समसामयिकी 2020/अंतरराष्ट्रीय संस्थान

- 20 समूह के राष्ट्रीय नेताओं द्वारा COVID-19 महामारी से निपटने की दिशा में एक वीडियो सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।

मुख्य बिंदु: इस आभासी सम्मेलन (Virtual Summit) का नेतृत्त्व सऊदी अरब, जो वर्तमान में (वर्ष 2020 के लिये) इस आर्थिक समूह के अध्यक्ष हैं, कर रहा है । किसी एक देश को प्रतिवर्ष इसके अध्यक्ष के रूप में चुना जाता है, जिसे 'G- 20 प्रेसीडेंसी' के रूप में जाना जाता है। अर्जेंटीना द्वारा वर्ष 2018 में तथा जापान द्वारा वर्ष 2019 में G- 20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता की गई थी। वर्ष 2020 के सम्मेलन में स्पेन, जॉर्डन सिंगापुर एवं स्विट्ज़रलैंड आमंत्रित देश के रूप में शामिल हो रहे हैं। शामिल होने वाले प्रमुख समूह व देश: इस G- 20 सम्मेलन में सदस्य राष्ट्रों के अलावा आमंत्रित देश-स्पेन, जॉर्डन, सिंगापुर एवं स्विट्जरलैंड, के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय संगठन- संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations), विश्व बैंक समूह (World Bank Group), विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation), विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation), खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organisation), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (Organisation for Economic Cooperation and Development) के नेता शामिल होंगे। वियतनाम दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ का, दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी संघ का, संयुक्त अरब अमीरात खाड़ी सहयोग परिषद तथा रवांडा अफ्रीका के विकास के लिये नई साझेदारी (New Partnership for Africa’s Development) का प्रतिनिधित्व करेगा। भारत सरकार द्वारा नेतृत्त्व: भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (South Asian Association for Regional Cooperation- SAARC) वीडियो शिखर सम्मेलन के बाद यह दूसरा आभासी नेतृत्त्व शिखर सम्मेलन (Virtual Leadership Summit) होगा। 15 मार्च 2020 को ‘सार्क आभासी शिखर सम्मेलन’ का आयोजन ‘सार्क COVID-19 आपातकालीन फंड’ के निर्माण हेतु किया गया था। G- 20 आभासी शिखर सम्मेलन का आयोजन COVID-19 का सामना करने के लिये विस्तृत योजना बनाने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। G- 20 समूह: वर्ष 1997 के वित्तीय संकट के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर एकत्रित होना चाहिये। G-20 समूह की स्थापना वर्ष 1999 में 7 देशों-अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, फ्राँस और इटली के विदेश मंत्रियों द्वारा की गई थी। G-20 का उद्देश्य: G-20 का उद्देश्य वैश्विक वित्त को प्रबंधित करना है। शामिल देश: इस फोरम में भारत समेत 19 देश तथा यूरोपीय संघ भी शामिल है। जिनमें अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, यूरोपियन यूनियन, फ्राँस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। G- 20 एक मंच के रूप में कार्य करता है न कि एक संगठन के रूप में, अत: इसका कोई स्थायी सचिवालय और प्रशासनिक संरचना नहीं है।

बेसिक (BASIC) देशों (ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) के पर्यावरण मंत्रियों का सम्मेलन बीजिंग में आयोजित

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इस सम्मेलन के बाद पेरिस समझौते (वर्ष 2015) के व्यापक कार्यान्वयन के लिये एक बयान जारी किया गया। पेरिस समझौते पर प्रतिबद्धता व्यक्त करने के साथ ही मंत्रियों के समूह ने विकसित देशों से विकासशील देशों को 100 बिलियन डॉलर, जलवायु वित्त (Climate Finance) के रूप में प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने का भी आह्वान किया। कोपेनहेगन समझौते- Copenhagen Accord {संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-15) 2009 के दौरान स्थापित} के तहत विकसित देशों ने वर्ष 2012 से वर्ष 2020 तक प्रति वर्ष 100 बिलियन डॉलर देने का वादा किया था।इस फंड को हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund- GCF) के रूप में जाना जाता है। GCF का उद्देश्य विकासशील और अल्प विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन के मुद्दों से समाधान में सहायता करना है। हालाँकि वर्तमान में विकसित देशों द्वारा केवल 10-20 बिलियन डॉलर की सहायता राशि प्रदान की जा रही है । बैठक का आयोजन समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ और संबंधित क्षमताएँ (Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities: CBDR-RC) के सिद्धांतों के आधार पर किया गया। बैठक में UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल (वर्ष 1997-2012) और पेरिस समझौते के पूर्ण, प्रभावी एवं निरंतर कार्यान्वयन के महत्त्व को भी रेखांकित किया गया

अबुधाबी में 19वें (दिसंबर 2019)इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का आयोजन (Indian Ocean Rim Association-IORA)

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भारत ने हिंद महासागर से जुड़े तटीय देशों से समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा हेतु गहरे संबंधों की मांग की है। IORA के इस मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में समुद्री सुरक्षा, व्यापार और निवेश की सुविधा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान -प्रदान, ब्लू इकोनॉमी तथा महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। संयुक्त अरब अमीरात वर्ष 2021 तक IORA के अध्यक्ष पद पर बना रहेगा इससे पहले यह पद दक्षिण अफ्रीका के पास था। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की अध्यक्षता में इस सम्मेलन में सुझाव दिया गया है कि एक IORA विकास कोष (IORA Development Fund) की स्थापना की जाएगी। इसके फंड से हिंद महासागर रिम के कम विकसित देशों की आर्थिक क्षमता को सुधारने में मदद मिलेगी। इस सम्मलेन की थीम- “हिंद महासागर में एक साझी नियति और समृद्धि की राह को प्रोत्साहन (Promoting a Shared Destiny and Path to Prosperity in the Indian Ocean)” है। भारत पहले ही 20 देशों के साथ व्हाइट शिपिंग समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है, यह समुद्री सुरक्षा के दृष्टिकोण से बहुत महत्त्वपूर्ण है।

व्हाइट शिपिंग(White Shipping) का मतलब गैर-सैन्य वाणिज्यिक जहाज़ों की पहचान और आवाजाही के बारे में अग्रिम सूचनाओं को साझा करना और आदान-प्रदान करना है। सफेद रंग का कोड वाणिज्यिक जहाज़ों के लिये है, भूरा रंग कोड सैन्य जहाज़ों के लिये है और अवैध जहाज़ों को काले रंग के कोड से दर्शाया जाता है।व्हाइट शिपिंग समझौते के बाद, सफेद जहाज़ों के बारे में आपसी डेटा साझा किया जाता है। भारतीय नौसेना का सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (गुरुग्राम) व्हाइट शिपिंग समझौते के लिये मॉडल केंद्र है।

भारत इस क्षेत्र में ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिये IORA के सदस्य देशों सहित सोमालिया, ओमान और अन्य वाणिज्यिक मत्स्य क्षेत्र में अपने कौशल को साझा कर रहा है। भारत मालदीव, श्रीलंका, सेशेल्स और बांग्लादेश आदि देशों के साथ मज़बूत समुद्री संबंधों को बढ़ावा देकर अपने सूचना तंत्र को विकसित कर रहा है। IORA भारत के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है यही वजह है कि न केवल तटीय देशों बल्कि इस क्षेत्र में अन्य देशों के साथ भी भारत अपने संबंधों को मज़बूत करने के लिये प्रयासरत है।

23 जून को रूस-भारत-चीन (RIC) समूह की 'आभासी बैठक' (Virtual Meeting)

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रूस, भारत तथा चीन के मध्य LAC पर उत्पन्न तनाव को कम करने में 'रचनात्मक संवाद’ (Constructive Dialogue) स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभा सकता है। 15 जून को गलवान घाटी (Galwan Valley) में चीनी सैनिकों के साथ मुठभेड़ में कम-से-कम 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। तब से भारत के इस बैठक में भाग लेने को लेकर अनिश्चितता की स्थति बनी हुई थी।

RIC समूह के निर्माण का विचार BRICS समूह से बहुत पहले वर्ष 1998 में तत्कालीन रूसी विदेश मंत्री द्वारा दिया गया था। हालाँकि RIC समूह को उतना महत्त्व नहीं दिया गया जितना BRICS समूह को दिया गया है।

यद्यपि तीनों देशों के नेताओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान बैठक का आयोजन किया जाता रहा है। RIC का महत्त्व:-तीनों देश बहुपक्षीय संस्थानों जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार का समर्थन करते हैं। तीनों देश अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के लिये सभी स्तरों पर नियमित रूप से वार्ता का समर्थन करते हैं। तीनों देश BRICS, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन,एशिया-यूरोप बैठक (Asia-Europe Meeting- ASEM) जैसे साझा समूहों के माध्यम से आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने पर सहमत हैं। तीनों देश यूरेशिया तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक अवस्थिति के आधार पर वैश्विक शक्तियाँ हैं।

भारत के लिये RIC का महत्त्व:-QUAD (भारत, अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया) तथा JAI (जापान-अमेरिका-भारत) जैसे समूह भारत को केवल एक समुद्री शक्ति होने तक ही सीमित कर देंगे, जबकि RIC समूह वास्तव में भारत को महसागरीय शक्ति के साथ-साथ महाद्वीपीय शक्ति के रूप में उबरने में मदद कर सकता है।

भारत और चीन दोनों देशों के रूस के साथ बेहतर संबंध है ऐसे में रूस इन दोनों देशों के बीच सेतु का कार्य कर सकता है।

‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ (Non-Aligned Movement- NAM) समूह

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COVID-19 महामारी के प्रबंधन में सहयोग की दिशा में 'NAM संपर्क समूह शिखर सम्मेलन' (NAM Contact Group Summit- NAM CGS) का आयोजन किया गया। इस ‘आभासी सम्मेलन’ की मेज़बानी अज़रबैजान द्वारा की गई तथा सम्मेलन में 30 से अधिक राष्ट्राध्यक्षों और अन्य नेताओं ने शिखर सम्मेलन में भाग लिया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद पहली बार ‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ को संबोधित किया गया। वर्ष 2016 और वर्ष 2019 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NAM के शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया था। वे पहले ऐसे प्रधानमंत्री है जिन्होंने NAM के शिखर सम्मेलनों में भाग नहीं लिया था। भारतीय प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में 'आतंकवाद' और 'फेक न्यूज' के मुद्दों को उठाया तथा इन दोनों मुद्दों को 'घातक वायरस' कहा।

  1. शिखर सम्मेलन में COVID-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए एक घोषणा को अपनाया। सदस्य देशों की आवश्यकताओं की पहचान करने के लिये एक 'टास्क फोर्स' बनाने की घोषणा की गई।
  2. यह टास्क फोर्स COVID-19 महामारी के प्रबंधन की दिशा में एक ‘कॉमन डेटाबेस’ को स्थापित करेगा ताकि सदस्य देशों द्वारा महामारी से निपटने में महसूस की जाने वाली आवश्यकताओं की पहचान की जा सके।

25 और 26 अक्तूबर, 2019 को अज़रबैजान के बाकू में 18वें गुटनिरपेक्ष आंदोलन का शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। भारत का प्रतिनिधित्व भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजाय उपराष्ट्रपति एम. वेकैया नायडू ने किया। इस सम्मेलन से पहले वर्ष 2016 में भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजाय तात्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने हिस्सा लिया था।

पृष्ठभूमि:

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत यूगोस्लाविया के जोसेफ ब्राॅश टीटो, भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर की दोस्ती से मानी जाती है। इन तीनों देशों द्वारा वर्ष 1956 में एक सफल बैठक आयोजित की गई। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णों और घाना के प्रधानमंत्री वामे एनक्रूमा द्वारा इस बैठक को ज़ोरदार समर्थन दिया गया। ये पाँच नेता गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक नेता थे। गुटनिरपेक्षता की ओर पहला अहम कदम बांडुंग सम्मेलन (वर्ष 1955) के माध्यम से उठाया गया जिसमें भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, अब्दुल नासिर, सुकर्णो और मार्शल टीटो जैसे नेताओं ने प्रतिभाग किया। इस सम्मेलन में विश्व शांति और सहयोग संवर्द्धन संबंधी घोषणा पत्र जारी हुआ। पहला गटुनिरपेक्ष सम्मेलन सन् 1961 में बेलग्रेड में आयोजित किया गया था। पहले गुटनिरपेक्ष-सम्मेलन में 25 सदस्य-देश शामिल हुए। समय गुजरने के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्य संख्या बढ़ती गई। जिसमें वर्तमान में 120 सदस्य देश, 17 पर्यवेक्षक देश तथा 10 पर्यवेक्षक संगठन शामिल हैं।

20 अप्रैल, 2020 को केंद्रीय वित्त मंत्री ने नई दिल्ली में वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से न्यू डेवलपमेंट बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की 5वीं वार्षिक बैठक में भाग लिया।

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इस बैठक में भारतीय वित्त मंत्री ने एक विश्वसनीय वैश्विक वित्तीय संस्थान के रूप में न्यू डेवलपमेंट बैंक द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना की जो अधिक सतत् एवं समावेशी दृष्टिकोण को अपनाकर अपने निर्दिष्ट प्रयोजन को सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है। वैश्विक महामारी COVID-19 पर चर्चा करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने ब्रिक्स देशों को लगभग 5 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्‍ध कराने के लिये ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ द्वारा किये गए प्रयासों की सराहना की, जिसमें COVID-19 महामारी से निपटने के लिये भारत को 1 अरब डॉलर की आपातकालीन सहायता देना भी शामिल है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (NBD) को ब्रिक्स (BRICS) के सदस्‍य देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) द्वारा वर्ष 2014 में स्थापित किया गया था।

इसका उद्देश्य ब्रिक्स एवं अन्य उभरती बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं तथा विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचे एवं सतत् विकास परियोजनाओं के लिये व्‍यापक संसाधन जुटाना है जिससे वैश्विक प्रगति व विकास के लिये बहुपक्षीय एवं क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा वर्तमान में किये जा रहे प्रयासों में तेज़ी लाई जा सके। न्यू डेवलपमेंट बैंक (NBD) ने अब तक भारत की 14 परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है जिनमें 4,183 मिलियन डॉलर की राशि निहित है। न्यू डेवलपमेंट बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की पहली वार्षिक बैठक वर्ष 2016 में चीन के शंघाई शहर में आयोजित की गई थी। जबकि इसकी दूसरी वार्षिक बैठक वर्ष 2017 में नई दिल्ली (भारत) में आयोजित की गई थी।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) एक क्षेत्रीय अन्तर्राज्यीय राजनीतिक और आर्थिक संघ है। इस संघ में इराक और कतर को छोड़कर फारस की खाड़ी के सभी देश शामिल हैं। इसके सदस्य देश हैं: बहरीन, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। 25 मार्च, 1981 को खाड़ी सहयोग परिषद के चार्टर पर हस्ताक्षर करने के बाद, औपचारिक रूप से GCC की स्थापना की गईं थी।

  • हाल ही में आतंकवाद के प्रसार के लिये मुहैया कराए जाने वाले धन की निगरानी करने वाली अंतर्राष्ट्रीय निगरानी संस्था वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (Financial Action Task Force-FATF) ने पाकिस्तान को फरवरी 2020 तक ‘ग्रे’ लिस्ट में बरकरार रखा है।

वर्तमान में FATF में भारत समेत 39 सदस्य देश हैं। भारत FATF का 2010 से सदस्य है। पाकिस्तान FATF का सदस्य नहीं है। FATF की स्थापना वर्ष 1989 में एक अंतर-सरकारी निकाय के रूप में हुई थी। FATF का उद्देश्य मनी लॉड्रिंग, आतंकवादी वित्तपोषण जैसे खतरों से निपटना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता के लिये अन्य कानूनी, विनियामक और परिचालन उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा देना है।

  • ओपेक की स्थापना वर्ष 1960 में इराक में आयोजित बगदाद सम्मेलन (10-14 सितंबर, 1960) के दौरान की गई थी।

इसका मुख्यालय विएना (आस्ट्रिया) में स्थित है। वर्तमान में इस संगठन के सदस्य देशों की संख्या 14 है। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला इस संगठन के पाँच संस्थापक सदस्य हैं। OPEC के अनुसार, इस संगठन का उद्देश्य पेट्रोलियम उत्पादकों के लिये उचित और स्थिर कीमतों को सुरक्षित करने, उपभोक्ता राष्ट्रों को पेट्रोलियम की एक कुशल, किफायती तथा नियमित आपूर्ति एवं तेल उद्योग में निवेश करने वालों के लिये एक उचित लाभ को सुनिश्चित करने हेतु सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों के समन्वय और एकीकरण को बढ़ावा देना है।

जिन लिक्यून को पाँच वर्षों के दूसरे कार्यकाल के लिये चीन स्थित ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक’(Asian Infrastructure Investment Bank- AIIB) के अध्यक्ष पद हेतु पुनः निर्वाचित किया गया

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जिन लिक्यून के अनुसार, AIIB द्वारा एक 'गैर राजनीतिक संस्था' के रुप में भारत में परियोजनाओं को जारी रखा जाएगा। बैंक के प्रबंधन द्वारा राजनीतिक दृष्टि से नहीं बल्कि आर्थिक और वित्तीय दृष्टिकोण से प्रस्तावित परियोजनाओं का निरीक्षण किया जाएगा।

भारत और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक:-

जून 2020 में, AIIB द्वारा एशियन डेवलपमेंट बैंक (Asian Development Bank-ADB) के साथ मिलकर ‘COVID-19 इमरजेंसी रिस्पांस फंड और हेल्थ सिस्टम्स प्रिपेडनेस प्रोजेक्ट’ के लिये 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर तथा ‘COVID-19 एक्टिव रिस्पॉन्स और एक्सपेंडेचर सपोर्ट’ (COVID-19 Active Response and Expenditure Support) के लिये 750 मिलियन अमेरिकी डॉलर के वित्त को मंज़ूरी प्रदान की गई है। भारत-चीन सीमा के साथ लद्दाख की गलवान घाटी में झड़प के दो दिन बाद भी 750 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण को मंज़ूरी दी गई थी।

वर्ष 2016 में स्थापित AIIB के 57 संस्थापक सदस्यों में से भारत एक है।इसका मुख्यालय चीन की राजधानी बीजिंग में स्थित है।

भारत, AIIB में चीन (26.06%) के बाद दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक (7.62% वोटिंग शेयर के साथ) है। भारत द्वारा AIIB से 4.35 बिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्राप्त किया गया है जो किसी भी देश द्वारा प्राप्त सबसे अधिक ऋण राशि है। AIIB द्वारा अब तक 24 देशों में 87 परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये 19.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण को मंज़ूरी दी है। तुर्की 1.95 बिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ ऋण प्राप्ति में दूसरे स्थान पर है। AIIB द्वारा भारत में ऊर्जा, परिवहन एवं पानी जैसे क्षेत्रों के अलावा बंगलुरु मेट्रो रेल परियोजना (USD 335 मिलियन), गुजरात में ग्रामीण सड़क परियोजना (USD 329 मिलियन) तथा मुंबई शहरी परिवहन परियोजना के चरण-3 (500 मिलियन अमेरिकी डॉलर) परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये मंज़ूरी दी गई है। हाल ही में एक आभासी बैठक में भारत द्वारा यह कहा गया कि COVID-19 संकट के दौरान AIIB से अपेक्षा की जाती है यह एआईआईबी पुनर्प्राप्ति प्रतिक्रिया (AIIB’s Recovery Response) अर्थात ‘क्राइसिस रिकवरी फैसिलिटी’ द्वारा सामाजिक बुनियादी ढाँचे को विकसित करने तथा जलवायु परिवर्तन एवं सतत् ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढाँचे के विकास को एकीकृत करने के लिये नए वित्त संसाधनों को उपलब्ध कराए।

46वें G-7 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से

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मूल रूप से, G-7 शिखर सम्मेलन की वार्षिक बैठक 10-12 जून, 2020 को संयुक्त राज्य अमेरिका के कैंप डेविड (Camp David) में आयोजित होने वाली थी। G-7 फ्राँस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का एक समूह है। यह एक अंतर सरकारी संगठन है जिसका गठन वर्ष 1975 में हुआ था। वैश्विक आर्थिक शासन, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा नीति जैसे सामान्य हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिये यह समूह वार्षिक बैठक करता है। वर्ष 1997 में रूस के इस समूह में शामिल होने के बाद कई वर्षों तक G-7 को 'G- 8' के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र के सैन्य अधिग्रहण के बाद रूस को सदस्य के रूप में इस समूह से निष्कासित किये जाने के बाद समूह को फिर से G-7 कहा जाने लगा। G-7 के शिखर सम्मेलन में यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के नेताओं को भी आमंत्रित किया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court-ICC)

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जून में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जारी एक कार्यकारी आदेश के पश्चात ICC के कुछ कर्मचारियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस आदेश से ICC के कर्मचारियों की वित्तीय संपत्ति अवरुद्ध हो जाएगी, साथ ही इन अधिकारियों और इनके निकट रिश्तेदारों को संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने से रोक दिया जाएगा।

प्रतिबंध का कारण:-ICC के ये अधिकारी इस बात की जाँच कर रहे थे कि क्या अफगानिस्तान तथा अन्य स्थानों पर हुए कथित युद्ध अपराधों में अमेरिकी सेना और इसके सहयोगी शामिल थे।

संयुक्त राज्य अमेरिका के अटॉर्नी-जनरल के अनुसार, अमेरिकी न्याय विभाग (US Justice Department) को पर्याप्त विश्वसनीय जानकारी मिली है जो अभियोजन पक्ष के कार्यालय में उच्चतम स्तर पर वित्तीय भ्रष्टाचार और दुर्भावना के लंबे इतिहास के बारे में गंभीर चिंताओं को उजागर करती है। अमेरिकी अधिकारियों ने ICC में अपने पक्ष में हेर-फेर करने के लिये रूस को भी ज़िम्मेदार ठहराया है। अमेरिका मानना है कि इसका अधिकार क्षेत्र केवल तभी लागू होता है जब कोई सदस्य राज्य अत्याचारों के खिलाफ मुकदमा चलाने में असमर्थ या अनिच्छुक हो। अमेरिका के फैसले की आलोचना अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने अमेरिका के इस फैसले की निंदा यह कहते हुए की है कि अमेरिका का फैसला “विधि के शासन और न्यायालय की न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का अस्वीकार्य प्रयास है”। इज़राइल को छोड़कर, कई अन्य देशों ने हेग स्थित न्यायाधिकरण का समर्थन किया है। संयुक्त राष्ट्र ने भी अमेरिका द्वारा दिये गए आदेशों की रिपोर्ट पर ध्यान दिया है। अंतर्राष्ट्रीय NGO ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) के अनुसार, संपत्ति ज़ब्त करने और यात्रा प्रतिबंध लगाने जैसे निर्णय मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों के लिये हैं, न कि पीड़ितों के लिये न्याय की मांग करने वाले अभियोजन पक्ष तथा न्यायाधीश के लिये।

अमेरिका तथा ICC संबंधों की पृष्ठभूमि:-क्लिंटन प्रशासन (1993-2001) रोम संविधि (Rome Statute) की वार्ताओं में शामिल था और वर्ष 2000 में उसने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किये। लेकिन अगले राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने वर्ष 2002 में अमेरिका को रोम संविधि से अलग कर दिया और ICC की पहुँच से अमेरिकी नागरिकों की रक्षा के लिये अमेरिकन सर्विस-मेंबर्स प्रोटेक्शन एक्ट (American Service-Members’ Protection Act) कानून पर हस्ताक्षर किये।

ICC के साथ मतभेदों के बावजूद, कई ऐसे उदाहरण हैं जिसमें वाशिंगटन ने इस मंच के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया- वर्ष 2005 में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने दारफुर संकट (Darfur crisis) के दौरान अपराधों की जाँच करने के लिये ICC को अनुरोध किया उस पर अमेरिका ने वीटो नहीं किया। वर्ष 2011 में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लीबिया मामला ICC को स्थानांतरित किया तो अमेरिका ने इसके समर्थन में वोट किया। अमेरिका ने मुकदमों के लिये संदिग्धों को अफ्रीका से ICC तक स्थानांतरित करने में भी महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान की। डोनाल्ड ट्रम्प के राष्टपति बनने के बाद अमेरिका तथा ICC के संबंधों में फिर से मतभेद उत्पन्न हुए।

ट्रम्प ने वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) में घोषणा करते हुए कहा था कि संयुक्त राज्य अमेरिका ICC को किसी भी प्रकार का समर्थन या मान्यता प्रदान नहीं करेगा। ICC का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, कोई वैधता नहीं है और कोई अधिकार नहीं है। वर्ष 2019 में ICC की मुख्य अभियोजक फतौ बेन्सौडा (Fatou Bensouda) ने वर्ष 2003 से 2014 के बीच अफगानिस्तान युद्ध के दौरान हुए कथित अत्याचारों की औपचारिक जाँच के लिये कहा, इस जाँच के तहत संभवतः अमेरिकी सेना और CIA अधिकारियों के युद्ध अपराधों में शामिल होने की जाँच की जानी थी। उस समय ट्रम्प प्रशासन ने फतौ बेन्सौडा के अमेरिकी वीज़ा को रद्द कर प्रतिक्रिया व्यक्त की। मार्च 2020 में, ICC के न्यायाधीशों ने बेन्सौडा के अनुरोध को मंज़ूरी दी थी।
अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court-ICC) हेग (नीदरलैंड्स) में स्थित एक स्थायी न्यायिक निकाय है, जिसका सृजन वर्ष 1998 के अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय पर रोम संविधि (इसकी स्थापना और संचालन संबंधी दस्तावेज़़) द्वारा किया गया था और 1 जुलाई, 2002 इस संविधि के लागू होने के साथ इसने कार्य करना प्रारंभ किया।

मंच की स्थापना विभिन्न अपराधों के खिलाफ अभियोजन के लिये अंतिम उपाय के रूप में की गई थी ताकि उन अपराधों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके जो अन्यथा अदंडित रह जाएंगे। ICC का क्षेत्राधिकार मुख्यतः चार प्रकार के अपराधों पर होगाः 1. नरसंहार (Genocide) 2. मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity) 3. युद्ध अपराध (War Crimes) 4. अतिक्रमण का अपराध (Crime of Aggression) 123 राष्ट्र रोम संविधि के पक्षकार हैं तथा ICC के अधिकार को मान्यता देते हैं लेकिन अमेरिका, चीन, रूस और भारत इसके प्रमुख अपवाद हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) संयुक्त राष्ट्र प्रणाली का हिस्सा है जबकि ICC संयुक्त राष्ट्र प्रणाली का हिस्सा नहीं है बल्कि UN-ICC संबंध एक अलग समझौते द्वारा शासित है। ICJ जो संयुक्त राष्ट्र के 6 प्रमुख अंगों में से एक है, यह मुख्य रूप से राष्ट्रों के बीच विवादों पर सुनवाई करता है। जबकि ICC व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है क्योंकि इसका अधिकार क्षेत्र किसी सदस्य राज्य में हुए अपराध या ऐसे राज्य के किसी नागरिक द्वारा किये गए अपराधों तक विस्तारित है।


संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषदUnited Nations Economic and Social Council 17 जुलाई, 2020 को भारतीय प्रधानमंत्री न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (Economic and Social Council- ECOSOC) के वार्षिक उच्च-स्तरीय खंड को आभासी रूप से संबोधित करेंगे।

थीम: इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के उच्च-स्तरीय खंड की थीम ‘COVID-19 के बाद बहुपक्षवाद: 75वीं वर्षगांठ पर हमें किस तरह के संयुक्त राष्ट्र की ज़रूरत है’ (Multilateralism after Covid19: What kind of UN do we need at the 75th anniversary) है। प्रमुख बिंदु: इसके वार्षिक उच्च-स्तरीय खंड में विभिन्न देशों की सरकारों के प्रतिनिधि, निजी क्षेत्र एवं सिविल सोसायटी के उच्चस्तरीय प्रतिनिधियों एवं शिक्षाविदों का एक विविध समूह शामिल होता है। यह आयोजन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पहला अवसर होगा जब भारतीय प्रधानमंत्री 17 जून, 2020 को सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्य (2021-22 के कार्यकाल के लिये) के रूप में भारत को निर्विरोध चुने जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद को संबोधित करेंगे। इससे पहले भारतीय प्रधानमंत्री ने जनवरी 2016 में ECOSOC की 70वीं वर्षगांठ पर संबोधित किया था।

संयुक्त राष्ट्र के संस्थान

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भारत और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (International Civil Aviation Organisation-ICAO)

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पाकिस्तान द्वारा भारत को अपने हवाई क्षेत्र के उपयोग से इनकार करने के मामले को भारत सरकार ने ICAO के समक्ष उठाया है। भारत ने 28 अक्तूबर, 2019 को प्रधानमंत्री की सऊदी अरब यात्रा के लिये पाकिस्तान से ओवरफ्लाइट क्लीयरेंस की मांग की थी। पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन का हवाला देते हुए इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था।

ICAO संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1944 में राज्यों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन अभिसमय (शिकागो कन्वेंशन) के संचालन तथा प्रशासन के प्रबंधन हेतु की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संबंधी अभिसमय/कन्वेंशन पर 7 दिसंबर, 1944 को शिकागो में हस्ताक्षर किये गए। इसलिये इसे शिकागो कन्वेंशन भी कहते हैं।

शिकागो कन्वेंशन ने वायु मार्ग के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय परिवहन की अनुमति देने वाले प्रमुख सिद्धांतों की स्थापना की और ICAO के निर्माण का भी नेतृत्व किया। इसका एक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन की योजना एवं विकास को बढ़ावा देना है ताकि दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन की सुरक्षित तथा व्यवस्थित वृद्धि सुनिश्चित हो सके। भारत इसके 193 सदस्यों में से है। इसका मुख्यालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में है।

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक तथा सामाजिक परिषद(United Nations Economic and Social Council-ECOSOC)

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  • संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009)
  1. संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) में 24 सदस्य राज्य होते हैं।
  2. इसका निर्वाचन तीन वर्ष की अवधि के लिये महासभा के दो-तिहाई बहुमत से होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?:-(b) केवल 2

यह परिषद सामाजिक समस्याओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय शांति को प्रभावी बनाने में प्रयासरत है। इसके अनुसार विश्व में शांति बनाये करने का एकमात्र हल राजनीतिक नहीं है। इसकी स्थापना 1945 की गयी थी। आरंभिक समय में इस परिषद में मात्र 18 सदस्य होते थे। 1965 में संयुक्त राष्ट्र अधिकारपत्र को संशोधित करके इसके सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 27 कर दी गई और 1971 में सदस्यों की संख्या बढ़कर 54 हो गई। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। एक-तिहाई सदस्य प्रतिवर्ष पदमुक्त होते हैं, यानि प्रतिवर्ष 18 सदस्य बदले जाते हैं। पदमुक्त होने वाला सदस्य पुन: निर्वाचित भी हो सकता है। आर्थिक तथा सामाजिक परिषद में प्रत्येक सदस्य राज्य का एक ही प्रतिनिधि होता है। अध्यक्ष का कार्यकाल एक वर्ष के लिए होता है और उसका चयन ईसीओएसओसी के छोटे और मंझोले प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। 1992 में आर्थिक और सामाजिक परिषद के अधिकारों को बढ़ाया गया। अल्जीरिया, चीन, बेलारुस, जापान, सूडान, न्यूजीलैंड इसके सदस्य हैं। यहां के निर्णय उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत द्वारा लिए जाते हैं। किसी विशेष राज्य के विषय पर विचार करने के लिए जब परिषद की बैठक होती है, तो वह उस राज्य के प्रतिनिधि को आमंत्रित करती है। इस बैठक विशेष में उस प्रतिनिधि को मत देने का अधिकार नहीं होता है। परिषद हर वर्ष जुलाई में चार सप्ताह के लिए मिलती है और 1998 के बाद से वह अप्रैल में विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक निधि के वित्तीय मंत्रियों के साथ एक और सम्मेलन होता है।

आर्थिक एवं सामाजिक परिषद विश्व की जनसंख्या के जीवन में सुधार हेतु गरीबों, घायलों एवं अशिक्षितों की सहायता करके अंतर्राष्ट्रीय शांति बहाली के प्रयास करती है। यह अंतर्राष्ट्रीय मामलों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य आदि मामलों का अध्ययन करती है।

संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार-विरोधी अभिसमय या भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र की सन्धि (United Nations Convention against Corruption)

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  • निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
  1. भ्रष्टाचार के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन [यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन (UNCAC)] का ‘भूमि, समुद्र और वायुमार्ग से प्रवासियों की तस्करी के विरूद्ध एक प्रोटोकॉल’ होता है।
  2. UNCAC अब तक का सबसे पहला विधितः बाध्यकारी सार्वभौम भ्रष्टाचार-निरोधी लिखत है।
  3. राष्ट्र-पार संगठित अपराध के लिए विरूद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन [यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट ट्रांसनेशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम (UNTOC)] की एक विशिष्टता ऐसे एक विशिष्ट अध्याय का समावेशन है, जिसका लक्ष्य उन संपत्तियों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना है जिनसे वे अवैध तरीके से ले ली गई थी।
  4. मादक द्रव्य और अपराध विषयक संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स ऐंड क्राइम (UNODC)] संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों द्वारा UNCAC और UNTOC दोनों के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिए अधिदेशित है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?-(c) केवल 2 और 4

यह एक बहुपक्षीय सन्धि है जिस पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश सन २००३ में सहमत हुए थे। यह विश्व की अकेली भ्रष्टाचार-विरोधी सन्धि है जो कानूनी रूप से बाध्यकारी है। इस सन्धि के अनुसार संयुक्त राष्ट्र सभी सदस्य देशों से अपेक्षा करता है कि वे भ्रष्टाचार-निरोधी विभिन्न उपायों को लागू करें जो मुख्यतः पाँच क्षेत्रों पर केन्द्रित है- भ्रष्टाचार से बचाव, कानून बनाना और लागू करना, इस क्षेत्र में अन्तरराष्ट्रीय सहयोग, पूंजी की वसूली, तकनीकी सहायता एवं सूचना का आदान-प्रदान 186 सदस्य देशों के साथ ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध संधि’ एक ऐसा सार्वभौमिक भ्रष्टाचार-विरोधी औज़ार है जो क़ानूनी रूप से बाध्यकारी है।[१]

यह संधि दिसंबर 2005 में लागू हुई थी और संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देशों ने इस पर मुहर लगा दी है. वर्ष 2018 में इसे सहमति देने वाले देश समोआ, इक्वीटॉरियल गिनी और चाड थे.

इस संधि में भ्रष्टाचार के विभिन्न रूपों – रिश्वत, प्रभाव का ग़लत इस्तेमाल, पद के दुरुपयोग इत्यादि - सहित निजी क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी ध्यान रखा गया है.

संधि के तहत सदस्य देशों पर भ्रष्टाचार की रोकथाम करने और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को आपराधिक क़रार देने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने, चुराई गई संपत्तियों की वापसी सुनिश्चित करने और तकनीकी सहयोग और सूचना के आदान-प्रदान को संभव बनाना है.

हर दो साल बाद सदस्य देश इस संधि की समीक्षा, उसे अमल में लाने के बेहतर तरीक़ों और भ्रष्टाचार से निपटने के रास्तों की तलाश करने पर चर्चा के लिए मिलते हैं.

एक हफ़्ते तक चलने वाले इस आठवें सत्र में वर्ष 2021 में न्यूयॉर्क में होने वाले विशेष सत्र की तैयारियों का भी जायज़ा लिया जाएगा.

विश्व व्यापार संगठन और भारत

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मार्च में संसद को सूचित किया गया है कि भारत अपनी निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं पर WTO के विवाद निपटान पैनल की सिफारिशों को लागू करने के लिये बाध्य नहीं है, क्योंकि भारत ने पैनल के इस आदेश को उच्च स्तर पर चुनौती दी है। बीते वर्ष 31 अक्तूबर, 2019 को विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान पैनल ने निर्णय दिया था कि भारत की निर्यात संबंधी योजनाएँ (Export-Related Schemes) “सब्सिडी एवं प्रतिकारी उपाय समझौते” के तहत निषिद्ध सब्सिडी (Prohibited Subsidies) की प्रकृति में आती हैं और विश्व व्यापार संगठन के मानदंडों के साथ असंगत हैं। WTO के विवाद निपटान पैनल ने भारत को विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) योजना को वापस लेने के लिये 180 दिनों की समय-सीमा प्रदान की है। क्या है विवाद? दरअसल 14 मार्च, 2018 को संयुक्त राज्य अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (United States Trade Representative-USTR) कार्यालय ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की निर्यात संवर्द्धन योजनाओं को चुनौती दी थी। USTR का तर्क था कि इन योजनाओं के कारण असमान अवसर पैदा हो रहे हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान हो रहा है। USTR के अनुसार, भारत सब्सिडी एवं प्रतिकारी उपाय समझौते (Agreement on Subsidies and Countervailing Measures- SCM Agreement) के तहत की गई अपनी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन कर रहा है। USTR ने इस संदर्भ में भारत की 5 निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं (निर्यात उन्मुख इकाइयों की योजनाएँ व क्षेत्र-विशिष्ट योजनाएँ) का उल्लेख किया है, जोकि निम्नलिखित हैं-

  1. इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर प्रौद्योगिकी पार्क योजना (Electronics Hardware Technology Parks Scheme)
  2. भारत से मर्चेंडाइज़ निर्यात के लिये योजना (Merchandise Exports from India Scheme)
  3. निर्यात संवर्द्धन कैपिटल गुड्स संबंधी योजना (Export Promotion Capital Goods Scheme)
  4. विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zones)
  5. शुल्क मुक्त आयात अधिकार-पत्र योजना (Duty free Import Authorization Scheme)

USTR का मुख्य तर्क यह है कि भारत की उपरोक्त पाँच निर्यात संवर्द्धन योजनाएँ, SCM समझौते के प्रावधान 3.1 (A) और 3.2 का उल्लंघन करती हैं, क्योंकि ये दोनों प्रावधान निर्यात सब्सिडी देने पर रोक लगाते हैं। व्यापार विवाद और भारत:-संसद में दी गई सूचना के अनुसार, भारत वर्तमान में WTO में कुल 15 व्यापार विवादों में शामिल है, जिनमें से अधिकांश अमेरिका के साथ हैं। इन विवादों में से 4 में भारत शिकायतकर्त्ता है जबकि 11 विवादों में भारत प्रतिवादी है।

विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) विश्व में व्यापार संबंधी अवरोधों को दूर कर वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने वाला एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1995 में मराकेश संधि के तहत की गई थी।

इसका मुख्यालय जिनेवा में है। वर्तमान में विश्व के 164 देश इसके सदस्य हैं। 29 जुलाई, 2016 को अफगानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना था। सदस्य देशों का मंत्रिस्तरीय सम्मेलन इसके निर्णयों के लिये सर्वोच्च निकाय है, जिसकी बैठक प्रत्येक दो वर्षों में आयोजित की जाती है।

संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) एक अमेरिकी संस्था है, जो अमेरिका के राष्ट्रपति को व्यापार की नीति विकसित करने और अनुशंसा करने तथा द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तरों पर व्यापार वार्ता के आयोजन तथा सरकार के भीतर व्यापार नीति के समन्वयन के लिये ज़िम्मेदार है।
  • NAMA-11 (Nama-11) देशों का समूह निम्नलिखित में से किस एक के मामलों में के संदर्भ में प्रायः समाचारों में आता है? (I.A.S-2009):- विश्व व्यापार संगठन

विश्व व्यापार संगठन की गैर-कृषि बाजार पहुंच (NAMA) वार्ता 2001 के दोहा घोषणा पर आधारित है जो विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए ब्याज की निर्यात योग्य वस्तुओं पर टैरिफ में कमी या उन्मूलन का आह्वान करती है। NAMA में विनिर्माण उत्पाद, ईंधन और खनन उत्पाद, मछली और मछली उत्पाद और वानिकी उत्पाद शामिल हैं। इन उत्पादों को कृषि पर समझौते या सेवाओं पर बातचीत द्वारा कवर नहीं किया जाता है। विश्व व्यापार संगठन NAMA वार्ता को महत्वपूर्ण मानता है क्योंकि NAMA उत्पादों का दुनिया के व्यापारिक निर्यात का लगभग 90% हिस्सा है।

संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (United Nations Convention on the Law of the Sea-UNCLOS)

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समुद्री मत्स्य विनियमन और प्रबंधन (MFRM) विधेयक 2019 को चर्चा और सुझावों हेतु पब्लिक डोमेन में रखा गया है। इस विधेयक को लाने का कारण संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS), 1982 और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियम हैं, जिनके अनुसार भारत को अपने मत्स्य पालन क्षेत्र को विनियमित करने हेतु कानूनों का निर्माण करना है।

यह एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो विश्व के सागरों और महासागरों पर देशों के अधिकार एवं ज़िम्मेदारियों का निर्धारण करता है तथा समुद्री साधनों के प्रयोग के लिये नियमों की स्थापना करता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस कानून को वर्ष 1982 में अपनाया था लेकिन यह नवंबर 1994 में प्रभाव में आया। भारत ने वर्ष 1995 में UNCLOS को अपनाया, इसके तहत समुद्र के संसाधनों को तीन क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है- आंतरिक जल (IW), प्रादेशिक सागर (TS) और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ)। आंतरिक जल (Internal Waters-IW): यह बेसलाइन की भूमि के किनारे पर होता है तथा इसमें खाड़ी और छोटे खंड शामिल हैं।

प्रादेशिक सागर (Territorial Sea-TS): यह बेसलाइन से 12 समुद्री मील की दूरी तक फैला हुआ होता है। इसके हवाई क्षेत्र, समुद्र, सीबेड और सबसॉइल पर तटीय देशों की संप्रभुता होती है एवं इसमें सभी जीवित और गैर-जीवित संसाधन शामिल हैं। अनन्य आर्थिक क्षेत्र ( Exclusive Economic Zone-EEZ): EEZ बेसलाइन से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक फैला होता है। इसमें तटीय देशों को सभी प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन का संप्रभु अधिकार प्राप्त होता है।

भारत और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन

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IMO द्वारा घोषित नए नियमों के अनुसार, सभी व्यापारिक जहाज़ 1 जनवरी, 2020 से 0.5 प्रतिशत से अधिक सल्फर सामग्री वाले ईंधन का प्रयोग नहीं कर सकेंगे। इससे पूर्व सल्फर सामग्री की यह सीमा 3.5 प्रतिशत तक थी। संगठन के इस निर्णय से जहाज़ों से उत्सर्जित होने वाले सल्फर ऑक्साइड (SOx) में 77 प्रतिशत की गिरावट आएगी। अंतत: अम्लीय वर्षा और समुद्र के अम्लीकरण को रोकने में भी मदद मिलेगी। सल्फर ऑक्साइड के संबंध में यह नई सीमा जहाज़ों से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम हेतु अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (MARPOL) का हिस्सा है। ज्ञात हो कि MARPOL अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन के तत्त्वावधान में की गई एक प्रमुख पर्यावरण संधि है। यह निर्णय सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 14 - स्थायी सतत् विकास के लिये महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उपयोग के साथ मेल खाता है।

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष संस्था है, जिसकी स्थापना वर्ष 1948 में जिनेवा सम्मेलन के दौरान एक समझौते के माध्यम से की गई थी। IMO की पहली बैठक इसकी स्थापना के लगभग 10 वर्षों पश्चात् वर्ष 1959 में हुई थी। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के कुल 174 सदस्य तथा 3 एसोसिएट सदस्य हैं और इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय मानक-निर्धारण प्राधिकरण है जो मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा में सुधार करने और जहाज़ों द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने हेतु उत्तरदायी है।

शिपिंग वास्तव में एक अंतर्राष्ट्रीय उद्योग है और इसे केवल तभी प्रभावी रूप से संचालित किया जा सकता है जब नियमों और मानकों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जाए। ध्यातव्य है कि IMO अपनी नीतियों को लागू करने के लिये ज़िम्मेदार नहीं है और न ही IMO के पास नीतियों के प्रवर्तन हेतु कोई तंत्र मौजूद है। इसका मुख्य कार्य शिपिंग उद्योग के लिये एक ऐसा नियामक ढाँचा तैयार करना है जो निष्पक्ष एवं प्रभावी हो तथा जिसे सार्वभौमिक रूप से अपनाया व लागू किया जा सके।

UNSC चुनावों से पूर्व भारत का 'प्राथमिकता पत्र' अभियान

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विदेश मंत्रालय ने 17 जून, 2020 को होने वाले ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC) के चुनावों में निर्वाचित सीट जीतने के लिये भारत की ‘प्राथमिकताओं की रूपरेखा’ तैयार कर इसे एक अभियान के रूप में शुरू किया है। ये चुनाव ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC) के 5 गैर-स्थायी सदस्यों (Non-Permanent Member) के आगामी कार्यकाल (वर्ष 2021-22) के लिये होने हैं। भारत G-4 समूह (भारत, जापान, ब्राज़ील और जर्मनी) के देशों के साथ UNSC में स्थायी सदस्यता के लिये भी मांग कर रहा है।

'प्राथमिकता पेपर' (Priorities Paper) के अनुसार, भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं की सूची निम्नानुसार है:
  1. प्रगति के नवीन अवसर;
  2. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी प्रतिक्रिया;
  3. बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार;
  4. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण;
  5. समस्याओं के समाधान के लिये मानव स्पर्श (Human Touch) को ध्यान में रखकर प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना।

अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्धारित पाँच 'एस' अर्थात सम्मान, संवाद, सहयोग, शांति, समृद्धि के आधार पर प्रचारित किया जाएगा। UNSC के स्थायी तथा गैर-स्थायी सदस्य:-UNSC 15 सदस्यों से मिलकर बनी होती है, जिसमे पाँच स्थायी सदस्य; चीन, फ्रांँस, रूसी संघ, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। दस गैर-स्थायी सदस्य महासभा द्वारा दो वर्ष के लिये चुने जाते हैं। गैर-स्थायी सदस्यों बेल्जियम, डोमिनिकन गणराज्य, एस्टोनिया, जर्मनी, इंडोनेशिया, नाइजर, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस, दक्षिण अफ्रीका, ट्यूनीशिया, वियतनाम। दस गैर-स्थायी सीटों को क्षेत्रीय आधार पर वितरित किया गया है:

पाँच सीट अफ्रीकी और एशियाई देशों के लिये;
एक सीट पूर्वी यूरोपीय देशों के लिये;
लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों के लिये दो सीट;
पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों के लिये दो सीट।

भारत को यदि इस बार भी UNSC की गैर-स्थायी सीट के लिये चुना जाता है तो भारत गैर-स्थायी सीट पर आठवीं बार चुना जाने वाला देश होगा। अंतिम बार वर्ष 2011-2012 में भारत को गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना गया था। भारत को पहले ही सात बार वर्ष 1950-1951, वर्ष 1967-1968, वर्ष 1972-1973, वर्ष 1977-1978, वर्ष 1984-1985, वर्ष 1991-1992 और वर्ष 2011-2012 की अवधि के लिये गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना गया था।

L-69 समूह:-ये समूह भारत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के क़रीब 42 विकासशील देशों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है। L-69 समूह ने UNSC सुधार मोर्चा पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

अफ्रीकी समूह:-अफ्रीकी समूह में 54 देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की वकालत करने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण समूह है। इस समूह की मांग है कि अफ्रीका के कम से कम दो राष्ट्रों को वीटो की शक्तियों के साथ सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाए।

विश्व आर्थिक फोरम

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स्विट्ज़रलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की वार्षिक बैठक के दौरान ‘एचआईवी/एड्स पर संयुक्त राष्ट्र का कार्यक्रम’ (The Joint United Nations Programme on HIV/AIDS- UNAIDS) के उच्च स्तरीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस गोलमेज़ सम्मेलन का विषय (Theme) ‘एक्सेस फॉर ऑलः लीवरेजिंग इनोवेशंस, इंवेस्टमेंट्स एंड पार्टनरशिप्स फॉर हेल्थ’ (Access for all: Leveraging Innovations, Investments and Partnerships for Health) है। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये खतरे के रूप में एड्स को समाप्त करने हेतु समर्पित संयुक्त राष्ट्र की यह एजेंसी दुनिया भर के शीर्ष राजनेताओं और सरकारों के सहयोग से यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का अधिकार केवल अमीरों का विशेषाधिकार न रहे बल्कि सभी को समान रूप से उपलब्ध हो।

संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (UN International Labour Organization- ILO)

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ILO ने विश्व रोज़गार और सामाजिक दृष्टिकोण रुझान रिपोर्ट (World Employment and Social Outlook Trends Report- WESO Trends Report), 2020 को प्रकाशित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में वैश्विक बेरोज़गारी में लगभग 2.5 मिलियन की वृद्धि का अनुमान है। ILO की इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020-2030 में विकासशील देशों में मध्यम या चरम कार्यशील गरीबी बढ़ने की उम्मीद है, जिससे वर्ष 2030 तक गरीबी उन्मूलन पर सतत् विकास लक्ष्य 1 (SDG- 1) को प्राप्त करने में बाधा आएगी। श्रम की कमी और खराब गुणवत्ता वाली नौकरियों का आशय है कि हमारी अर्थव्यवस्था और समाज मानव प्रतिभा के विशाल पूल के संभावित लाभों को गँवा रहे हैं।

भारत में बेरोज़गारी से संबंधित आँकड़े:-CMIE की अक्तूबर 2019 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरी बेरोज़गारी दर 8.9% और ग्रामीण बेरोज़गारी दर 8.3% अनुमानित है।

उल्लेखनीय है अक्तूबर 2019 में भारत की बेरोज़गारी दर बढ़कर 8.5% हो गई, जो अगस्त 2016 के बाद का उच्चतम स्तर है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य स्तर पर सबसे अधिक बेरोज़गारी दर त्रिपुरा (27%) हरियाणा (23.4%) और हिमाचल प्रदेश (16.7) में आँकी गई। जबकि सबसे कम बेरोज़गारी दर तमिलनाडु (1.1%), पुद्दुचेरी (1.2%) और उत्तराखंड (1.5%) में अनुमानित है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(International Labour Organization- ILO) श्रम संबंधी समस्याओं/मामलों, मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक, सामाजिक संरक्षा तथा सभी के लिये कार्य अवसर जैसे मामलों को देखती है।

यह संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों से इतर एक त्रिपक्षीय एजेंसी है, अर्थात् इसके पास एक ‘त्रिपक्षीय शासी संरचना’ (Tripartite Governing Structure) है, जो सरकारों, नियोक्ताओं तथा कर्मचारियों का (सामान्यतः 2:1:1 के अनुपात में) इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व करती है। यह संस्था अंतर्राष्ट्रीय श्रम कानूनों का उल्लंघन करने वाली संस्थाओं के खिलाफ शिकायतों को पंजीकृत तो कर सकती है, किंतु सरकारों पर प्रतिबंध आरोपित नहीं कर सकती है। इस संगठन की स्थापना प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् ‘लीग ऑफ नेशन्स’ (League of Nations) की एक एजेंसी के रूप में सन् 1919 में की गई थी। भारत इस संगठन का संस्थापक सदस्य रहा है। इस संगठन का मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा में स्थित है। वर्तमान में 187 देश इस संगठन के सदस्य हैं, जिनमें से 186 देश संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से हैं तथा एक अन्य दक्षिणी प्रशांत महासागर में अवस्थित ‘कुक्स द्वीप’ (Cook's Island) है। वर्ष 1969 में इसे प्रतिष्ठित ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ प्रदान किया गया था।

व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD)

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UNCTAD द्वारा वैश्विक निवेश रुझान मॉनीटर रिपोर्ट 2019 जारी की गई। भारत, वर्ष 2019 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के शीर्ष 10 प्राप्तकर्त्ताओं में शामिल रहा है, इसका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 49 बिलियन अमेरिकी डॉलर है। वर्ष 2019 में वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 1.39 ट्रिलियन डॉलर रहा। वर्ष 2018 में संशोधित FDI 1.41 ट्रिलियन डॉलर था, अर्थात् वर्ष 2019 में वर्ष 2018 की तुलना में वैश्विक FDI में 1 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। विकासशील देश वैश्विक FDI के लगभग आधे से अधिक FDI प्राप्त करते हैं। ध्यातव्य है कि दक्षिण एशिया ने FDI में 10 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि दर्ज की है। गौरतलब है कि भारत ने वर्ष 2018 की तुलना में FDI प्राप्ति में 16% वृद्धि की है, जो दक्षिण एशिया के FDI प्राप्ति में वृद्धि का मुख्य कारण है।

वर्ष 1964 में स्थापित UNCTAD विकासशील देशों के विकास के अनुकूल उनके एकीकरण को विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ावा देता है। यह एक स्थायी अंतर-सरकारी निकाय है। इसका मुख्यालय जिनेवा (Geneva), स्विट्ज़रलैंड में है। इसके द्वारा प्रकाशित कुछ प्रमुख रिपोर्ट:

  1. व्यापार और विकास रिपोर्ट (Trade and Development Report)
  2. विश्व निवेश रिपोर्ट (World Investment Report)
  3. न्यूनतम विकसित देश रिपोर्ट (The Least Developed Countrie Report)
  4. सूचना एवं अर्थव्यवस्था रिपोर्ट (Information and Economy Report)
  5. प्रौद्योगिकी एवं नवाचार रिपोर्ट (Technology and Innovation Report)
  6. वस्तु तथा विकास रिपोर्ट (Commodities and Development Report)

क्यूबा और मानवाधिकार परिषद

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अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ (Mike Pompeo) ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों से आग्रह किया है कि वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council) में शामिल होने के लिये क्यूबा (Cuba) के दावे का समर्थन न करें। माइक पोम्पिओ ने क्यूबा द्वारा अन्य देशों को भेजे जाने वाले चिकित्सकों की प्रक्रिया को एक प्रकार की मानव तस्करी के रूप में परिभाषित किया। अन्य देशों में चिकित्सक भेजना क्यूबा के लिये विदेशी मुद्रा का एक मुख्य स्रोत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिकी प्रशासन ने क्यूबा के साथ अपने राजनयिक रिश्तों को लगभग समाप्त कर दिया है। क्यूबा इससे पूर्व वर्ष 2014-2016 और वर्ष 2017-2019 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में शामिल था, क्यूबा ने वर्ष 2021-2023 के लिये क्षेत्रीय रिक्तियों में से एक को भरने के लिये आवेदन किया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में सीटों को भौगोलिक रूप से वितरित किया जाता है और वे तीन वर्ष की अवधि के लिये कार्यभार संभालते हैं।

वर्ष 2018 में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से अपना नाम वापस ले लिया था, इस संबंध में राजदूत निक्की हेली (Nikki Haley) ने UNHRC को मानव अधिकारों का मजाक उड़ाने वाले संगठन के रूप में परिभाषित किया था।

अमेरिका ने खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा इज़राइल की निंदा करने वाले प्रस्ताव को अपनाने के लिये परिषद को दोषी ठहराया था।

चिकित्सा के माध्यम से सेवा या मानव तस्करी? गौरतलब है कि क्यूबा में लंबे समय तक आम लोगों की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगा था और यह अधिकार केवल कुछ विशिष्ट लोगों के पास तक ही सीमित था। क्यूबा ने सबसे पहले वर्ष 1963 में अल्जीरिया में अपने चिकित्सकों का एक समूह भेजा था, क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वह स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी का सामना कर रहा था। इसके पश्चात् क्यूबा ने खराब स्वास्थ्य प्रणाली और संकट का सामना कर रहे कई देशों में भी अपने चिकित्सकों के समूह भेजे। 1980 के दशक से पूर्व क्यूबा के ये मिशन पूरी तरह से मानवीय सहायता पर आधारित थे, किंतु 1980 के दशक के बाद क्यूबा के ये चिकित्सा मिशन वाणिज्यिक लाभ प्राप्त करने के लिये किये जाने लगे। बर्लिन की दीवार गिरने के बाद क्यूबा को सोवियत संघ से प्राप्त होने वाली सब्सिडी में भारी कमी देखने को मिली, जिससे अन्य देशों में चिकित्सकों को भेजने का वाणिज्यिक कार्य और तेज़ होने लगा। क्यूबा की इस नीति ने और अधिक वाणिज्यिक रूप तब ले लिया, जब क्यूबा ने वेनेज़ुएला के साथ वर्ष 2000 और वर्ष 2005 में हस्ताक्षित दो व्यापार समझौतों के हिस्से के रूप में चिकित्सा सहयोग कार्यक्रम (Medical Cooperation Program) स्थापित किया। गौरतलब है कि ‘ऑयल फॉर डॉक्टर्स’ के नाम से प्रसिद्ध इस कार्यक्रम में प्रतिदिन 105,000 बैरल तेल के बदले में 30,000 से अधिक क्यूबा के चिकित्सकों और दंत चिकित्सकों का वेनेज़ुएला में निर्यात करना शामिल था। एक अनुमान के मुताबिक क्यूबा के 40000 से अधिक चिकित्सक वर्तमान में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुल 66 देशों में कार्य कर रहे हैं। ध्यातव्य है कि बीते कई वर्षों में इन कार्यक्रमों के दौरान क्यूबा सरकार पर चिकित्सकों के श्रम अधिकारों का उल्लंघन करने और अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों का पालन न करने का आरोप लगा है। इस संबंध में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्राज़ील की सरकार क्यूबा के प्रत्येक चिकित्सक को भोजन, परिवहन और स्वास्थ्य बीमा के अलावा वेतन के तौर पर 4150 अमेरिकी डॉलर का भुगतान करती है, किंतु क्यूबा के चिकित्सकों को असल में केवल 1000 अमेरिकी डॉलर ही प्राप्त होते हैं, और उसमें से भी 600 अमेरिकी डॉलर उन्हें बैंक खाते में जमा किये जाते हैं, जो वे अपना मिशन खत्म होने के बाद ही प्राप्त कर सकते हैं। शेष बची हुई राशि क्यूबा सरकार द्वारा अधिग्रहित कर ली जाती है। इसलिये कई अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ क्यूबा की इस स्थिति को चिकित्सकों की मानव तस्करी के रूप में परिभाषित करते हैं।

अमेरिका और क्यूबा के संबंध 1959 के बाद से ही अविश्वास और मनमुटाव से त्रस्त हैं। वर्ष 1959 में ही फिडेल कास्त्रो (Fidel Castro) ने अमेरिका द्वारा समर्थित शासन को उखाड़ फेंका था और वहाँ सोवियत संघ के साथ संबद्ध एक समाजवादी राज्य की स्थापना की थी।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (United Nations Relief and Works Agency-UNRWA)

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भारत ने वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र की फिलिस्तीन शरणार्थी एजेंसी को 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान देने की पेशकश की है। UNRWA के मुख्य बजट में अपने वार्षिक वित्तीय योगदान को वर्ष 2016 के 1.25 मिलियन अमेरिकी डालर से चार गुना बढ़ाकर वर्ष 2018 में 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर कर दिया है। UNRWA में वित्तीय योगदान की प्रकृति स्वैच्छिक होने के कारण इस वर्ष UNRWA के लिये आवश्यक 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि में से केवल 200 मिलियन डॉलर ही प्राप्त हुए है। इससे फिलिस्तीनी शरणार्थियों को मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करने में समस्या हो रही है। UNRWA की एक तदर्थ बैठक में 23 देशों ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिये वित्तीय सहायता देने की पेशकश की है। भारत ने सभी देशों से वित्तीय सहायता की राशि में बढ़ोत्तरी की अपील भी की है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, UNRWA की गतिविधियों से शिक्षा में विशेष लाभ हुआ है साथ ही एजेंसी ने लाखों लोगों को मौलिक सेवाएँ भी प्रदान की हैं। संयुक्त राष्ट्र ने मौजूदा वित्तपोषण में कमी को देखते हुए सदस्य देशों से सहायता राशि बढ़ाने का आह्वान किया है। वर्तमान में फिलीस्तीनी शरणार्थियों की संख्या 5.4 मिलियन है जो पूरे विश्व के शरणार्थियों का 20% है। भारत और फिलिस्तीन: वर्तमान में भारत, फिलिस्तीन में संस्थानों, सेवाओं और प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता निर्माण का कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त फिलिस्तीनी पेशेवरों को तकनीकी और वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रहा है। भारत-फिलिस्तीन विकास साझेदारी के तहत पिछले पाँच वर्षों के दौरान कृषि, स्वास्थ्य देखभाल, सूचना प्रौद्योगिकी, युवा मामलों, महिला सशक्तीकरण और मीडिया के क्षेत्र में 17 समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए हैं। UNRWA जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में आपातकालीन मानवीय सहायता प्रदान कर रहा है। UNRWA स्वास्थ्य, शिक्षा, राहत कार्य और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से इस क्षेत्र के लोगों को मौलिक सुविधाएँ प्रदान करके उनका जीवन स्तर सुधारने का प्रयास कर रहा है।

इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष यूरोप में यहूदियों की जनसंख्या कम परंतु प्रभाव अधिक होने के कारण संघर्ष की स्थिति पैदा हुई। इसी दौरान वर्ष 1897 में यहूदी आंदोलन की शुरुआत हुई और वृहद् यहूदी राष्ट्र की महत्त्वाकाँक्षा लिये यहूदियों ने यूरोप से फिलिस्तीन के क्षेत्रों की ओर पलायन किया। बाल्फोर घोषणा और साइक्स-पिकॉट (Sykes-Picot Agreement) समझौते के बाद इस क्षेत्र में यहूदियों का पलायन और बढ़ा, इससे धार्मिक संघर्षो की भी शुरुआत हुई। वर्तमान में यह क्षेत्र विश्व के सबसे अशांत क्षेत्रों में से एक है।


शरणार्थी समस्या: वर्ष 1948 में इज़राइल के ऊपर मिस्त्र ,जॉर्डन, इराक और सीरिया ने आक्रमण कर दिया। इस घटना के बाद इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच भी सशस्त्र संघर्ष शुरू हो गया। इन सभी घटनाओं के बाद शरणार्थी समस्या की शुरुआत हुई। 6 दिवसीय(Six Days) और योम किप्यूर के युद्धों के बाद तो शरणार्थी समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया।

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के वर्तमान कारण: येरूशलम पर अधिकार को लेकर दोनों देशों में संघर्ष होता रहा है। इज़राइल के द्वारा वर्तमान में तेल अवीब से अपनी राजधानी येरुशलम स्थानांतरित करने का भी फिलिस्तीन द्वारा विरोध किया गया। शरणार्थियों के पुनर्वास को लेकर भी दोनों देशों में मतभिन्नता की स्थिति है। इज़राइल इन्हें फिलिस्तीन में पुनर्स्थापित करना चाहता है और फिलिस्तीन इन्हें वास्तविक स्थानों पर पुनर्स्थापित करने की बात कहता है। फिलिस्तीन, इज़राइल की प्रसारकारी नीतिओं का भी लगातार विरोध कर रहा है। UN द्वारा उठाये गये कदम: वर्ष 1947 में फिलिस्तीन-इज़राइल संघर्ष पर स्थायी समिति बनाई गई। वर्ष 1973 में सीज़ फायर रोकने के लिये संकल्प 338 पारित किया गया। ओस्लो शांति समझौते, मेड्रिड शांति प्रक्रिया, कैंप डेविड सम्मेलन के माध्यम से भी इस समस्या के समाधान के समाधान के प्रयास किये गए। यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका (US), संयुक्त राष्ट्र (UN) और रूस द्वारा वर्ष 2003 में एक शांति प्रस्ताव लाया गया। येरूशलम को राजधानी निर्धारित करने पर भी महासभा द्वारा इज़राइल की आलोचना की गई। उपरोक्त प्रयासों के बावजूद भी आज तक इस समस्या का समाधान नही किया जा सका है।

इस मुद्दे पर भारत का दृष्टिकोण: भारत वर्ष 1974 में फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला गैर-इस्लामिक राष्ट्र था। भारत ने UN में फिलिस्तीन की पूर्ण सदस्यता और येरुशलम को राजधानी बनाने संबंधी प्रस्तावों का भी सदैव समर्थन किया है। वर्तमान की बदलती भू-राजनीति और कृषि के आधुनिकीकरण, हथियार, विज्ञान प्रौद्यौगिकी जैसी आवश्यकताओं के कारण भारत का झुकाव इज़राइल की तरफ हो रहा है।

  1. https://news.un.org/hi/story/2019/12/1020621