन की ओर हमारा काव्य कुछ अधिक अग्रसर हुआ पर प्राय: वहीं तक रहा जहाँ तक उसका संबंध मनुष्य के सुख सौंदर्य की भावना से है। प्रकृति के जिन सामान्य रूपों के बीच नरजीवन का विकास हुआ है, जिन रूपों से हम बराबर घिरे रहते आए हैं उनके प्रति वह राग या ममता न व्यक्त हुई जो चिर सहचरों के प्रति स्वभावत: हुआ करती है। प्रकृति के प्राय: वे ही चटकीले भड़कीले रूप लिए गए जो सजावट के काम के समझे गए। सारांश यह कि जगत और जीवन के नानारूपों और तथ्यों के बीच हमारे हृदय का प्रसार करने में वाणी वैसी तत्पर न दिखाई पड़ी। 8. राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' , पूर्णजी का उल्लेख 'पुरानी धारा' के भीतर हो चुका है। वे ब्रजभाषा काव्य परंपरा के बहुत ही प्रौढ़ कवि थे और जब तक जीवित रहे, अपने 'रसिक समाज' द्वारा उस परंपरा की पूरी चहल पहल बनाए रहे। उक्त समाज की ओर से 'रसिक वाटिका' नाम की एक पत्रिका निकली थी जिसमें उस समय के प्राय: सब व्र्रजभाषा कवियों की सुंदर रचनाएँ छपती थीं। जब संवत् 1977 में पूर्णजी का देहावसान हुआ उस समय उक्त समाज निरवलंब सा हो गया, और ,

रसिक समाजी ह्वै चकोर चहुँ ओर हेरैं,

कविता को पूरन कलानिधि कितै गयो। (रतनेश)

पूर्णजी सनातनधर्म के बड़े उत्साही अनुयायी तथा अध्ययनशील व्यक्ति थे। उपनिषद् और वेदांत में उनकी अच्छी गति थी। सभा समाजों के प्रति उनका बहुत उत्साह रहता था और उसके अधिावेशनों में वे अवश्य कोई न कोई कविता पढ़ते थे। देश में चलनेवाले आंदोलनों (जैसे , स्वदेशी) को भी उनकी वाणी प्रतिध्वनित करती थी। भारतेंदु, प्रेमघन आदि प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्णजी में भी देशभक्ति और राजभक्ति का समन्वय पाया जाता है। बात यह है कि उस समय तक देश के राजनीतिक प्रयत्नों में अवरोधा या विरोध का बल नहीं आया था और लोगों की पूरी तरह धाड़क नहीं खुली थी। अत: उनकी रचना में यदि एक ओर 'स्वदेशी' पर देशभक्तिपूर्ण पद्य मिलें और दूसरी ओर सन् 1911 वाले दिल्ली दरबार के ठाटबाट का वर्णन, तो आश्चर्य न करना चाहिए। प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्णजी पहले नूतन विषयाेंे की कविता भी ब्रजभाषा में करते थे, जैसे ,

विगत आलस की रजनी भई। रुचिर उद्यम की द्युति छै गई

उदित सूरज है नव भाग को। अरुन रंग भये अनुराग को

तजि बिछौनन को अब भागिए। भरत खंड प्रजागण जागिए

इस प्रकार 'संग्रामनिंदा' आदि अनेक विषयों पर उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में ही हैं। पीछे खड़ी बोली की कविता का प्रचार बढ़ने पर बहुत सी रचना उन्होंने खड़ी बोली में भी की, जैसे , 'अमलतास', 'वसंतवियोग', 'स्वदेशी कुंडल', 'नए सन् (1910) का स्वागत', 'नवीन संवत्सर (1967) का स्वागत' इत्यादि। 'स्वदेशी', 'देशोध्दार' आदि पर उनकी अधिकांश रचनाएँ इतिवृत्तात्मक पद्यों के रूप में हैं। 'वसंतवियोग' बहुत बड़ी कविता है जिसमें कल्पना अधिक सचेष्ट मिलती है। उसमें भारतभूमि की कल्पना एक उद्यान के रूप में की गई है। प्राचीनकाल में यह उद्यान सत्वगुणप्रधान तथा प्रकृति की सारी विभूतियों से सम्पन्न था और इसके माली देवतुल्य थे। पीछे मालियों के प्रमाद और अनैक्य से उद्यान उजड़ने लगता है। यद्यपि कुछ यशस्वी महापुरुष (विक्रमादित्य ऐसे) कुछ काल के लिए उसे सँभालते दिखाई पड़ते हैं, पर उसकी दशा गिरती ही जाती है। अंत में उसके माली साधना और तपस्या के लिए कैलास मानसरोवर की ओर जाते हैं जहाँ आकाशवाणी होती है कि विक्रम की बीसवीं शताब्दी में जब 'पच्छिमी शासन' होगा तब उन्नति का आयोजन होगा। 'अमलतास' नाम की छोटी सी कविता में कवि ने अपने प्रकृति निरीक्षण का भी परिचय दिया है। ग्रीष्म में जब वनस्थली के सारे पेड़ पौधो झुलसे से रहते हैं और कहीं प्रफुल्लता नहीं दिखाई देती है, उस समय अमलतास चारों ओर फूलकर अपनी पीतप्रभा फैला देता है। इससे कवि भक्ति के महत्व का संकेत ग्रहण करता है ,

देख तव वैभव, द्रुमकुल संत! बिचारा उसका सुखद निदान।

करे जो विषम काल को मंद, गया उस सामग्री पर ध्यान

रँगा निज प्रभु ऋतुपति के रंग, द्रुमों में अमलतास तूभक्त।

इसी कारण निदाघ प्रतिकूल, दहन में तेरे रहा अशक्त

पूर्णजी की कविताओं का संग्रह 'पूर्ण संग्रह' के नाम से प्रकाशित हो चुकाहै। उनकी खड़ी बोली की रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं ,

नंदन वन का सुना नहीं है किसने नाम।

मिलता है जिसमें देवों को भी आराम

उसके भी वासी सुखरासी, उग्र हुआ यदि उनका भाग।

आकर के इस कुसुमाकर में, करते हैं नंदन रुचि त्याग

है उत्तर में कोट शैल सम तुंग विशाल।

विमल सघन हिमवलित ललित धावलित सब काल

हे नरदक्षिण! इसके दक्षिण-पश्चिम, पूर्व।

है अपार जल से परिपूरित कोश अपूर्व

पवन देवता गगन पंथ से सुघन घटों में लाकरनीर।

सींचा करते हैं यह उपवन करके सदा कृपागंभीर

कर देते हैं बाहर भुनगों का परिवार।

तब करते हैं कीश उदुंबर का आहार

पक्षीगृह विचार तरुगण को नहीं हिलाते हैं गजवृंद।

हंस भृंग हिंसा के भय से छाते नहीं बंद अरविंद

धोनुवत्स जब छक जाते हैं पीकर क्षीर,

तब कुछ दुहते हैं गौओं को चतुर अहीर।

लेते हैं हम मधुकोशों से मधु जो गिरे आप ही आप।

मक्खी तक निदान इस थल की पाती नहीं कभी संताप

(वसंतवियोग)

सरकारी कानून का रखकर पूरा ध्यान।

कर सकते हो देश का सभी तरह कल्यान

सभी तरह कल्यान देश का कर सकते हो।

करके कुछ उद्योग सोग सब हर सकते हो

जो हो तुममें जान, आपदा भारी सारी।

हो सकती है दूर, नहीं बाधा सरकारी

पं. नाथूराम शंकर शर्मा

सम्पादन

इनका जन्म संवत् 1916 में और मृत्यु 1989 में हुई। वे अपना उपनाम 'शंकर' रखते थे और पद्यरचना में अत्यंत सिद्ध हस्त थे। पं. प्रतापनारायण मिश्र के वे साथियों में थे और उस समय के कवि समाजों में बराबर कविता पढ़ा करते थे। समस्यापूर्ति वे बड़ी ही सटीक और सुंदर करते थे जिनसे उनका चारों ओर पदक, पगड़ी, दुशाले आदि से सत्कार होता था। 'कवि व चित्रकार', 'काव्यसुधाकर', 'रसिक मित्र' आदि पत्रों में उनकी अनूठी पूर्तियाँ और ब्रजभाषा की कविताएँ बराबर निकला करती थीं। छंदों के सुंदर नपे तुले विधान के साथ ही उनकी उद्भावनाएँ भी बड़ी अनूठी होती थीं। वियोग का यह वर्णन पढ़िए ,

शंकर नदी नद नदीसन के नीरन की

भाप बन अंबर तें ऊँची चढ़ जाएगी।

दोनों ध्रुव छोरन लौं पल में पिघल कर

घूम घूम धारनी धुरी सी बढ़ जाएगी

झारेंगे अंगारे ये तरनि तारे तारापति

जारैंगे खमंडल में आग मढ़ जाएगी।

काहू बिधि विधि की बनावट बचैगी नाहिं

जो पै वा वियोगिनी की आह कढ़ जाएगी

पीछे खड़ी बोली का प्रचार होने पर वे उसमें बहुत अच्छी रचना करने लगे। उनकी पदावली कुछ उद्दंडता लिए होती थी। इसका कारण यह है कि उनका संबंध आर्यसमाज से रहा जिसमें अंधाविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के उग्र विरोध की प्रवृत्ति बहुत दिनों तक जागृत रही। उसकी अंतर्वृत्तिा का आभास उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है। 'गर्भरंडा रहस्य' नामक एक बड़ा प्रबंधकाव्य उन्होंने विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देवमंदिरों के अनाचार आदि दिखाने के उद्देश्य से लिखा था। उसका एक पद्य देखिए ,

फैल गया हुड़दंग होलिका की हलचल में।

फूल फूल कर फाग फला महिला मंडलमें

जननी भी तज लाज बनी ब्रजमक्खी सबकी।

पर मैं पिंड छुड़ाय जवनिका में जा दबकी

फबतियाँ और फटकार इनकी कविताओं की एक विशेषता है। फैशन वालों पर कही हुई 'ईश गिरिजा को छोड़ि ईशु गिरिजा में जाय' वाली प्रसिद्ध फबती इन्हीं की है। पर जहाँ इनकी चित्तवृत्ति दूसरे प्रकार की रही है, वहाँ की उक्तियाँ बड़ी मनोहर भाषा में है। यह कवित्त ही लीजिए ,

तेज न रहेगा तेजधाारियों का नाम को भी,

मंगल मयंक मंद मंद पड़ जायँगे।

मीन बिन मारे मर जायँगे सरोवर में,

डूब डूब 'शंकर' सरोज सड़ जायँगे

चौंक चौंक चारों ओर चौकड़ी भरेंगे मृग,

खंजन खिलाड़ियों के पंख झड़ जायँगे।

बोलो इन अंखियों की होड़ करने को अब,

विस्व से अड़ीले उपमान अड़ जायँगे

पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'

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ये हिन्दी के एक बड़े ही भावुक और सरसहृदय कवि हैं। ये पुरानी और नई दोनों चाल की कविताएँ लिखते हैं। इनकी बहुत सी कविताएँ 'त्रिाशूल' के नाम से निकली हैं। उर्दू कविता भी इनकी बहुत ही अच्छी होती है। इनकी पुरानी ढंग की कविताएँ 'रसिकमित्र', 'काव्यसुधानिधि' और 'साहित्यसरोवर' आदि में बराबर निकलती रहीं। पीछे इनकी प्रवृत्ति खड़ी बोली की ओर हुई। इनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं , 'प्रेमपचीसी', 'कुसुमांजलि', 'कृषकक्रंदन'। इस मैदान में भी इन्होंने अच्छी सफलता पाई। एक पद्य नीचे दिया जाता है ,

तू है गगन विस्तीर्ण तो मैं एक तारा क्षुद्र हूँ।

तू है महासागर अगम, मैं एक धारा क्षुद्र हूँ

तू है महानद तुल्य तो मैं एक बूँद समान हूँ।

तू है मनोहर गीत तो मैं एक उसकी तान हूँ

पं. रामनरेश त्रिपाठी

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त्रिपाठीजी का नाम भी खड़ी बोली के कवियों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। भाषा की सफाई और कविता के प्रसादगुण पर इनका बहुत जोर रहता है। काव्यभाषा में लाघव के लिए कुछ कारक चिद्दों और संयुक्त क्रियाओं के कुछ अंतिम अवयवों को छोड़ना भी (जैसे 'कर रहा है' के स्थान पर 'कर रहा' या करते हुए' के स्थान पर 'करते') ये ठीक नहीं समझते। काव्यक्षेत्र में जिस स्वाभाविक स्वच्छंदता (रोमांटिसिज्म) का आभास पं. श्रीधार पाठक ने दिया था उसके पथ पर चलनेवाले द्वितीय उत्थान में त्रिपाठीजी ही दिखाई पड़े। 'मिलन', 'पथिक' और 'स्वप्न' नामक इनके तीनों खंडकाव्यों में इनकी कल्पना ऐसे मर्मपथ पर चलती है जिसपर मनुष्य मात्र का हृदय स्वभावत: ढलता आया है। ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओं के भीतर न बँधाकर अपनी भावना के अनुकूल स्वच्छंद संचरण के लिए कवि ने नूतन कथाओं की उद्भावना की है। कल्पित आख्यानों की ओर यह विशेष झुकाव स्वच्छंद मार्ग का अभिलाष सूचित करता है। इन प्रबंधों में नरजीवन जिन रूपों में ढालकर सामने लाया गया है, ये मनुष्यमात्र का मर्मस्पर्श करने वाले हैं तथा प्रकृति के स्वच्छंद और रमणीय प्रसार के बीच अवस्थित होने के कारण शेष सृष्टि से विच्छिन्न नहीं प्रतीत होते।

स्वदेशभक्ति की जो भावना भारतेंदु के समय से चली आती थी उसे सुंदर कल्पना द्वारा रमणीय और आकर्षक रूप त्रिपाठीजी ने ही प्रदान किया। त्रिपाठीजी के उपर्युक्त तीनों काव्य देशभक्ति के भाव से प्रेरित हैं। देशभक्ति का यह भाव उनके मुख्य पात्रों को जीवन के कई क्षेत्रों में सौंदर्य प्रदान करता दिखाई पड़ता है , कर्म के क्षेत्र में भी, प्रेम के क्षेत्र में भी। ये पात्र कई तरफ से देखने में सुंदर लगते हैं। देशभक्ति को रसात्मक रूप त्रिपाठीजी द्वारा प्राप्त हुआ, इसमें संदेह नहीं।

त्रिपाठीजी ने भारत के प्राय: सब भागों में भ्रमण किया है, इससे इनके प्रकृतिवर्णन में स्थानगत विशेषताएँ अच्छी तरह आ सकी हैं। इनके 'पथिक' में दक्षिण भारत के रम्य दृश्यों का बहुत विस्तृत समावेश है। इसी प्रकार इनके 'स्वप्न' में उत्ताराखंडऔर कश्मीर की सुषमा सामने आती है। प्रकृति के किसी खंड के संश्लिष्ट चित्रण की प्रतिभा इनमें अच्छी है। सुंदर आलंकारिक साम्य खड़ा करने में भी इनकी कल्पना प्रवृत्त होती है पर झूठे आरोपों द्वारा अपनी उड़ान दिखाने या वैचित्रय खड़ा करने के लिए नहीं।

'स्वप्न' नामक खंड काव्य तृतीय उत्थान काल के भीतर लिखा गया है जबकि 'छायावाद' नाम की शाखा चल चुकी थी, इससे उस शाखा का भी रंग कहीं कहीं इसके भीतर झलक मारता है, जैसे ,

प्रिय की सुधिसी ये सरिताएँ, ये कानन कांतार सुसज्जित।

मैं तो नहीं किंतु है मेरा हृदय किसी प्रियतम से परिचित।

जिसके प्रेमपत्र आते हैं प्राय: सुखसंवाद सन्निहित

अत: इस काव्य को लेकर देखने से थोड़ी थोड़ी इनकी सब प्रवृत्तियाँ झलक जाती हैं। इसके आरंभ में हम अपनी प्रिया में अनुरक्त वसंत नामक एक सुंदर और विचारशील युवक को जीवन की गंभीर वितर्कदशा में पाते हैं। एक ओर उसे प्रकृति की प्रमोदमयी सुषमाओं के बीच प्रियतमा के साहचर्य का प्रेमसुख लीन रखना चाहता है, दूसरी ओर समाज के असंख्य प्राणियों का कष्ट क्रंदन उसे उध्दार के लिए बुलाता जान पड़ता है। दोनों पक्षों के बहुत से सजीव चित्र बारी बारी से बड़ी दूर तक चलते हैं। फिर उस युवक के मन में जगत् और जीवन के संबंध में गंभीर जिज्ञासाएँ उठती हैं। जगत् के इस नाना रूपों का उद्गम कहाँ है? सृष्टि के इन व्यापारों का अंतिम लक्ष्य क्या है? यह जीवन हमें क्यों दिया गया है? इसी प्रकार के प्रश्न उसे व्याकुल करते रहते हैं और कभी कभी वह सोचता है ,

इसी तरह की अमित कल्पना के प्रवाह में मैं निशिवासर,

बहता रहता हूँ विमोहवश; नहीं पहुँचता कहीं तीर पर।

रात दिवस ही बूँदों द्वारा तन घट से परिमित यौवन जल;

है निकला जा रहा निरंतर, यह रुक सकता नहीं एक पल

कभी कभी उसकी वृत्ति रहस्योन्मुख होती है, वह सारा खेल खड़ा करने वाले उस छिपे हुए प्रियतम का आकर्षण अनुभव करता है और सोचता है कि मैं उसके अन्वेषण में क्यों न चल पड़न्नँ। उसकी प्रिया सुमना उसे दिन रात इस प्रकार भावनाओं में ही मग्न और अव्यवस्थित देखकर कर्म मार्ग पर स्थिर हो जाने का उपदेश देती है ,

सेवा है महिमा मनुष्य की, न कि अति उच्च विचार द्रव्य बल।

मूल हेतु रवि के गौरव का है प्रकाश ही न कि उच्च स्थल

मन की अमित तरंगों में तुम खोते हो इस जीवन का सुख

इसके उपरांत देश पर शत्रु चढ़ाई करता है और राजा उसे रोकने में असमर्थ होकर घोषणा करता है कि प्रजा अपनी रक्षा कर ले। इसपर देश के झुंड के झुंड युवक निकल पड़ते हैं और उनकी पत्नियाँ और माताएँ गर्व से फूली नहीं समाती हैं। देश की इस दशा में वसंत को घर में पड़ा देख उसकी पत्नी सुमना को अत्यंत लज्जा होती है और वह अपने पति से स्वदेश के इस संकट के समय शस्त्रा ग्रहण करने को कहती है। जब वह देखती है कि उसका पति उसी के प्रेम के कारण नहीं उठता है तब वह अपने को ही प्रिय केर् कत्ताव्यपथ का बाधक समझती है। वह सुनती है कि एक रुग्णा वृध्दा यह देखकर कि उसका पुत्र उसी की सेवा के ध्यान से युद्ध पर नहीं जाता है, अपना प्राण त्याग कर देती है। अंत में सुमना अपने को वसंत के सामने से हटाना ही स्थिर करती है और चुपचाप घर से निकल पड़ती है। वह पुरुष वेष में वीरों के साथ सम्मिलित होकर अत्यंत पराक्रम के साथ लड़ती है। उधर वसंत उसके वियोग में प्रकृति के खुले क्षेत्र में अपनी प्रेम वेदना की पुकार सुनाता फिरता है, पर सुमना उस समय प्रेमक्षेत्र से दूर थी ,

अर्ध्द निशा में तारागण से प्रतिबिंबित अति निर्मल जलमय।

नीलझील के कलित कूल पर मनोव्यथा का लेकर आश्रय

नीरवता में अंतस्तल का मर्म करुण स्वर लहरी में भर।

प्रेम जगाया करता था वह विरही विरह गीत गा गा कर

भोजपत्र पर विरहव्यथामय अगणित प्रेमपत्र लिख लिखकर।

डाल दिए थे उसने गिरि पर, नदियों के तट पर, वनपथ पर

पर सुमना के लिए दूर थे ये वियोग के दृश्य कदंबक।

और न विरही की पुकार ही पहुँच सकी उसके समीप तक

अंत में वसंत एक युवक (वास्तव में पुरुष वेष में सुमना) के उद्बोधा से निकल पड़ता है और अपनी अद्भुत वीरता द्वारा सबका नेता बनकर विजय प्राप्त करता है। राजा यह कहकर कि 'जो देश की रक्षा करे वही राजा' उसको राज्य सौंप देता है। उसी समय सुमना भी उसके सामने प्रकट हो जाती है।

स्वदेशभक्ति की भावना कैसे मार्मिक और रसात्मक रूप में कथा के भीतर व्यक्त हुई है, यह उपर्युक्त सारांश द्वारा देखा जा सकता है। जैसाकि हम पहले कह आए हैं त्रिपाठीजी की कल्पना मानवहृदय के सामान्य मर्मपथ पर चलनेवाली है। इनका ग्रामगीत संग्रह करना इस बात को और भी स्पष्ट कर देता है। अत: त्रिपाठीजी हमें स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के प्रकृत पथ पर दिखाई पड़ते हैं। इनकी रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं ,

चारु चंद्रिका से आलोकित विमलोदक सरसी के तट पर,

बौरगंधा से शिथिल पवन में कोकिल का आलाप श्रवण कर।

और सरक आती समीप है प्रमदा करती हुई प्रतिध्वनि;

हृदय द्रवित होता है सुनकर शशिकर छूकर यथा चंद्रमणि

किंतु उसी क्षण भूख प्यास से विकल वस्त्र वंचित अनाथगण,

'हमें किसी की छाँह चाहिए' कहते चुनते हुए अन्नकण,

आ जाते हैं हृदय द्वार पर, मैं पुकार उठता हूँ तत्क्षण ,

हाय! मुझे धिाक् है जो इनका कर न सका मैं कष्टनिवारण।

उमड़घुमड़ कर जब घमंड से उठता है सावन में जलधार,

हम पुष्पित कदंब के नीचे झूला करते हैं प्रतिवासर।

तड़ित्प्रभा या घनगर्जन से भय या प्रेमोद्रेक प्राप्त कर,

वह भुजबंधान कस लेती है, यह अनुभव है परम मनोहर।

किंतु उसी क्षण वह गरीबिनी, अति विषादमय जिसके मँहपर,

घुने हुए छप्पर की भीषण चिंता के हैं घिरे वारिधार,

जिसका नहीं सहारा कोई, आ जाती है दृग के भीतर,

मेरा हर्ष चला जाता है एक आह के साथ निकल कर

(स्वप्न)

प्रतिक्षण नूतन भेष बनाकर रंगबिरंग निराला।

रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिदमाला

नीचे नील समुद्र मनोहर ऊपर नील गगन है।

घन पर बैठ बीच में बिचरूँ, यही चाहता मन है

सिंधुविहंग तरंग पंख को फड़का कर प्रतिक्षण में।

है निमग्न नित भूमि अंड के सेवन में, रक्षण में

(पथिक)

मेरे लिए खड़ा था दुखियों के द्वार पर तू।

मैं बाट जोहता था तेरी किसी चमन में।

बनकर किसी के ऑंसू मेरे लिए बहा तू।

मैं देखता तुझे था माशूक के वदन में

(फुटकल)

स्वर्गीय लाला भगवानदीन

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दीनजी के जीवन का प्रारंभिक काल उस बुंदेलखंड में व्यतीत हुआ था जहाँ देश की परंपरागत पुरानी संस्कृति अभी बहुत कुछ बनी हुई है। उनकी रहन सहन बहुत सादी और उनका हृदय सरल और कोमल था। उन्होंने हिन्दी के पुराने काव्यों का नियमित रूप में अध्ययन किया था इससे वे ऐसे लोगों से कुढ़ते थे जो परंपरागत हिन्दी साहित्य की कुछ भी जानकारी प्राप्त किए बिना केवल थोड़ी सी अंग्रेजी शिक्षा के बल पर हिन्दी कविताएँ लिखने लग जाते थे। बुंदेलखंड में शिक्षित वर्ग के बीच और सर्वसाधारण में भी हिन्दी कविता का सामान्य रूप में प्रचार चला आ रहा है। ऋतुओं के अनुसार जो त्योहार और उत्सव रखे गए हैं, उनके आगमन पर वहाँ लोगों में अब भी प्राय: वही उमंग दिखाई देती है। विदेशी संस्कारों के कारण वह मारी नहीं गई है। लाला साहब वही उमंगभरा हृदय लेकर छतरपुर से काशी आ रहे। हिन्दी शब्दसागर के संपादकों में एक वे भी थे। पीछे हिंदू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक हुए। हिन्दी साहित्य की व्यवस्थित रूप से शिक्षा देने के लिए काशी में उन्होंने एक साहित्य विद्यालय खोला जो उन्हीं के नाम से अब तक बहुत अच्छे ढंग पर चला जा रहा है। कविता में वे अपना उपनाम 'दीन' रखते थे।

लालाजी का जन्म संवत् 1924 (अगस्त 1866) में और मृत्यु 1987 (जुलाई,1930) में हुई।

पहले वे ब्रजभाषा में पुराने ढंग की कविता करते थे, पीछे 'लक्ष्मी' के संपादक हो जाने पर खड़ी बोली की कविताएँ लिखने लगे। खड़ी बोली में उन्होंने वीरों के चरित्र लेकर बोलचाल की कड़कड़ाती भाषा में जोशीली रचना की है। खड़ी बोली की कविताओं का तर्ज उन्होंने प्राय: मुंशियाना ही रखा था। बद्द या छंद भी उर्दू के रखते थे और भाषा में चलते अरबी या फारसी शब्द भी लाते थे। इस ढंग से उनके तीन काव्य निकले हैं , 'वीर क्षत्राणी', 'वीर बालक' और 'वीर पंचरत्न'। लालाजी पुराने हिन्दी काव्य और साहित्य के अच्छे मर्मज्ञ थे। बहुत से प्राचीन काव्यों की नए ढंग की टीकाएँ करके उन्होंने अध्ययन के अभिलाषियों का बड़ा उपकार किया है। रामचंद्रिका, कविप्रिया, दोहावली, कवितावली, बिहारी सतसई आदि की इनकी टीकाओं ने विद्यार्थियों के लिए अच्छा मार्ग खोल दिया। भक्ति और श्रृंगार की पुराने ढंग की कविताओं में उक्ति चमत्कार वे अच्छा लाते थे।

उनकी कविताओं के दोनों तरह के नमूने नीचे देखिए ,

सुनि मुनि कौसिक तें साप को हवाल सब,

बाढ़ी चित करुना की अजब उमंग है।

पदरज डारि करे पाप सब छारि,

करि नवल सुनारि दियो धामहू उतंग है।

'दीन' भनै ताहि लखि जात पतिलोक,

ओर उपमा अभूत को सुझानों नयो ढंग है।

कौतुकनिधान राम रज की बनाय रज्जु,

पद तें उड़ाई ऋषिपतिनीपतंग है

वीरों की सुमाताओं का यश जो नहींगाता।

वह व्यर्थ सुकवि होने का अभिमान जनाता

जो वीरसुयश गाने में है ढील दिखाता।

वह देश के वीरत्व का है मान घटाता

सब वीर किया करते हैं सम्मान कलम का।

वीरों का सुयशगान है अभिमान कलम का

इनकी फुटकल कविताओं का संग्रह 'नवीन बीन' या 'नदीमें दीन' में है।

पं. रूपनारायण पांडेय

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पांडेयजी ने यद्यपि ब्रजभाषा में भी बहुत कुछ कविता की है, पर इधर अपनी खड़ी बोली की कविताओं के लिए ही ये अधिक प्रसिद्ध हैं। इन्होंने बहुत उपयुक्त विषय कविता के लिए चुने हैं और उनमें पूरी रसात्मकता लाने में समर्थ हुए हैं। इनके विषय के चुनाव में ही भावुकता टपकती है, जैसे , दलित कुसुम, वनविहंगम, आश्वासन। इनकी कविताओं का संग्रह 'पराग' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। पांडेयजी की 'वनविहंगम' नाम की कविता में हृदय की विशालता और सरसता का बहुत अच्छा परिचय मिलता है। 'दलित कुसुम' की अन्योक्ति भी बड़ी हृदयग्राहिणी है। संस्कृत और हिन्दी दोनों के छंदों में खड़ी बोली को इन्होंने बड़ी सुघड़ाई से ढाला है। यहाँ स्थानाभाव से हम दो ही पद उध्दृत कर सकते हैं ,

अहह! अधम ऑंधाी, आ गई तू कहाँ से?

प्रलय घनघटासी छा गई तू कहाँ से?

परदुखसुख तू ने, हा! न देखा न भाला।

कुसुम अधाखिला ही, हाय! यों तोड़ डाला

बन बीच बसे थे फँसे थे ममत्व में एक कपोत कपोती कहीं।

दिन रात न एक को दूसरा छोड़ता, ऐसे हिले मिले दोनों वहीं

बढ़ने लगा नित्य नया नया नेह, नईनई कामना होती रही।

कहने का प्रयोजन है इतना, उनके सुख की रही सीमा नहीं

पं. सत्यनारायण 'कविरत्न'

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खड़ी बोली की खरखराहट (जो तब तक बहुत कुछ बनी हुई थी) के बीच 'वियोगी हरि' के समान स्वर्गीय पं. सत्यनारायण 'कविरत्न' (जन्म संवत् 1936, मृत्यु 1975) भी ब्रज की मधुरवाणी सुनाते रहे। रीतिकाल के कवियों की परंपरा पर न चलकर वे या तो भक्तिकाल के कृष्णभक्त कवियों के ढंग पर चले हैं अथवा भारतेंदुकाल की नूतन कविता की प्रणाली पर। ब्रजभूमि, ब्रजभाषा और ब्रजपति का प्रेम उनके हृदय की संपत्ति थी। ब्रज के अतीत दृश्य उनकी ऑंखों में फिरा करते थे। इंदौर के पहले साहित्य सम्मेलन के अवसर पर ये मुझे वहाँ मिले थे। वहाँ की अत्यंत काली मिट्टी देख वे बोले, 'या माटी को तो हमारे कन्हैया न खाते'।

अंग्रेजी की ऊँची शिक्षा पाकर भी उन्होंने अपनी चाल ढाल ब्रजमंडल के ग्रामीण भलेमानसों की ही रखी। धोती, बगलबंदी और दुपट्टा, सिर पर एक गोल टोपी; यही उनका वेष रहता था। ये बाहर जैसे सरल और सादे थे, भीतर भी वैसे ही थे। सादापन दिखावे के लिए धारण किया हुआ नहीं है, स्वभावत: है, यह बात उन्हें देखते ही और उनकी बातें सुनते ही प्रकट हो जाती थी। बाल्यकाल से लेकर जीवनपर्यंत वे आगरा से डेढ़ कोस पर ताजगंज के पास धााँधाूपुर गाँव में ही रहे। उनका जीवन क्या था, जीवन की विषमता का एक छाँटा हुआ दृष्टांत था। उनका जन्म और बाल्यकाल, विवाह और गार्हस्थ, सब एक दुखभरी कहानी के संबद्ध खंड थे। वे थे ब्रजमाधुरी में पगे जीव, उनकी पत्नी थीं आर्यसमाज के तीखेपन में पली महिला। इस विषमता की विरसता बढ़ती ही गई और थोड़े ही अवस्था में कविरत्नजी की जीवन यात्रा समाप्त हो गई।

ब्रजभाषा की कविताएँ वे छात्राावस्था से ही लिखने लगे थे। वसंतागमन पर वर्षा के दिनों में वे रसिए आदि ग्रामगीत अपढ़ ग्रामीणों में मिलकर निस्संकोच गाते थे। सवैया पढ़ने का ढंग उनका ऐसा आकर्षक था कि सुननेवाले मुग्धा हो जाते थे। जीवन की घोर विषमताओं के बीच भी वे प्रसन्न और हँसमुख दिखाई देते थे। उनके लिए उनका जीवन ही एक काव्य था, अत: जो बातें प्रत्यक्ष उनके सामने आती थीं, उन्हें काव्य का रूप रंग देते उन्हें देर नहीं लगती थी। मित्रों के पास वे प्राय: पद्य में पत्र लिखा करते थे जिनमें कभी कभी उनके स्वभाव की झलक भी रहती थी, जैसे स्वर्गीय पद्मसिंहजी के पास भेजी हुई इस कविता में ,

जो मों सों हँसि मिलै होत मैं तासु निरंतर चेरो।

बस गुन ही गुन निरखत तिह मधिा सरल प्रकृति को प्रेरो

यह स्वभाव को रोग जानिए, मेरो बस कछु नाहीं।

नित नव विकल रहत याही सो सहृदय बिछुरन माहीं

सदा दारुयोषित सम बेबस आज्ञा मुदित प्रमानै।

कोरो सत्य ग्राम को वासी कहा 'तकल्लुफ' जानै

किसी का कोई अनुरोध टालना उनके लिए असंभव था। यह जानकर बराबर लोग किसी न किसी अवसर के उपयुक्त कविता बना देने की प्रेरणा उनसे किया करते थे और वे किसी को निराश न करते थे। उनकी वही दशा थी जो उर्दू के प्रसिद्ध शायर इंशा की लखनऊ दरबार में हो गई थी। इससे उनकी अधिकांश रचनाएँ सामयिक हैं और जल्दी में जोड़ी हुई प्रतीत होती हैं, जैसे , स्वामी रामतीर्थ, तिलक गोखले, सरोजिनी नायडू इत्यादि की प्रशस्तियाँ, लोकहितकर आयोजनों के लिए अपील (हिंदू विश्वविद्यालय के लिए लंबी अपील देखिए), दुख और अन्याय के निवारण के लिए पुकार (कुली प्रथा के विरुद्ध 'पुकार' देखिए)। उन्होंने जीती जागती ब्रजभाषा ली है। उनकी ब्रजभाषा उसी स्वरूप में बँधी न रहकर जो काव्यपरंपरा के भीतर पाया जाता है, बोलचाल के चलते रूपों को लेकर चली है। बहुत से ऐसे शब्द और रूपों का उन्होंने व्यवहार किया है जो परंपरागत काव्यभाषा में नहीं मिलते।

'उत्तररामचरित' और 'मालतीमाधव' के अनुवादों में श्लोकों के स्थान पर उन्होंने बड़े मधुर सवैये रखे हैं। मकाले के अंग्रेजी खंडकाव्य 'होरेशस' का पद्यबद्ध अनुवाद उन्होंने बहुत पहले किया था। कविरत्नजी की बड़ी कविताओं में 'प्रेमकली' और 'भ्रमरदूत' विशेष उल्लेख योग्य हैं। 'भ्रमरदूत' में यशोदा ने द्वारका में जा बसे हुए कृष्ण के पास संदेश भेजा है। उसकी रचना नंददास के 'भ्रमरगीत' के ढंग पर की गई है, पर अंत में देश की वर्तमान दशा और अपनी दशा का भी हलका सा आभास कवि ने दिया है। सत्यनारायण जी की रचना के कुछ नमूने देखिए ,

अलबेली कहु बेलि द्रुमन सों लिपटि सुहाई।

धाोयेधाोये पातन की अनुपम कमनाई

चातक शुक कोयल ललित बोलत मधुरे बोल।

कूकि कूकि केकी कलित कुंजन करत कलोल

निरखि घन की घटा।

लखि वह सुषमा जाल लाल निज बिन नंदरानी।

हरि सुधि उमड़ी घुमड़ी तन उर अति अकुलानी

सुधि बुधिा तजि माथौ पकरि, करि करि सोच अपार।

दृगजल मिस मानहु निकरि बही विरह की धार

कृष्ण रटना लगी।

कौने भेजौं दूत, पूत सों बिथा सुनावै।

बातन में बहराइ जाइ ताको यहँ लावै

त्यागि मधुपुरी को गयो छाँड़ि सबन के साथ।

सात समुंदर पै भयो दूर द्वारकानाथ

जाइगो को उहाँ?

नित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहुँ।

जीवन को आनंद न देख्यो जात यहाँ कहुँ

बढ़यो जथेच्छाचार कृत जहँ देखौ तहँ राज।

होत जात दुर्बल विकृत दिन दिन आर्यसमाज

दिनन के फेर सों।

जे तजि मातृभूमि सों ममता होत प्रवासी।

तिन्हैं बिदेसी तंग करत दै बिपदा खासी

नारीशिक्षा अनादरत जे लोग अनारी।

ते स्वदेश अवनति प्रचंड पातक अधिकारी

निरखि हाल मेरो प्रथम लेहु समुझि सब कोइ।

विद्याबल लहि मति परम अबला सबला होइ

लखौं अजमाइ कै।

(भ्रमरदूत)

भयो क्यों अनचाहत को संग?

सब जग के तुम दीपक, मोहन! प्रेमी हमहुँ पतंग

लखि तब दीपति, देहशिखा में निरत, बिरह लौं लागी।

खींचति आप सों आप उतहि यह, ऐसी प्रकृति अभागी

यद्यपि सनेह भरी तव बतियाँ, तउ अचरज की बात।

योग वियोग दोउन में इक सम नित्य जरावत गात

संदर्भ

1. संवत् 1967 में प्रकाशित हो गया।