शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/वैकल्पिक विकास रणनीति

आयात प्रतिस्थापक औद्योगिक नीति के अतिरिक्त आर्थिक विकास के दो और विकल्प प्रस्तुत किए गए। प्रथम, कृषि आधारित विकास की रणनीति जिसमें भारत तुलनात्मक लाभ की स्थिति में हो सकता था; और दूसरा, निर्यातोन्मुख औद्योगीकरण की नीति।

1. कृषि आधारित विकास की रणनीति (वकील-ब्रहमानन्दा मॉडल)

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कुछ विद्वानों का यह मानना था कि कृषि और उस पर आधारित उद्योग भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता के साधन हो सकते थे। कृषि से प्राप्त अतिरिक्त उत्पाद और आय का इस्तेमाल कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना में किया जा सकता था, जिसका महत्त्वपूर्ण लाभ कृषि में लगी अतिरिक्त जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध कराकर ग्रामीण गरीबी और बेरोजगारी को दूर किया जा सकता था। मेघनाद देसाई का मानना है कि वकील-ब्रहमानन्दा मॉडल जिसमें रोजगार और कृषि पर ज्यादा बल दिया गया था महालनोबिस मॉडल, जिसमें पूंजीगत वस्तुओं में आत्मनिर्भरता और कृषि की उपेक्षा की गई थी, से कहीं बेहतर साबित हो सकता था। उपभोक्ता वस्तुओं का ज्यादा उत्पादन ज्यादा रोजगार और निर्यात को बढ़ावा देता, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग के लिए आवश्यक पूंजीगत वस्तुओं के आयात के लिए अदायगी भी संभव होती।' परंतु कृषि आधारित विकास की रणनीति को अस्वीकार किए जाने के लिए भी तर्कों की कमी नहीं थी। लैटिन अमेरिका के लिए आर्थिक आयोग से जुड़ी रॉल प्रेबिश के शोध ने सुझाया कि प्रतिकूल व्यापार की शर्तें कृषि आधारित संवृद्धि को उस निर्यात आय को बढ़ाने से रोकती हैं जो कि उच्चतर संवृद्धि के लिए आवश्यक निवेश दर और निवेश वस्तुओं के आयात हेतु वित्त उपलब्ध कराने में सहायक होती हैं। साथ ही, भारत में कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी छिपी थी जिसमें अधिक लोगों को काम में लगाकर उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था। कृषि में संवृद्धि के लिए अतिरिक्त श्रम को यहां से निकालकर उद्योग में प्रतिस्थापित किया जाना था उच्च उत्पादकता वाले बीजों हेतु तकनीकी ज्ञान का अभाव था। कृषकों के पिछड़े दृष्टिकोण को बदलने की अति-आवश्यकता थी। बिना इन सुधारों के केवल भूमि सुधार तीव्र विकास नहीं दे सकते थे। भूमि सुधार पर जोर प्राय: समृद्धि में योगदान के बजाय समतावाद के वास्ते अधिक रहा। वस्तुत: ऐसा विश्वास था कि भूमि सुधार कृषकों की मनोवृति बदलने और आर्थिक संवृद्धि में योगदान देने के महत्त्वपूर्ण घटक हो सकते थे। परंतु दुर्भाग्यवश अल्पकाल में ऐसा हो न सका अतः प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता के बावजूद भावी योजनाओं में इसके प्रति उत्साह नहीं रहा; हालांकि कृषि आधारित विकास को एक सहायक रणनीति के रूप में साथ-साथ आजमाया जा सकता था, किंतु ऐसा लगता है कि भू-सुधारों की विफलता ने इसे आगे नहीं बढ़ने दिया।

2. निर्यातोन्मुख औद्योगीकरण नीति

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निर्यातोन्मुख औद्योगीकरण या निर्यात प्रेरित विकास नीति की अनुशंसा प्रारंभिक तौर पर किसी अर्थशास्त्री ने नहीं की क्योंकि विकसित देशों में उच्च स्तरीय संरक्षण विद्यमान था और निय्यात में अत्यधिक वृद्धि पर नई बाधाएं भी लागू की जा सकती थी। विश्व-अर्थव्यवस्था की उच्च वृद्धि दर के प्रति आशान्वित स के बजाय इसके विश्व युद्धों के अंतराल की अवधि की तरह मंदी में चले जाने की भी आशंका थी। विश्लेषकों को यह भी आशा नहीं थी कि अंतराष्ट्रीय व्यापार समझौते संरक्षणात्मक दबावों को निष्फल कर देंगे और संरक्षणात्मक उपायों सें कटौती से हमारा निर्यात बहुत बढ़ जाएगा। साथ हो, भारत में सीमित औद्योगिक आधार ने भी इस रणनीति को अपनाने की संभावनाओं पर विराम लगा दिया।


जगदीश भगवती का मानना है कि 1950 के दशक में विकास के संदर्भ में भारतीय सोच उत्कृष्ट थी। मुख्य उद्देश्य रोजगार बढ़ाकर गरीबी दूर करना था, यद्यपि सामाजिक क्षेत्र की भी उपेक्षा नहीं करनी थी। इसके लिए आवश्यक था कि संवृद्धि श्रम-केंद्रित हो; लेकिन 1960 के दशक के आते-आते विकास असफल होने लगा और इसके लिए निर्यात-प्रोत्साहन के बजाय आयात-प्रतिस्थापन की नीति को अपनाया जाना प्राथमिक रूप से जिम्मेंदार था। राज्य द्वारा उच्च लागत उत्पादन और हस्तक्षेप अपनाना, जिसका अर्थ था कि कृषि में समृद्धि के द्वारा मांग बढ़ाना सीमित था, और इसलिए बहुत अधिक विकास दर असंभव थी। भगवती का मानना है कि पूर्वी एशियाई देशों की नि्यात-उत्प्रेरित रणनोदि ने दशांया कि व्यापार अनिश्चित समय के लिए किकास दर बढ़ा सकता है, जो की उत्पादक किंतु तुलनात्मक रूप से सस्ते यंत्रों के आयात से संभव है। एक साक्षर श्रम-शक्ति ऐसी मशीनों के उत्पादन को आगे बढ़ा सकती है, और संवृद्धि के लाभ को भी विस्तारित कर सकती है। अमत्त्य सेन ने भी पूर्वी एशियाई मॉडल की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है यदि श्रम -बल साक्षर हो और उनकी बड़ी सहभागिता अर्थव्यवस्था में हो, किंतु भारत में भू-सुधारों और महिलाओं के सशक्तीकरण पर कम ध्यान दिया गया।

वस्तुत: पूर्वी एशियाई देशों ने भारत के साथ ही अपनी विकास यात्रा शुरू की, लेकिन नि्यात-प्रेरित तीव्र वृद्धि दर के सहारे तीन दशकों में ही विकसित देशों की श्रेणी में आकार खड़े हो गए थे, जबकि भारत अभी भी हिंदू संवृद्धि दर" (3-3.5 प्रतिशत) से ही जुझ रहा था। आपातकाल के बाद के बर्षों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत एक नए मॉडल की आर उन्मुख हुआ जिसमें आर्थिक विकास हेतु "राज्य और व्यापार" का गठबंधन शुरू हुआ। पुनर्वितरण से ज्यादा आर्थिक विकास पर बल दिया गया, बड़े उद्यमिया से गठबंधन किया, मजदूर विरोधी रवैया अपनाया, सार्वजनिक क्षेत्र के विकास पर लगाम लगाई और आर्थिक नियोजन का महत्त्व घटा। लोकतंत्र की विवशताओं के कारण इसे उजागर करना संभव नहीं था, लेकिन झुकाव वामपंथ से हटकर दक्षिणपंथ की ओर हुआ। 1980 में इंदिरा गांधी के दुबारा चुने जाने के बाद पहली प्राथमिकता बेहतर उत्पादन और आर्थिक विकास थी, जबकि इस समय तक "गरीबी हटाओ" की हवा निकल चुकी थी, भूमि -सुधारों में कठिनाई आ रही थी, समाजवाद निप्प्रभावी हो रहा था और विकास में अवरोध बन रहा था। दूसरी तरफ, 1960 के दशक में निजी उत्पादकों को समर्थन देने से हरित क्रांति हो गई थी और ऐसा अनुभव किया जा रहा था कि बड़े उद्यमियों को भी राज्य का समर्थन देने से औद्योगिक विकास में तेजी आएगी, मुद्रास्फीति कम होगी और अंतत: गरीबों को ही लाभ मिलेगा। अत: एक सक्रिय राज्य की जरूरत थी जो ज्यादा निवेश करे, पूंजी को ज्यादा समर्थन दे और श्रमिकों पर लगाम लगाए। इसके अनुरूप इंदिरा गांधी ने नीतिगत फैसले लिए। उद्यमियों पर नियंत्रण की कमी कर, उन्हें उन क्षेत्रों में प्रवेश दिया गया जो अभी तक सार्वजनिक क्षेत्र के लिए उपलब्ध थे, जैसे-रसायन, औपधि, सीमेंट और ऊर्जा आदि। उद्यमियों के लिए बैंकों से उदार शर्तों पर ऋण की व्यवस्था की गई। करों में राहत दी गई। सीधे जनता से संसाधन जुटाने की छूट भी दी। श्रम कानूनों में ढील और सब्सिडी में कटौती की गई। "काम के बदले अनाज कार्यक्रम" बंद कर दिया गया। 1981 में तेल की कीमतों में भारी वृद्धि तथा मशीनरी व प्रौद्योगिकी के आयात पर होने वाले खर्च के लिए भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 5 अरब डॉलर का ऋण लिया, और उन्हें इस बात के लिए संतुष्ट कर दिया कि भारत में निजी क्षेत्रों के माध्यम से आर्थिक विकास को तेज करने के लिए सरकार को ज्यादा निवेश की जरूरत है। इसी समय भारत में विदेशी सामान और निवेशकों के लिए दरवाजे खोल दिए गए। परिणामस्वरूप, सस्ते विदेशी सामान भारतीय बाजारों में छाने लगे। इससे घबराकर भारतीय उद्यमियों ने सरकार से संरक्षण की गुहार लगाई।


सरकार ने 1983-84 में पुन: आयात प्रतिबंध लगाए और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण का पूरा उपयोग किए बिना ही उस करार को समाप्त कर दिया। यह पूरी रणनीति भारतीय व्यापारियों को स्थापित करने की थी जो पूर्णता के साथ लागू नहीं हुई। अत: सीमित रूप में भारत में इस अवधि में व्यापारवादी नीति अपनाई गई। अतुल कोहली ने लिखा है, 1950 से 80 के दौरान विकास की गति इसलिए धीमी नहीं रही कि राज्य ने "बाजारवादी मॉडल" नहीं अपनाया, बल्कि इसलिए कि "राज्यवादी मॉडल" के अनुरूप राज्य का पर्याप्त हस्तक्षेप नहीं था। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत भारतीय राज्य नीतियों को लागू करने में उस हद् उत्पीड़क नहीं हो सकता जैसा कि सत्तावादी पूर्वी एशियाई देशों के अनुभव से हमें पता चलता है। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में मिले आर्थिक विकास की समीक्षा के दोनों ही अवसरों का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में सुधारों के लिए पूर्णरूपेण नहीं किया जा सका। यह सुधार 1991 के दौरान आए आर्थिक संक के बाद ही संभव हो पाए, जिसने भारत में विकास की रणनीति की दशा और दिशा दोनों में ही गुणात्मक परिवर्तन किए।


3. नव-उदारवादी विकास रणनीति

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नव-उदारवादी विकास रणनीति 1980 के दशक के अंत तक भारतीय अभिजात वर्ग जिसमें नौकरशाही भी शामिल थी, इस बात को समझने लगे थे कि अंतर्राष्ट्रय स्तर पर भारत के सम्मान और प्रमुखता के पारंपरिक दावे और आर्थिक नीतियों द्वारा इसे बनाए रखने की गिरती क्षमता के बीच एक गहरा अंतराल बन गया है और आर्थिक विफलता स्पष्ट हो चुकी है। भारत के लिए यह सबसे बुरी मनोदशा थी जो श्रेष्ठता की भावना रखने और निकृष्ट स्थिति में होने को प्रदर्शित करती हैं।


1990 में आए भुगतान संकट ने ब्रेटनबुड्स संस्थाओं से आर्थिक सहावता लेने को मजबूर किया और जुलाई 1991 में भारत में वाजारवादी व्यवस्था ने पिछले दरवाजों से कदम रखा, क्योंकि लोकतंत्र होने के बावजूद भारत में आर्थिक सुधार सीमित जनाधार पर आधारित था। बाजारवाद संसाधनों के दक्ष आवंटन और प्रतिस्पर्धा से उत्पादन और विकास में वृद्धि की कल्पना करता है। इसके तहत विकास के लिए राज्व के हस्तक्षेप की आलोचना की गई,तथा यह सुझाव दिया गया कि यदि राज्य अपना आर्थिक हस्तक्षेप न्यूनतम कर दे और अपनी अर्थव्यवस्था को पूरे विश्व के लिए खोल दे तो उनका आर्थिक विकास बढ़ जाएगा। ऐसा न करने पर उन्हें वित्तीय और व्यापार असंतुलन का सामना करना पड़ेगा। अन्य सुझावों में सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण, सव्सिडी में कटौती, मूल्य निर्धारण में अहस्तक्षेप, मुद्रा का अवमूल्यन तथा पूंजी निरवेशका को आमंत्रण देने जैसे कार्य करने चाहिए। इसे सरल शब्दों में एल पी जो लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन या उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण कहते हैं। यह दावा किया गया कि एक प्रतिस्पर्धात्मक, खुली और दक्ष अर्थव्यवस्था से अनेक सकारात्मक परिणाम आएंगे। इससे बेहतर आर्थिक विकास दर, उच्च रोजगार अवसर, ग्रामीण क्षेत्रों की बेहतरी और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जा सकेगा।


परंतु भारत के लिए इस नव-उदारवादी मॉडल के तहत लगभग 25 वर्षों का सफर बहुत संतोषप्रद नहीं रहा है; जैसा कि ज्यादातर विद्वान दावा करते हैं। इसके बावजूद पिछले दशक में आर्थिक वृद्धि दर औसतन 7 प्रतिशत से ऊपर रही है। विकास काफी एकांगी रहा है, अर्थात् अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में विकास समान रूप से परिलक्षित नहीं हुआ है। सेवा क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्ों में सुधार आशा से कम रहा है। कृषि विकास तो कभी भी 3 प्रतिशत के ऊपर नहीं गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि विकास की प्रकृति समावेशी नहीं रही है। कृषि-उद्योगों, गरीब-अमीर और ग्राम-शहर के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। लकड़वाला कमिटी (1993) से लेकर तेंदुलकर कमिटी ( 2007) और योजना आयोग और एन.एस.ओ. के विभिन्न पैमानों के बावजूद भारत में एक-तिहाई गरीबी बनी हुई है। श्रम ब्यूरों के क्वाटरली सर्वे (जुलाई-सितंबर 2015) यह बताते हैं कि आठ श्रम सघन उद्योगों में रोजगार सृजन 201। में 9 लाख, 2013 में 4.19 लाख और 2015 में केवल 1.35 लाख रहा है। श्रम बल में पिछले दशक (2001-2011) में बृद्धि दर 2.23 प्रतिशत रही है जबकि रोजगार दर केवल 1.4 प्रतिशत रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है जबकि रोजगार दर केवल 1.8 प्रतिशत। रोजगार बाजार में प्रतिदिन एक मिलियन लोग शामिल हो रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 115 मिलियन गैर-कृषीय रोजगार सृजन की जरूरत अगले 10 वर्षों में है। तभी जाकर हम जनाकिकी का लाभ उठा पाएंगे। अतः रोजगार- रहित विकास की ओर हम अग्रसर हुए हैं। जिसका सीधा असर गरीबों और गरीबी पर पड़ा है। सरकारी क्षेत्र में भी रोजगार जो 1996-97 में 19.5 मिलियन था, घटकर आज 17 मिलियन रह गया है। अनौपचारिक क्षेत्र में जो रोजगार मिले भी हैं। वे कम बेतन और खराब परिस्थितियों वाले रहे हैं।


इस नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था की समीक्षा अर्थव्यवस्था के कई पहलुओं से की जा सकती है लेकिन इसका मूल्यांकन दो आधारों-गरीबो पर प्रभाव और कृषि क्षेत्र की दशा के द्वारा करना उचित होगा जो भारत की एक बड़ी जनसंख्या से संबंध रखती है।