• 10 मई, 2020 को COVID-19 महामारी के दौरान भारतीय नौसेना ने मालदीव, मॉरीशस, सेशल्स, मेडागास्कर एवं कोमोरोस देशों को सहायता पहुँचाने के लिये ‘मिशन सागर’ (MISSION SAGAR) प्रारंभ किया। इस मिशन के तहत भारतीय नौसेना के जहाज़ ‘केसरी’ को हिन्द महासागरीय देशों में खाद्य वस्तुएँ, COVID-19 से संबंधित दवाएँ, विशेष आयुर्वेदिक दवाएँ एवं चिकित्‍सा सहायता दलों के साथ भेजा गया है। यह अभियान भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय एवं अन्य एजेंसियों के साथ नज़दीकी समन्वय के साथ शुरू किया गया है।

यह मिशन प्रधानमंत्री की ‘सागर’ (Security and Growth for All in the Region -SAGAR) पहल के अनुरूप है जो भारत द्वारा उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के महत्त्व को रेखांकित करता है एवं मौजूदा संबंधों को और मज़बूत करता है

  • भारत निर्वाचन आयोग ने दक्षिण एशिया के चुनाव प्रबंधन निकायों के फोरम (Forum of the Election Management Bodies of South Asia-FEMBoSA) की नई दिल्ली में आयोजित 10वीं वार्षिक बैठक की मेज़बानी की। मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा को वर्ष 2020 के लिये दक्षिण एशिया के चुनाव प्रबंधन निकाय के अध्यक्ष के रूप चुना गया है।

इस अवसर पर ‘संस्थागत क्षमता को मजबूत करना’(Strengthening Institutional Capacity) विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। इस सम्‍मेलन में FEMBoSA के सदस्‍य देशों के प्रतिनिधियों के अलावा कज़ाखस्तान, केन्या, किर्गिज़स्तान, मॉरीशस, ट्यूनीशिया और तीन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों– सियोल स्थित विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ (Association of World Election Bodies), संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित इंटरनेशनल फाउंडेशन ऑफ इलेक्टोरल सिस्टम (IFES) तथा इंटरनेशनल आईडीईए (International Institute for Democracy and Electoral Assistance) के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। FEMBoSA के बारे में: इस फोरम का गठन सार्क देशों के चुनाव प्रबंधन निकायों (Election Management Bodies- EMBs) की मई 2012 में आयोजित बैठक के दौरान किया गया था। इस फोरम का लक्ष्य सार्क के निर्वाचन निकायों के सामान्य हितों के संबंध में आपसी सहयोग को बढ़ाना है। भारत निर्वाचन आयोग के अलावा इस फोरम के अन्य सात सदस्य अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका के चुनाव प्रबंधन निकाय हैं। FEMBoSA का उद्देश्य: इस फोरम के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

सार्क देशों के चुनाव प्रबंधन निकायों के बीच संपर्क को बढ़ावा देना। एक-दूसरे के अनुभवों को साझा करना। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संचालन के लिये चुनाव प्रबंधन निकायों की क्षमता को बढ़ाने में एक- दूसरे का सहयोग करना।

  • भारत ने 180 देशों को लगभग 85 मिलियन हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) टेबलेट और करीब 500 मिलियन पारासिटामोल टेबलेट की आपूर्ति की है।

भारतीय वायु सेना के विशेष वायुयान से मॉरीशस एवं सेशेल्स को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टेबलेट उपहार के रूप में भेजा गया। भारत ने सेशेल्स, कोमोरोस, मेडागास्कर, मॉरीशस एवं मालदीव जैसे हिंद महासागरीय देशों में मेडिकल टीम, दवा इत्यादि की आपूर्ति हेतु नेवी के INS केसरी लैंडिंग जहाज को तैनात किया था। दो मेडिकल सहयोगी टीम युद्ध-पोत पर सवार थे जिन्हें कोमोरोस एवं मारीशस में तैनात किया जाएगा।

सागर (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीज़न):- वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री के मॉरीशस यात्रा के दौरान इस विज़न की शुरुआत की गई थी जिसका उद्देश्य ब्लू इकॉनमी पर ध्यान केंद्रित करना था। यह समुद्री सुरक्षा, साझेदारी एवं सहयोग के महत्त्व में वृद्धि की एक पहचान हैं।

भारत 'सागर' के माध्यम से अपने समुद्री पड़ोसियों के साथ आर्थिक एवं सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने का प्रयास करता है और उनकी समुद्री सुरक्षा क्षमता को बढ़ाने में सहयोग करता है। इसके लिए भारत उनकी क्षमताओं को मजबूत करने, बुनियादी ढाँचा को बेहतर बनाने, तटीय सर्विलांस सूचनाओं को साझा करने पर सहयोग करेगा। 'सागर विज़न' की प्रासंगिकता को भारत के अन्य नीतियों के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है, जैसे -ब्लू अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करना, प्रोजेक्ट मौसम, प्रोजेक्ट सागरमाला ,एक्ट ईस्ट पॉलिसी इत्यादि के साथ भारत एक संपूर्ण सुरक्षा प्रदाता (net security provider) के रूप में सामने आना चाहता है। ब्लू इकॉनमी- विश्व बैंक के अनुसार, नीली अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसमें महासागर के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के साथ आर्थिक वृद्धि, सुधार, आजीविका और रोज़गार के लिए महासागर के संसाधनों का उपयोग उपयुक्त तरीके से किया जाए।

भारत और नेपाल

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नेपाल की संसद के निचले सदन (Lower House) ने नेपाल के अद्यतित (Updated) राजनीतिक मानचित्र को संवैधानिक मान्यता देने के लिये द्वितीय संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है, उल्लेखनीय है कि इस मानचित्र में उत्तराखंड (भारत) के कुछ हिस्सों को नेपाली क्षेत्र के रूप में प्रदर्शित किया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था, जिसका विरोध करते हुए नेपाल ने 20 मई को अपने नए नक्शे का अनावरण किया था। इससे पूर्व भी जब भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने के बाद अपना नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था तो भी नेपाल ने काफी विरोध किया था। नेपाल के अनुसार, भारत को 1950 के दशक में इस क्षेत्र में सेना तैनात करने की अनुमति दी गई थी, किंतु बाद में भारत ने इस क्षेत्र से अपनी सेना हटाने से इनकार कर दिया, जिसके कारण नेपाल को यह कदम उठाना पड़ा।

कुछ समय पूर्व नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया था, जिसमें उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को नेपाल का हिस्सा बताया गया था।

नेपाल के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली नदी के पूर्व में अवस्थित सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं, भारत इस क्षेत्र को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा मानता है।

1 नवंबर, 1814 को अंग्रेज़ों ने नेपाल के विरोध युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध आगामी दो वर्षों तक चला और वर्ष 1815 तक ब्रिटिश सेना ने गढ़वाल और कुमाऊँ से नेपाली सेना को बाहर निकल दिया। एक वर्ष बाद (वर्ष 1816) में सुगौली संधि पर हस्ताक्षर के साथ युद्ध समाप्त हो गया। इस संधि के तहत नेपाल की सीमाओं का निर्धारण किया गया, जो कि आज भी मौजूद है।

कालापानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले के पूर्वी हिस्से में स्थित एक क्षेत्र है। यह क्षेत्र उत्तर में चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ अपनी सीमा साझा करता है, वहीं पूर्व और दक्षिण में इसकी सीमा नेपाल से लगती है। इस क्षेत्र का प्रशासन भारत द्वारा किया जाता है, किंतु नेपाल ऐतिहासिक और भौगोलिक कारणों से इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।

यह क्षेत्र नेपाल और भारत के बीच सबसे बड़ा क्षेत्रीय विवाद है, जिसमें कम-से-कम 37,000 हेक्टेयर भूमि शामिल है।

भारत-मालदीव

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मालदीव की सरकार के अनुरोध पर,भारतीय वायु सेना ने ऑपरेशन संजीवनी के माध्यम से आवश्यक दवाइयों तथा अस्पताल के उपयोग संबंधी 6.2 टन सामग्री को मालदीव पहुँचाया। परिवहन विमान C-130J के माध्यम से मालदीव की उड़ान से पहले नई दिल्ली,मुंबई,चेन्नई और मदुरै में हवाई अड्डों से इन दवाओं को एयर-लिफ्टिंग की। दवाइयों तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं को भारत में आठ आपूर्तिकर्ताओं से खरीदा गया था, लेकिन COVID- 19 महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन के कारण किसी अन्य माध्यम से इन्हे मालदीव ले जाना संभव नहीं हो सकता था।

कुछ समय पूर्व ही भारत ने सेना के 14-सदस्यीय मेडिकल दल को एक वायरल परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करने के लिये मालदीव भेजा था। इसके अलावा भारत सरकार द्वारा मालदीव को 5.5 टन आवश्यक दवाएँ उपहार के रूप में भेंट की गईं। सरकार की अन्य पहल:- COVID- 19 महामारी पर कार्य कर स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा से संबंधित उपकरणों का आयात करने में भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियों की मदद करने के लिये भी भारत सरकार ने कदम उठाए हैं। इसके लिये भारत सरकार ने एयर इंडिया की शंघाई तथा हांगकांग कार्गो उड़ान संचालित करने के लिये चीन से मंज़ूरी प्राप्त कर ली है।

ऑपरेशन नीर (Operation Neer): 04 सितंबर 2014 को माले (मालदीव) को अपने मुख्य RO प्लांट के खराब होने से गंभीर पेयजल संकट का सामना करना पड़ा। संयंत्र के पुनः चालू होने तक शहर को प्रतिदिन केवल 100 टन पानी के साथ निर्वाह करना पड़ रहा था।

मालदीव सरकार के अनुरोध पर, भारतीय वायुसेना ने तीन C-17 तथा तीन IL- 76 विमानों को दिल्ली से अराक्कोनम (Arakkonam) तथा उसके बाद माले तक एयरलिफ्ट करने के लिये तैनात किया गया। 05-07 सितंबर के बीच, IAF ने माले को 374 टन पीने के पानी की आपूर्ति की।

ऑपरेशन कैक्टस (Operation Cactus)

3 नवंबर, 1988 की रात को भारतीय वायु सेना ने मालदीव के लिये इस अभियान को शुरू किया। मालदीव द्वारा भाड़े के आक्रमणकारियों (Mercenary Invasion) के खिलाफ सैन्य मदद की अपील करने पर IAF के IL-76s, An- 2s, An-32s ने त्रिवेंद्रम से मालदीव के लिये उड़ान भरी, जबकि IAF मिराज 2000s द्वारा आसपास के द्वीपों पर निगरानी की गई। इस ऑपरेशन ने भारतीय वायुसेना की सामरिक एयरलिफ्ट क्षमता को प्रदर्शित किया।

ऑपरेशन राहत (Operation Rahat):

अरब बलों के गठबंधन (Coalition Arab Forces) ने मार्च 2015 में यमन में हवाई हमले शुरू कर दिये। ऐसे में यमन के विभिन्न स्थानों पर फँसे 4000 से अधिक भारतीय नागरिकों को तत्काल निकाले जाने की आवश्यकता थी। भारतीय नागरिकों की निकासी के लिये विदेश मंत्रालय, भारतीय वायुसेना, भारतीय नौसेना और एयर इंडिया की संयुक्त टीम ने ऑपरेशन को पूरा करने पर कार्य किया।

भारत-बांग्लादेश

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20 मई को दोनों देशों के बीच ‘अंतर्देशीय जल पारगमन एवं व्यापार प्रोटोकॉल’ (Protocol on Inland Water Transit and Trade- PIWT & T) के द्वितीय परिशिष्ट पर हस्ताक्षर किये गए। परिशिष्ट, 2020 पर भारत की तरफ से भारतीय उच्चायुक्त एवं बांग्लादेश की तरफ से सचिव (जहाज़रानी) द्वारा 20 मई, 2020 को हस्ताक्षर किये गए। नवीन समझौते के बाद ‘भारत बांग्लादेश प्रोटोकॉल’ (Indo Bangladesh Protocol- IBP) के तहत परिवहन मार्गों की संख्या 8 से बढ़ाकर 10 हो गई है। IBP मार्गों पर अनेक नवीन अवस्थतियों को ‘पोर्टस ऑफ कॉल’ (Ports of Call) के रूप में जोड़ा जाएगा। अंतर्देशीय जल पारगमन और व्यापार पर प्रोटोकॉल: भारत और बांग्लादेश के बीच हस्ताक्षरित अंतर्देशीय जल पारगमन और व्यापार प्रोटोकॉल दीर्घकालिक व्यापार सुनिश्चितता की दिशा में किया गया प्रोटोकॉल है। यह समझौता किसी तीसरे देश में भी माल परिवहन की अनुमति देता है। दोनों देशों के बीच ‘अंतर्देशीय जल पारगमन और व्यापार प्रोटोकॉल’ पर ‘ भारत-बांग्लादेश व्यापार समझौते’ (Trade Agreement between Bangladesh & India Protocol) प्रोटोकॉल के अनुच्छेद (viii) के अनुसार, हस्ताक्षर किये गए थे। इस प्रोटोकॉल पर पहली बार वर्ष 1972 (बांग्लादेश की आज़ादी के तुरंत बाद) में हस्ताक्षर किये गए थे। अंतिम बार वर्ष 2015 में पाँच वर्षों के लिये नवीकरण किया गया था। समझौते का प्रत्येक पाँच वर्षों की अवधि के बाद स्वचालित रूप से नवीनीकरण किया जाता है। प्रमुख पारगमन मार्ग:

  1. कोलकाता-चांदपुर-पांडु-सिलघाट-कोलकाता
  2. कोलकाता-चांदपुर-करीमगंज-कोलकाता
  3. सिलघाट-पांडु-अशुगंज-करीमगंज-पांडु-सिलघाट
  4. राजशाही-धूलियन-राजशाही।
  5. कोलकाता-चांदपुर-आशूगंज (जलमार्ग से)
  6. अखुरा-अगरतला (सड़क मार्ग से)

पोर्टस् ऑफ कॉल अंतर्देशीय व्यापार में जहाज़ों को आने-जाने की सुविधाएँ प्रदान करते हैं। वर्तमान में प्रोटोकॉल के तहत भारत और बांग्लादेश दोनों में 6-6 ‘पोर्टस ऑफ कॉल’ हैं। नवीन समझौते के माध्यम से पाँच नवीन ‘पोर्टस ऑफ कॉल’ तथा दो ‘विस्तारित पोर्टस ऑफ कॉल’ जोड़े गए हैं जिससे प्रत्येक देश में इनकी संख्या बढ़ कर 11 हो गई है। पारगमन मार्गों का महत्त्व:-भारत में जोगीगोफा और बांग्लादेश में बहादुराबाद को नए ‘पोर्टस ऑफ काल’ के रूप में सम्मिलित किया गया है। यह मेघालय, असम एवं भूटान को कनेक्टिविटी की सुविधा प्रदान करेगा। जोगीगोफा में एक ‘मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्क’ बनाए जाने का प्रस्ताव है। नए पोर्टस ऑफ कॉल, भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल (IBP) मार्गों पर कार्गो की लोडिंग एवं अनलोडिंग की सुविधा प्रदान करेंगे। नवीन ‘पोर्टस ऑफ कॉल’ के निर्माण से इसके परिक्षेत्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहन मिलेगा। संगठित तरीके से कार्गो पोतों की आवाज़ाही में पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय पारगमन कार्गो मुख्य रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र में बिजली परियोजनाओं के लिये कोयला, फ्लाई ऐश आदि का परिवहन करते हैं। भारत से बांग्लादेश को फ्लाई ऐश का निर्यात मुख्यत: इन कार्गो के माध्यम से किया जाता है जो 3 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष होता है। निष्कर्ष: लगभग 638 अंतर्देशीय पोतों द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 4000 माल परिवहन यात्राएँ की जाती हैं। ऐसी उम्मीद की जाती है कि प्रोटोकॉल में किया गया संशोधन बेहतर विश्वसनीयता एवं लागत के दृष्टिकोण से बेहतर सिद्ध होगा तथा दोनों देशों के बीच व्यापार को और अधिक सुगम बनाएगा

  • बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत की अपनी चार दिवसीय (3-6 अक्तूबर, 2019) आधिकारिक यात्रा संपन्न की है। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने विश्व आर्थिक मंच के भारत आर्थिक शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व किया और साथ ही सम्मेलन को भी संबोधित किया। सम्मेलन के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी की। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत और बांग्लादेश के मध्य गहन द्विपक्षीय संबंधों और बढ़ती परस्पर निर्भरता को दर्शाती है।

राष्ट्र प्रमुखों की बैठक और उसके मुख्य बिंदु: बैठक के दौरान दोनों देशों के प्रमुखों ने संबंधों को मज़बूती प्रदान करने के लिये कुल 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किये और 3 परियोजनाओं का उद्घाटन भी किया। सात समझौतों में शामिल हैं:-

  1. भारत और विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत से माल की आवाजाही के लिये बांग्लादेश में छत्रोग्राम और मोंगला बंदरगाहों का उपयोग।
  2. त्रिपुरा में पेयजल आपूर्ति के लिये बांग्लादेश की फेनी नदी के जल का उपयोग।
  3. बांग्लादेश के लिये लाइन ऑफ क्रेडिट के कार्यान्वयन के भारत की प्रतिबद्धता से संबंधित समझौता।
  4. बांग्लादेश में तटीय निगरानी रडार प्रणाली की स्थापना की जाएगी।
  5. हैदराबाद विश्वविद्यालय और ढाका विश्वविद्यालय के बीच समझौता ज्ञापन।
  6. युवा मामलों में सहयोग पर समझौता ज्ञापन।
  7. सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम का नवीकरण।

3 द्विपक्षीय विकास साझेदारी परियोजनाओं का भी उद्घाटन किया गया:

  1. भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में प्रयोग हेतु एलपीजी (LPG) का आयात।
  2. रामकृष्ण मिशन, ढाका में विवेकानंद भवन (छात्रों हेतु छात्रावास) का उद्घाटन।
  3. इंस्टीट्यूशन ऑफ डिप्लोमा इंजीनियर्स बांग्लादेश (IDEB) में बांग्लादेश-भारत व्यावसायिक कौशल विकास संस्थान (BIPSDI) का उद्घाटन।

ऐतिहासिक संबंध

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100वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2015 भारत और बांग्लादेश के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के समय में लैंड बाउंडरी एग्रीमेंट (भूमि सीमा करार)1974 तैयार की गई थी जिसे वर्ष 2015 तक सदन में पारित नहीं किया गया था| हालाँकि वर्ष 2015 में तत्कालीन सरकार ने इस काम में तेजी दिखाई और मतभेदों को भुलाकर एलबीए पर एक राय बनी और सदन में इसे सर्वसम्मति से पारित भी करवा लिया गया| समझौते के तहत 111 सीमावर्ती एंक्लेव बांग्लादेश को मिले जबकि बदले में 51 एंक्लेव भारत का हिस्सा बने| साथ ही भारत के बाशिंदे भारतीय ज़मीन पर लौट आए और भारत ने 7,110 एकड़ भूमि का आधिपत्य भी पा लिया| इसी प्रकार भारतीय हिस्से के एंक्लेव्स में रह रहे बांग्लादेशी वहाँ चले गए और वहाँ मौजूद भारतीय एंक्लेव की भूमि जो 17,158 एकड़ है वह बांग्लादेश की हो गई| वर्तमान चुनौतियाँ

वर्तमान में भारत की तरफ से भारत-बांग्लादेश सीमा की काँटेदार तारों से घेराबंदी की जा रही है जो कि अंतर्राष्ट्रीय नियमों के खिलाफ़ है, दोनों देशों के बीच जल-विवाद भी सुलझने का नाम नहीं ले रहा है| भारत-बांग्लादेश सीमा पर कई बार निर्दोष बांग्लादेशी भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाते हैं, क्योंकि सुरक्षा बलों के लिये सीमापार से घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे निर्दोष बांग्लादेशी और एक आतंकवादी में भेद करना मुश्किल हो जाता है| यही कारण है कि एलबीए के बाद भी एक आम बांग्लादेशी के मन में भारत विरुद्ध छवि बनती जा रही है।

  • 1972 में इंदिरा-मुजीब संधि के दौरान भारत ने 1.2 मिलियन से अधिक शरणार्थियों को आश्रय दिया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि दोनों अवसरों पर केवल हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई ही भारत की शरण आए थे।

भारत-भूटान

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  • जून 2020 को भारत सरकार द्वारा भारत एवं भूटान के मध्य पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग के लिये एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर को मंज़ूरी दी गई है। यह समझौता हस्ताक्षर करने की तारीख से 10 वर्षों तक के लिये लागू होगा। दोनो देशों के द्विपक्षीय हित तथा पारस्परिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए इस समझौते में वायु, अपशिष्ट, रासायनिक प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

यह समझौता दोनों देशों में लागू कानूनों तथा कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए इक्विटी, पारस्परिकता तथा पारस्परिक लाभों के आधार पर दोनों देशों को पर्यावरण के संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में निकट और दीर्घकालिक सहयोग को स्थापित और संवर्द्धित करने में सक्षम है । समझौते की पृष्ठभूमि: 11 मार्च, 2013 को भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board- CPCB) और भूटान सरकार के राष्ट्रीय पर्यावरण आयोग (National Environment Commission- NEC) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए थे। पूर्व में लागू इस समझौते की अवधि 10 मार्च, 2016 को समाप्त हो गई थी अतः इसके पूर्व के समझौता ज्ञापनों के लाभों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र में सहयोग और समन्वय को जारी रखने का निर्णय लिया गया है।

  • भारत की आज़ादी के बाद 8 अगस्त, 1949 को भारत और भूटान के बीच दार्जिलिंग में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसमें अनेक प्रावधान शामिल थे जिनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था रक्षा और विदेश मामलों में भूटान का भारत पर आश्रित होना। काफी लंबे समय तक इस संधि के जारी रहने के बाद भूटान के आग्रह पर 8 फरवरी, 2007 को इसमें बदलाव कर अद्यतन बनाया गया। अद्यतन संधि में यह उल्‍लेख है कि भारत और भूटान के बीच स्‍थायी शांति और मैत्री होगी।
प्रोजेक्ट दंतकऊर्जा, अवसंरचना और सुरक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं को देखें तो भारत के सहयोग से भूटान की अवसंरचना की दशा और दिशा दोनों ही बदल गई हैं। इसमें भारत के सीमा सड़क संगठन द्वारा चलाए जाने वाले ‘प्रोजेक्ट दंतक’ की भूमिका अहम है, जिसके तहत भूटान में लगभग 1800 किमी. लंबी सड़कों का निर्माण किया गया है। इसी प्रोजेक्ट के तहत पारो एवं यांगफुला में हवाई पट्टियाँ, हेलीपैड, दूरसंचार नेटवर्क, भारत-भूटान माइक्रोवेव लिंक, भूटान आकाशवाणी केंद्र, प्रतिष्ठित इंडिया हाउस परिसर, जल विद्युत केंद्र, स्कूल एवं कॉलेजों का निर्माण कार्य भी किया गया है। वर्ष 1961 में भारत के सीमा सड़क संगठन द्वारा शुरू किया गया ‘प्रोजेक्ट दंतक’ किसी विदेशी धरती पर राष्ट्र निर्माण के लिये शुरू किया गया सबसे बड़ा प्रोजेक्ट माना जाता है।
  • चीन के द्वारा भूटान की पूर्वी सीमा पर अपनी दावेदारी पेश की गई है, आश्चर्यजनक बात यह है कि भूटान की पूर्वी सीमा किसी भी प्रकार से चीन के साथ सीमा साझा नहीं करती है।

इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के नेतृत्व में आयोजित होने वाले वैश्विक पर्यावरण सुविधा (Global Environment Facility) सम्मेलन में भूटान के सकतेंग वन्यजीव अभ्यारण्य (Sakteng Forest Reserve) [उत्तर और पूर्व दिशा में अरुणाचल प्रदेश के साथ सीमा साझा करता है।] को विवादित क्षेत्र बताते हुए चीन द्वारा उसे प्राप्त होने वाले अंतर्राष्ट्रीय अनुदान का रोकने का असफल प्रयास किया गया।

भारत-पाकिस्तान

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  • 6 जनवरी,2020 को चीन और पाकिस्तान का छठा संयुक्त नौसैनिक अभ्यास अरब सागर में शुरू हुआ। पहली बार इस अभ्यास को'सी गार्डियंस-2020' (Sea Guardians-2020) नाम दिया गया है।

इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर सहयोग बढ़ाना है।

संभावना:-वारियर (Warrior- संयुक्त ज़मीनी अभ्यासों की शृंखला) और शाहीन या ईगल (Shaheen or Eagel- संयुक्त वायु अभ्यासों की शृंखला) की तरह 'सी गार्डियंस' (Sea Guardians) चीन और पाकिस्तान के बीच नौसैनिक अभ्यासों की शृंखला बनने की उम्मीद है।


भारत और तुर्की:

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तुर्की और पाकिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद भारत सदैव सकारात्मक व्यापारिक संबंधों और अन्य क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग का पक्षधर रहा है। तुर्की और पाकिस्तान, सेंटो (The Central Treaty Organization-CENTO) के सदस्य रहे हैं, इसके अतिरिक्त दोनों देश संयुक्त सैन्य और नौसैनिक अभ्यास जैसी कई अन्य गतिविधियों का हिस्सा हैं। भारत और तुर्की अंतर्राष्ट्रीय समूह G20 का हिस्सा हैं, इसके साथ ही भारत और तुर्की के बीच प्रौद्योगिकी, रक्षा, यातायात एवं अंतरिक्ष के साथ कई अन्य क्षेत्रों में सहयोग के लिए समझौते हुए हैं। वर्ष 2017-18 में भारत और तुर्की के बीच लगभग 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ, तुर्की उन कुछ चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके साथ भारत का व्यापार घाटा धनात्मक रहता है। तुर्की के साथ व्यापार में भारत को बढ़त प्राप्त है ऐसे में अधिक प्रतिबंधों से भारतीय हितों को ही नुकसान होगा। हालिया घटनाक्रम के बाद तुर्की की कंपनी अनादोलू शिपयार्ड (Anadolu Shipyard) पर भारत में रक्षा-संबंधी व्यवसाय करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और इसके साथ ही भविष्य में अन्य व्यापारिक अनुबंधों/समझौतों पर भी सख्ती देखी जा सकती है। भारत और तुर्की के बीच तनाव: हालिया घटनाक्रम के बाद भारत सरकार ने तुर्की से तेल और स्टील के आयात को कम करने के संकेत दिये हैं। इससे पहले कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में तुर्की के राष्ट्रपति के बयान पर विरोध जताते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने अपनी अंकारा (तुर्की की राजधानी) यात्रा स्थगित कर दी थी। तुर्की ने ‘फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (Financial Action Task Force-FATF) द्वारा पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में डालने का विरोध किया था। ध्यातव्य है कि FATF ने पाकिस्तान पर आतंकवादी समूहों की फंडिंग पर रोक न लगा पाने के मामले में कार्रवाई करते हुए कई प्रतिबंध लगाए थे।

भारत और मलेशिया

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भारत में मलेशिया से आयातित उत्पादों की कीमत लगभग 10.8 बिलियन डालर है, मलेशिया से आयातित उत्पादों में एक बड़ा हिस्सा ताड़ (Palm) के तेल का है। ताड़ (Palm) उत्पादन में मलेशिया विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है, विश्व के कुल ताड़ (Palm) उत्पादन का 85% हिस्सा मात्र दो देशों मलेशिया और इंडोनेशिया से आता है। भारत और मलेशिया के बीच फरवरी 2011 में हुए द्विपक्षीय व्यापारिक समझौते (Malaysia-India Comprehensive Economic Cooperation Agreement-MICECA) के तहत भारत को दिसंबर 2019 तक कच्चे पाम तेल (Crude Palm Oil-CPO) पर निर्यात शुल्क को 40% से घटाकर 37.5% और दिसंबर 2018 तक परिशोधित (Refined, Bleached and Deodorized-RBD) पाम तेल पर निर्यात शुल्क को 54% से घटाकर 45% करना था। इस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2018 में मलेशिया में उत्पादित कुल पाम तेल का 25.8% भारत को निर्यात किया गया। भारत में तेल परिशोधकों के समूह का नेतृत्व करने वाली संस्था साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Solvent Extractor's Association of India-SEA), स्थानीय उद्योगों के हितों की रक्षा के लिये लंबे समय से कच्चे पाम तेल के आयात पर सख्ती की मांग करता रहा है। सितंबर 2019 में भारत सरकार ने स्थानीय उद्योगों के हितों को ध्यान में रखते हुए मलेशिया से आयातित पाम तेल पर 5% सेफगार्ड ड्यूटी लगाई थी।

भारत के लिये पाम तेल का महत्त्व:-देश में पिछले कुछ वर्षों में खाद्य तेल (Edible Oil) की मांग में काफी वृद्धि देखी गई है और वर्तमान में भारत अपनी कुल ज़रूरत का 70% खाद्य तेल (Edible Oil) अन्य देशों से आयात करता है। वर्ष 2001-02 में यह आयात कुल मांग का 44% ही था।

पाम तेल प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाला सबसे सस्ते खाद्य तेलों में से एक है और यह अधिक तापमान पर भी स्थिर रहता है जिसके कारण इसे कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही भारत में प्रयोग होने वाले कुल खाद्य तेल में दो-तिहाई (2/3) हिस्सा पाम तेल का है।

भारत और मलेशिया के बीच तनाव के कारण:
  1. मलेशिया लगातार भारत के कई आतंरिक मुद्दों जैसे-अनुच्छेद 370 और नागरिक संशोधन विधेयक आदि का विरोध करता रहा है, इसके साथ ही कई वैश्विक मैचों (जैसे-संयुक्त राष्ट्र महासभा) पर भी मलेशिया ने इन मुद्दों को लेकर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए भारत के खिलाफ वक्तव्य दिए।
  2. साथ ही भारत के अनुरोध के बाद भी मलेशिया ने इस्लामी धर्मोपदेशक जाकिर नाइक के प्रत्यर्पण मामले में कोई सहयोग नहीं किया। ध्यातव्य है कि जाकिर नाइक पर भारत में आर्थिक गड़बड़ी के साथ कई अन्य गंभीर मामले दर्ज़ हैं।
  3. विशेषज्ञों के अनुसार मलेशिया के प्रधानमंत्री का यह व्यवहार राजनीति से प्रेरित है। इसके साथ ही इन बयानों से उनका उद्देश्य स्थानीय इस्लामिक दलों का समर्थन जीतना और विश्व के अन्य मुस्लिम देशों के बीच एक मज़बूत ‘इस्लाम समर्थक’ नेता के रूप अपनी छवि बनाना है।
भारत की प्रतिक्रिया:

भारत ने मलेशिया से आने वाले पाम तेल पर आयात शुल्क को 37% से बढ़ाकर 44% कर दिया है। सरकार द्वारा ‘इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology)’ को आयातित माइक्रोप्रोसेसर के लिये तकनीकी मानक (Technical Standards) जारी करने तथा मलेशिया जैसे देशों से माइक्रोप्रोसेसर के अप्रतिबंधित आयात पर अंकुश लगाने के निर्देश दिये गए। भारत सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया के तहत सीमा शुल्क विभाग (Customs Department) को मलेशिया से आयात होने वाले माइक्रोप्रोसेसर की गहन जाँच करने के निर्देश दिये हैं। इसी के तहत खनन सचिव को एक आयात निगरानी प्रणाली (Import Monitoring System) का गठन करने के लिए कहा गया हैं, इसका उद्देश्य उन उत्पादों के आयात पर रोक लगाना है जिनसे भारत के घरेलू उद्योगों को हानि हो रही हो। इसके साथ ही भारत, मलेशिया से आने वाले कई अन्य उत्पादों जैसे-एल्युलुमिनियम, पेट्रोलियम, एल.एन.जी आदि के आय़ात संबंधी नियमों को सख्त बनाने पर विचार कर रहा है।

भारतीय प्रतिबंधों का प्रभाव:-नए नियमों के तहत मलेशिया से आयात होने वाले परिशोधित तेल को ‘प्रतिबंधित (Ristricted) श्रेणी’ में रखा गया है। इसके साथ ही पाम तेल के आयात के लिये आयातकों को ‘विदेश व्यापार महानिदेशालय Directorate General of Foreign Trade (DGFT)’ से लाइसेंस लेना पड़ेगा।

पाम तेल के आयात पर भारतीय प्रतिबंधों से मलेशियाई अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। ध्यातव्य है कि मलेशिया के सकल घरेलू उत्पाद का 2.8% भाग पाम तेल पर निर्भर है और देश के कुल निर्यात में पाम उत्पादों की भागीदारी 4.5% है। वर्ष 2019 में मलेशिया के कुल पाम उत्पाद का 23% (लगभग 4.4 मिलियन टन) भारत को निर्यात किया गया और वित्तीय वर्ष 2019 में इस व्यापार में मलेशिया को लगभग 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर का फायदा हुआ था। भारतीय आयात में कटौती के बाद मलेशिया के पाम तेल बाज़ार में 10% की गिरावट देखी गई थी।

भारत-ईरान

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  • जनवरी में अमेरिका ने ईरान की कुद्स फोर्स के प्रमुख और इरानी सेना के शीर्ष अधिकारी मेजर जनरल कासिम सुलेमानी सहित सेना के कई अन्य अधिकारियों को बगदाद हवाई अड्डे के बाहर हवाई हमले में मार गिराया है।

दिसंबर 2019 को भारत के विदेशमंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने 19वें भारत-ईरान संयुक्त आयोग (19th India-Iran Joint Commission) की बैठक के दौरान ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ से मुलाकात की। इस बैठक के दौरान चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम {Citizenship (Amendment) Act} जैसे विषयों पर वार्ता हुई। बैठक में दोनों देशों ने अपने "प्राचीन, ऐतिहासिक और अटूट" संबंधों पर प्रतिबद्धता व्यक्त की, साथ ही दोनो देशों को प्रभावित करने वाले निकट द्विपक्षीय संबंधों एवं क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर भी वार्ता की। भारत के दृष्टिकोण से ईरान का महत्त्व:

  1. भारत और ईरान के संबंध प्राचीनकाल से ही बहुआयामी और गहरे रहे हैं। ईरान की भौगोलिक स्थिति भारत के लिये अतिमहत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ईरान के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी कनेक्टविटी प्राप्त कर सकता है।
  2. वर्तमान में भारत यही कार्य कर भी रहा है। चाबहार बंदरगाह के अतिरिक्त अश्गाबाद समझौता (Ashgabat Agreement) और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (International North–South Transport Corridor- INSTC) के माध्यम से भारत, ईरान के साथ द्विपक्षीय संबंध मज़बूत करने के साथ ही क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं तथा आवश्यकताओं का भी ध्यान रख रहा है।
  3. भारत और ईरान की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ पाकिस्तान से लगती हैं इसलिये भारत तथा ईरान के बीच बेहतर राजनीतिक संबंध पाकिस्तान के लिये भू-राजनीतिक दबाव उत्पन्न करेगा।
  4. भारत की अर्थव्यवस्था आज भी ऊर्जा के परंपरागत स्रोत्रों अर्थात् तेल पर निर्भर करती है, भारत अभी भी तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता नहीं प्राप्त कर सका है, इसलिये उसे तेल के आयात पर निर्भररहना होता है। इस प्रकार की स्थिति में भारत के लिये ईरान का महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता है। इसी के मद्देनज़र भारत, ईरान के ऊपर अमेरिकी प्रतिबंधों के इतर तेल आयात का भुगतान भारतीय रुपए और यूरो में करते हुए अपने संबंधों को प्रगाढ़ बनाए हुए है।
भारत-ईरान से संबंधित मुद्दे:-ईरान ने चिंता जताई है कि ईरान के ऊपर वैश्विक कार्यवाही के मद्देनज़र भारत ने भी सभी तेल आयातों को रोक दिया था। इस प्रकार की कार्यवाही से भारत और ईरान के संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा साथ ही चाबहार बंदरगाह विकास परियोजनाओं की विकास गति भी बहुत धीमी हो गई।

संयुक्त राज्य अमेरिका के आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिये भारत को प्रदान की गई "आंशिक छूट" (Narrow Exemption) जारी रहेगी। चाबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत अफगानिस्तान को किये जाने वाले अपने निर्यात में विविधता लाना चाहता है। भारत-ईरान संयुक्त आयोग की बैठक के बाद भारत, ईरान और अफगानिस्तान के राजनयिकों के मध्य नई दिल्ली में चाबहार में त्रिपक्षीय परियोजना के विकास हेतु कई नई पहलों पर चर्चा के लिये मुलाकात की गई। भारत और इस्लामिक सहयोग संगठन:-नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या मामले से संबंधित फैसले के बारे में 57 सदस्यीय संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन ने भारत में मुसलमान अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। जेद्दा स्थित OIC के सचिवालय का नेतृत्व सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा किया जाता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से वैश्विक रूप से तेल का एक-चौथाई और प्राकृतिक गैस के एक-तिहाई हिस्से का परिवहन किया जाता है। विश्व में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (liquefied natural gas-LNG) के सबसे बड़े निर्यातक कतर द्वारा भी गैस के परिवहन के लिये इसी नौवहन मार्ग का उपयोग किया जाता है।

भारत-सऊदी अरब

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नवंबर 2019 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत-सऊदी अरब के मध्य रणनीतिक साझेदारी परषिद की स्थापना तथा नशीली दवाइयों, मादक पदार्थों और प्रतिबंधित रसायनों की अवैध बिक्री एवं तस्करी को रोकने के लिये हस्‍ताक्षरित अनुबंध को कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान की। इस अनुबंध के चलते दोनों देशों के उच्‍च स्‍तरीय नेतृत्‍व इस रणनीतिक भागीदारी के तहत चल रही पहलों/परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी करने के लिये नियमित तौर पर मिलने में समर्थ होंगे। इससे रणनीतिक जुड़ाव के नए क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलेगी और यह अर्जित किये जाने वाले लक्ष्‍यों और प्राप्‍त होने वाले लाभों को भी परिभाषित करेगा। लाभ:

  1. इस प्रस्‍ताव का उद्देश्‍य लिंग, वर्ग या आय के पूर्वाग्रह के बिना सऊदी अरब के साथ बेहतर आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों से नागरिकों को लाभ पहुँचाना है।
  2. सऊदी अरब के साथ किया गया यह अनुबंध रक्षा, सुरक्षा, आतंकवाद का मुकाबला करने, ऊर्जा सुरक्षा तथा नवीकरणीय ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भागीदारी के नए मार्ग प्रशस्‍त करेगा।
  3. समझौता ज्ञापन से संयुक्‍त राष्‍ट्र अंतर्राष्‍ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण सम्‍मेलन द्वारा परिभाषित नशीली दवाइयों, नशीले पदार्थों एवं प्रतिबंधित रसायनों की अवैध बिक्री एवं तस्‍करी रोकने के लिये दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा।
  4. समझौता ज्ञापन के तहत नशीली दवाइयों के उत्‍पादकों, तस्‍करों एवं अवैध विक्रेताओं की संदिग्‍ध गतिविधियों, आग्रह करने पर एनडीपीसी की अवैध बिक्री के विवरण और नशीली दवाइयों से संबंधित आरोप में गिरफ्तार विक्रेताओं के वित्‍तीय हालात से संबंधी जानकारियाँ साझा करने का प्रावधान है।
  5. समझौता ज्ञापन के तहत नशीली दवाइयों, नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री के आरोप में गिरफ्तार दूसरे देश के नागरिकों के विवरण के बारे में अधिसूचित करने और गिरफ्तार व्‍यक्ति को दूतावास संबंधी मदद मुहैया कराने का प्रावधान है।
  6. समझौता ज्ञापन के तहत दोनों में से किसी भी देश में अंदर बरामद की गई नशीली दवाइयों, नशीले पदार्थों का रासायनिक विश्‍लेषण और नशीली दवाइयों एवं नशीले पदार्थों के बारे में आँकड़े/सूचना साझा करने का प्रावधान है।

अवैध नशीली दवाइयों की बिक्री एक वैश्विक अवैध व्‍यापार बन गया है। नशीले पदार्थों का बड़े स्‍तर पर उत्‍पादन और विभिन्‍न सरल मार्गों खासकर अफगानिस्‍तान के ज़रिये इनका प्रसार बढ़ने से युवाओं के बीच इनका उपभोग ऊँचे स्‍तर पर पहुँच चुका है जिसका सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ा है तथा समाज में अपराध बढ़े हैं। नशीले पदार्थों की बिक्री से दुनिया के विभिन्‍न क्षेत्रों में बगावत और आतंकवाद के लिये धन मुहैया कराया जाता है।

भारत-सऊदी अरब के मध्य द्विपक्षीय आर्थिक संबंध विभिन्न प्रयासों के बावजूद सीमित ही बने हैं। पिछले कुछ वर्षों में तेल के दामों में आई गिरावट ने इस व्यापार में और कमी की है। वर्ष 2019 के प्रथम 9 माह के लिये द्विपक्षीय व्यापार 22 बिलियन डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत कम है। यह व्यापार अत्यधिक असंतुलित है, एक ओर जहाँ कुल व्यापार में भारतीय निर्यात का हिस्सा केवल 20 प्रतिशत है, वहीं दूसरी ओर इस व्यापार में प्रमुख हिस्सा तेल से संबंधित है।

भारत एवं सऊदी अरब दोनों इस बात के पक्षधर हैं कि व्यापार में न सिर्फ विविधता होनी चाहिये बल्कि यह संतुलित भी होना चाहिये, जिससे यह दीर्घकाल तक सतत् बना रहे। संबंधों में उतर-चढ़ाव के कारण भारत में सऊदी अरब का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश कुल विदेशी निवेश का 0.05 प्रतिशत है, इसे भी स्वाभाविक रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है। हालाँकि सऊदी अरब ने अपने विज़न 2030 के रणनीतिक दस्तावेज़ में आठ प्रमुख साझीदारों की सूची में भारत को भी शामिल किया है। साथ ही सऊदी अरामको महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर स्थित रायगढ़ में प्रस्तावित 44 बिलियन डॉलर की रिफाइनरी में प्रमुख साझीदार बनने जा रही है। इसके अतिरिक्त सऊदी अरब भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में भी सहयोग प्रदान कर रहा है। विदित है कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आयात पर निर्भर है तथा सऊदी अरब भी अपने तेल निर्यात के लिये भारत को एक बाज़ार के रूप में देख रहा है।

सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको (Aramco) ने महाराष्ट्र में रत्नागिरि में एक एकीकृत रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स विकसित करने के लिये अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के साथ भागीदारी करने में रुचि दिखाई है। 44 बिलियन डॉलर की यह परियोजना भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) के तौर पर लगाई जानी है। वैसे भी भारत को सबसे अधिक कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों में सऊदी अरब भी शामिल है।

भारत और खाड़ी देश

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COVID-19 महामारी के बढ़ते प्रसार ने मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया है तो वहीँ दूसरी ओर कच्चे तेल के मूल्य में गिरावट से खाड़ी देशों पर दोहरी मार पड़ रही है। भारत अपनी ज़रूरत का 65 प्रतिशत गैस और कच्चा तेल खाड़ी देशों से ही प्राप्त करता है। खाड़ी क्षेत्र में 90 लाख प्रवासी भारतीय निवास करते है जो लगभग 40 बिलियन डॉलर की धनराशि भी प्रेषण के माध्यम से भारत को भेजते हैं। भारत सबसे ज़्यादा कच्चे तेल का आयात सऊदी अरब से ही करता है। भारत के लिये खाड़ी देशों का महत्त्व :- वित्तीय वर्ष 2018-19 में भारत और खाड़ी देशों के बीच लगभग 162 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ है। यह एक वर्ष में भारत के द्वारा पूरे विश्व के साथ किये जाने वाले व्यापार का 20 प्रतिशत है।

  1. लगभग 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस खाड़ी देशों से आयात की जाती है।
  2. खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय लगभग 40 बिलियन डॉलर की धनराशि भी प्रेषण के माध्यम से भारत भेजते हैं।
  3. सऊदी अरब भारत को हाइड्रोकार्बन आपूर्ति करने वाला इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख देश है।
  4. भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिये समझौता किया है।
  5. खाड़ी क्षेत्र हमारी विकास की अहम जरूरतों जैसे ऊर्जा संसाधन, कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिये निवेश के मौके और लाखों लोगों को नौकरी के भरपूर अवसर देता है।
  6. जहाँ ईरान हमें अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने का रास्ता उपलब्ध कराता है, तो वहीँ ओमान हमें पश्चिम हिंद महासागर तक पहुँचने की राह दिखाता है।
कुवैत, ओमान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन को शामिल किया जाता है। ये 6 देश खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council-GCC) के संस्थापक सदस्य हैं।

खाड़ी सहयोग परिषद का मुख्यालय रियाद, सऊदी अरब में स्थित है। खाड़ी सहयोग परिषद के कार्य संचालन की भाषा ‘अरबी’ है। वर्ष 2019 में खाड़ी सहयोग परिषद का 40वाँ शिखर सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित किया गया था।

तेल निर्यातक देशों के संगठन-ओपेक

OPEC एक स्थायी, अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका गठन 10-14 सितंबर, 1960 को आयोजित बगदाद सम्मेलन में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने किया था। इन पाँच संस्थापक सदस्यों के बाद इसमें कुछ अन्य सदस्यों को शामिल किया गया, ये देश हैं- क़तर (1961), इंडोनेशिया (1962), लीबिया (1962), संयुक्त अरब अमीरात (1967), अल्जीरिया (1969), नाइजीरिया (1971), इक्वाडोर (1973), अंगोला (2007), गैबन (1975), इक्वेटोरियल गिनी (2017) और कांगो (2018) इक्वाडोर ने दिसंबर 1992 में अपनी सदस्यता त्याग दी थी, लेकिन अक्तूबर 2007 में वह पुनः OPEC में शामिल हो गया।

इंडोनेशिया ने जनवरी 2009 में अपनी सदस्यता त्याग दी। जनवरी 2016 में यह फिर से इसमें सक्रिय रूप से शामिल हुआ, लेकिन 30 नवंबर, 2016 को OPEC सम्मेलन की 171वीं बैठक में एक बार फिर इसने अपनी सदस्यता स्थगित करने का फैसला किया।

गैबन ने जनवरी 1995 में अपनी सदस्यता त्याग दी थी। हालाँकि, जुलाई 2016 में वह फिर से संगठन में शामिल हो गया। कतर ने 1 जनवरी, 2019 को और इक्वाडोर ने 1 जनवरी, 2020 को अपनी सदस्यता त्याग दी थी। अतः वर्तमान में इस संगठन में सदस्य देशों की संख्या 13 है। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस शांति योजना को ‘स्थायी शांति का यथार्थवादी मार्ग बताया है, वहीं फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इसे ‘साजिश’ करार देते हुए इसका विरोध किया है और इसके जवाब में फिलिस्तीन ने स्वयं को ओस्लो समझौते से अलग कर लिया है।

इज़राइल-फिलिस्तीन

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इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस शांति योजना को ‘स्थायी शांति का यथार्थवादी मार्ग बताया है, वहीं फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इसे ‘साजिश’ करार देते हुए इसका विरोध किया है और इसके जवाब में फिलिस्तीन ने स्वयं को ओस्लो समझौते से अलग कर लिया है। अमेरिका की मध्य पूर्व शांति योजना

  1. येरुशलम पर इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों ही अपना-अपना दावा प्रस्तुत करते हैं और दोनों ही उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका की शांति योजना के अनुसार, येरुशलम को विभाजित नहीं किया जाएगा और यह ‘इज़राइल की संप्रभु राजधानी’ होगी।
  2. शांति योजना के अनुसार, फिलिस्तीन येरुशलम के पूर्व में अपनी राजधानी स्थापित करेगा, जिसका नाम बदलकर ‘अल कुद्स’ (Al Quds) रखा जा सकता है, जो कि येरुशलम का अरबी अनुवाद है।
  3. योजना के मुताबिक, ‘येरुशलम की पवित्र धरती उसी मौजूदा शासन व्यवस्था (यानी इज़राइल) के अधीन होगी’ और ‘इसे सभी धर्मों के शांतिपूर्ण उपासकों एवं पर्यटकों के लिये खुला रखा जाएगा’।
  4. फिलीस्तीनी क्षेत्र के अंदर स्थित इज़राइली इलाके इज़राइल राज्य का हिस्सा बन जाएंगे और एक प्रभावी परिवहन प्रणाली के माध्यम से उन्हें इज़राइल से जोड़ा जाएगा। वेस्ट बैंक में अवैध इज़राइली बस्तियों को कानूनी और स्थायी बनाने का विचार फिलीस्तीनी सरकार के लिये एक चिंता का विषय है।
  5. शांति योजना के अनुसार, जॉर्डन घाटी जो कि इज़राइल की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इज़राइल की संप्रभुता के तहत बनी रहेगी।
  6. यदि फिलीस्तीन इस योजना को स्वीकार करता है तो अमेरिका वहाँ आगामी 10 वर्षों में 50 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा, जिसे वहाँ के निजी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिलेगा तथा शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार हो सकेगा, इससे फिलीस्तीन के नागरिकों के जीवन स्तर की गुणवत्ता भी सुधरेगी।
  7. अमेरिका द्वारा प्रस्तुत शांति योजना प्रथम दृष्टया इज़राइल के पक्ष में झुकी हुई दिखाई देती है, जिसके कारण फिलीस्तीन ने इसका समर्थन करने से इनकार कर दिया है।
ओस्लो समझौता 1990 के दशक में इज़राइल और फिलीस्तीन के बीच हुए समझौतों की एक शृंखला है।

पहला ओस्लो समझौता वर्ष 1993 में हुआ जिसके अंतर्गत इज़राइल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ने एक-दूसरे को आधिकारिक मान्यता देने तथा हिंसक गतिविधियों को त्यागने पर सहमति प्रकट की। ओस्लो समझौते के तहत एक फिलिस्तीनी प्राधिकरण की भी स्थापना की गई थी। हालाँकि इस प्राधिकरण को गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक के भागों में सीमित स्वायत्तता ही प्राप्त हुई थी। इसके पश्चात् वर्ष 1995 में दूसरा ओस्लो समझौता किया गया जिसमें वेस्ट बैंक के 6 शहरों और लगभग 450 कस्बों से इज़राइली सैनिकों की पूर्ण वापसी का प्रावधान शामिल था।

इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष की पृष्ठभूमि

इज़राइल और फिलिस्तीन के मध्य संघर्ष का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1917 में उस समय हुई जब तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव आर्थर जेम्स बल्फौर ने ‘बल्फौर घोषणा’ (Balfour Declaration) के तहत फिलिस्तीन में एक यहूदी ‘राष्ट्रीय घर’ (National Home) के निर्माण के लिये ब्रिटेन का आधिकारिक समर्थन व्यक्त किया। अरब और यहूदियों के बीच संघर्ष को समाप्त करने में असफल रहे ब्रिटेन ने वर्ष 1948 में फिलिस्तीन से अपने सुरक्षा बलों को हटा लिया और अरब तथा यहूदियों के दावों का समाधान करने के लिये इस मुद्दे को नवनिर्मित संगठन संयुक्त राष्ट्र (UN) के विचारार्थ प्रस्तुत किया। संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन में स्वतंत्र यहूदी और अरब राज्यों की स्थापना करने के लिये एक विभाजन योजना (Partition Plan) प्रस्तुत की जिसे फिलिस्तीन में रह रहे अधिकांश यहूदियों ने स्वीकार कर लिया किंतु अरबों ने इस पर अपनी सहमति प्रकट नहीं की। वर्ष 1948 में यहूदियों ने स्वतंत्र इज़राइल की घोषणा कर दी और इज़राइल एक देश बन गया, इसके परिणामस्वरूप आस-पास के अरब राज्यों (इजिप्ट, जॉर्डन, इराक और सीरिया) ने इज़राइल पर आक्रमण कर दिया। युद्ध के अंत में इज़राइल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के आदेशानुसार प्राप्त भूमि से भी अधिक भूमि पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके पश्चात् दोनों देशों के मध्य संघर्ष तेज़ होने लगा और वर्ष 1967 में प्रसिद्ध ‘सिक्स डे वॉर’ (Six-Day War) हुआ, जिसमें इज़राइली सेना ने गोलन हाइट्स, वेस्ट बैंक तथा पूर्वी येरुशलम को भी अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया। वर्ष 1987 में मुस्लिम भाईचारे की मांग हेतु फिलिस्तीन में ‘हमास’ नाम से एक हिंसक संगठन का गठन किया गया। इसका गठन हिंसक जिहाद के माध्यम से फिलिस्तीन के प्रत्येक भाग पर मुस्लिम धर्म का विस्तार करने के उद्देश्य से किया गया था। समय के साथ वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के अधिगृहीत क्षेत्रों में तनाव व्याप्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1987 में प्रथम इंतिफादा (Intifida) अथवा फिलिस्तीन विद्रोह हुआ, जो कि फिलिस्तीनी सैनिकों और इज़राइली सेना के मध्य एक छोटे युद्ध में परिवर्तित हो गया।