समसामयिकी 2020/भारत में राजकोषीय नीति


अब वह अपने सभी व्यापार समझौतों की समीक्षा करेगी, इसमें आसियान देशों के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता, जापान और भारत के मध्य व्यापक आर्थिक भागीदारी (CEPA) तथा दक्षिण कोरिया के साथ CEPA आदि शामिल हैं

  • केंद्र सरकार ने 28 मई, 2020 से ‘7.75% बचत (कर योग्य) बॉण्ड, 2018’ [7.75 per cent Savings (Taxable) Bonds, 2018] को जारी किये जाने पर रोक लगा दी है। पिछले कुछ महीनों में बैंकों द्वारा जमा राशि पर पर ब्याज की दरों में कटौती और सरकार के द्वारा कुछ अन्य छोटी बचत दरों में कटौती की गई है। RBI द्वारा 27 मई को की गई घोषणा के अनुसार 28 मई, 2020 के दिन के व्यापार के बाद इसकी खरीद पर रोक लगा दी गई है। सरकार का यह निर्णय निवेशकों को बचत के एक और बेहतर विकल्प से वंचित कर देगा जिसमें उन्हें अन्य विकल्पों की तुलना में कर देने के बाद भी अपेक्षाकृत अधिक रिटर्न/लाभ मिलता था।
‘7.75% बचत (कर योग्य) बॉण्ड’ पहली बार 10 जनवरी, 2018 को निवासी नागरिकों/हिंदू अविभाजित परिवार (Hindu Undivided Family-HUF) के लिये जारी किया गया था। इसके एक बॉण्ड का मूल्य 1,000 रुपए रखा गया था परंतु इसके तहत निवेश की कोई सीमा नहीं निर्धारित की गई थी।

इस बॉण्ड पर जारी होने की तिथि से सात वर्ष का लॉक-इन पीरियड या निश्चित अवरुद्धता अवधि निर्धारित की गई थी हालाँकि 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु के निवेशकों को निर्धारित अवधि से पहले ही अपने पैसे निकालने की छूट दी गई थी। इस बॉण्ड में निवेश द्वारा प्राप्त ब्याज पर ‘आयकर अधिनियम, 1961’ (Income Tax Act, 1961) के तहत कर लागू होता है।

सरकार के निर्णय का प्रभाव:
  1. परंतु 28 मई तक किये गए निवेश पर पूर्व की तरह 7.75% ब्याज का लाभ मिलता रहेगा।
  2. सरकार के निर्णय के पश्चात् 28 मई, 2020 के बाद इस बॉण्ड में नए निवेश की अनुमति नहीं होगी परंतु 28 मई तक किये गए निवेश पर पूर्व की तरह 7.75% ब्याज का लाभ मिलता रहेगा।
  3. विशेषज्ञों के अनुसार, इस बॉण्ड में किये गए अधिकांशतः निवेश ‘उच्च निवल मालियत वाले व्यक्ति’ (Hight networth individuals- HNI) द्वारा थे परंतु पिछले कुछ महीनों में बाज़ार में बढ़ी हुई अनिश्चितता के कारण इनकी मांग में वृद्धि हुई थी।
  4. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए लोगों ने अपनी पूंजी पर अधिक ब्याज के स्थान पर निवेश में पूंजी की सुरक्षा को अधिक प्राथमिकता दी है।
  5. इसके अतिरिक्त पेंशनधारक या ऐसे लोग जिन्हें आयकर अधिनियम के तहत कर देने से छूट प्राप्त है, उनके लिये यह बॉण्ड सुरक्षित निवेश का सबसे बेहतर विकल्प था।
  6. इस वर्ष सेंसेक्स में 10,000 अंकों की गिरावट और म्यूच्यूअल फंड के मुनाफे में गिरावट के बाद निवेशकों (विशेषकर पेंशन धारकों) पर दबाव बढ़ा है।हाल ही में फ्रैंकलिन टेम्पलटन (Franklin Templeton) नामक निवेश प्रबंधन कंपनी ने अपनी 6 क्रेडिट रिस्क योजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया है।

अन्य विकल्पों की तुलना में RBI बॉण्ड के लाभ: -यह बॉण्ड ‘आयकर अधिनियम’ के तहत कर (Tax) की सीमा में आते हैं, अतः कर चुकाने के बाद निवेशकों को निम्नलिखित दरों पर ब्याज प्राप्त होगा- 5 करोड़ रुपए से अधिक की आय वाले लोगों को इस योजना के तहत 4.4% का ब्याज प्राप्त होगा। 30% के आयकर की श्रेणी में आने वाले लोगों को कर चुकाने के बाद इस योजना के तहत 5.4% का रिटर्न प्राप्त होगा। 10% आयकर श्रेणी में आने वाले लोगों को कर चुकाने के बाद इस योजना के तहत 6.975% का रिटर्न प्राप्त होगा। यदि इस बॉण्ड की तुलना वर्तमान में बाज़ार में उपलब्ध निवेश के अन्य विकल्पों से करें तो निवेशकों के लिये यह योजना अधिक लाभदायक एवं सुरक्षित थी। अप्रैल, 2020 में सरकार द्वारा कई अन्य बचत योजनाओं के ब्याज में कटौती की घोषणा की गई थी। सार्वजनिक भविष्य निधि (Public Provident Fund- PPF) की ब्याज दरों को 7.9% से घटाकर 7.1% कर दिया गया था। सुकन्या समृद्धि योजना (Sukanya Samriddhi Yojana) पर मिलने वाले ब्याज को 8.4% से घटाकर 7.6% कर दिया गया। इसकी तुलना में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा 3-5 वर्ष की सावधि जमा राशि पर 5.3% और 5-10 के निवेश पर 5.4% का रिटर्न दिया जाता है, ऐसे में 30% आयकर की श्रेणी वाले लोगों को इन योजनाओं पर क्रमशः 3.71% और 3.78% ही रिटर्न मिलेगा।

  • केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) ने हाल ही में दिसंबर 2019 के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति या महँगाई दर के आँकड़े जारी किये हैं। आँकड़ों के मुताबिक इस अवधि में CPI आधारित देश की मुद्रास्फीति दर 7.35 प्रतिशत रही, जो कि दिसंबर (2018) में 2.11 प्रतिशत और नवंबर (2019) में 5.54 प्रतिशत थी।

कर से संबंधित विषय

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  • संयुक्त राज्य अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेज़री के वित्तीय अपराध प्रवर्तन नेटवर्क (FinCEN) ने बैंकों द्वारा दर्ज की गईं 2100 से अधिक ‘संदिग्ध गतिविधि रिपोर्ट’ (SARs) दर्ज की। FinCEN रिपोर्ट वर्ष 1999 और 2017 के बीच कम से कम 2 ट्रिलियन USD के लेन देन की पहचान करती हैं और बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के अनुपालन अधिकारियों द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग या अन्य आपराधिक गतिविधि के संभावित साक्ष्य के रूप में चिह्नित की गई हैं।

FinCEN की स्थापना वर्ष 1990 में की गई थी। यह मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी वैश्विक नियामक के रूप में कार्य करता है। यह घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय धन शोधन, आतंकवादी वित्तपोषण और अन्य वित्तीय अपराधों का मुकाबला करने के लिये वित्तीय लेन देन के बारे में जानकारी का संग्रह और उसका विश्लेषण करता है। FinCEN रिपोर्ट संवाददाता बैंकिंग मुद्रा से संबंधित खतरों को उजागर करती है। ‘संवाददाता बैंक’ (Correspondent Bank) शब्द एक वित्तीय संस्थान को संदर्भित करता है जो दूसरे को सेवाएँ प्रदान करता है, आमतौर पर दूसरे देशों में। यह एक मध्यस्थ या एजेंट के रूप में कार्य करता है, जो व्यापार स्थानांतरण की सुविधा देता है, व्यापार लेन देन का संचालन करता है, जमा स्वीकार करता है और दूसरे बैंक की ओर से दस्तावेज़ एकत्रित करता है। भारत की स्थिति : अलग-अलग मामलों में भारतीय एजेंसियों द्वारा जाँच किये जा रहे व्यक्तियों और कंपनियों को FinCEN के SARs के अंतर्गत लाया गया है । जैसे-2G घोटाले, अगस्ता-वेस्टलैंड घोटाले आदि मामलों में नामित भारतीय संस्थाओं के लेन देन से संबंधित सभी मामलों को FinCEN के साथ सूचीबद्ध किया गया है।

राउंड ट्रिपिंग से अभिप्राय उस धन से है जो विभिन्न चैनलों के माध्यम से देश के बाहर जाता है और फिर यही धन विदेशी निवेश के रूप में देश में वापस आता है। इसमें ज्यादातर काला धन शामिल है और इसका उपयोग अक्सर स्टॉक प्राइस में हेर-फेर करने के लिये किया जाता है।

राउंड ट्रिपिंग अक्सर लेन-देन की एक श्रंखला के माध्यम से की जाती है इसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं होता है जो इसे गार (General Anti-Avoidance Rules-GAAR) के दायरे में लाता हो। यह धन ऑफशोर निधियों में निवेश किया जा सकता है जिसे बदले में भारतीय परिसंपत्तियों में निवेश किया जाता हैं। वहीं ग्लोबल डिपॉज़िटरी रिसिप्ट्स (GDR) एवं पार्टिसिपेटरी नोट्स (P- Notes) जैसे कुछ अन्य मार्ग हैं जिनका उपयोग अतीत में किया गया है। मनी लॉन्ड्रिंग अवैध रूप से प्राप्त आय की पहचान को छुपाता या प्रच्छन्न करता है ताकि वे वैध स्रोतों से उत्पन्न हुए दिखाई दें। इसके अंतर्गत मादक पदार्थों की तस्करी, डकैती या जबरन वसूली जैसे अपराध शामिल होते हैं ।

शेल कंपनियाँ आमतौर पर कॉरपोरेट इकाइयाँ होती हैं जिनके पास कोई सक्रिय व्यवसाय संचालन या महत्त्वपूर्ण संपत्ति नहीं होती है। सरकार उन्हें संदेह के साथ देखती है क्योंकि उनमें से कुछ का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग, कर चोरी और अन्य अवैध गतिविधियों के लिये किया जा सकता है।

फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND), संयुक्त राज्य अमेरिका के FinCEN के समान कार्य करता है। वित्त मंत्रालय के तहत, यह वर्ष 2004 में संदिग्ध वित्तीय लेन देन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने, विश्लेषण और प्रसार के लिये नोडल एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था।

एजेंसी निम्नलिखित दस्तावेज प्राप्त करने के लिये अधिकृत है: नकद लेन देन रिपोर्ट (CTR) संदिग्ध लेन देन रिपोर्ट (STRs) क्रॉस बॉर्डर वायर ट्रांसफर रिपोर्ट ये रिपोर्ट हर महीने निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से प्राप्त की जाती हैं। यह प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (PMLA) के तहत होता है। अनिवार्य: भारत के बैंकों को FIU पर मासिक CTR प्रस्तुत करना अनिवार्य है: 10 लाख रुपए या इसके समतुल्य विदेशी मुद्रा से संबंधित सभी लेन देन या एकीकृत रूप से जुड़े लेन-देन की एक श्रंखला जो विदेशी मुद्रा में 10 लाख या इसके बराबर हो। प्रक्रिया: FIU द्वारा CTR और STR का विश्लेषण किया जाता है। मनी लॉन्ड्रिंग, कर चोरी और आतंकी वित्तपोषण के संभावित मामलों की जांच के लिये प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जाँच ब्यूरो और कर प्राधिकरण जैसी एजेंसियों के साथ संदिग्ध लेन देन साझा किये जाते हैं। FIU की वर्ष 2017-2018 की रिपोर्ट बताती है कि उसे 14 लाख STR प्राप्त हुए थे जो पिछले वर्ष दर्ज किये गए STR की संख्या का तीन गुना थे । आगे की राह: SAR ने भारतीय संस्थाओं और व्यक्तियों के कई मामलों में, कथित अनियमितताओं के अपने वित्तीय इतिहास का उल्लेख किया है। भारत में एजेंसियों के किये यह स्पष्ट संदेश है कि वित्तीय धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के उनके मामलों को FinCEN द्वारा हरी झंडी दिखाई जा रही है। मनी लॉन्ड्रिंग के प्रयासों को ट्रैक करने और उन्हें कम करने के लिये वित्तीय नियामकों के बीच नियमित रूप से सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की आवश्यकता है।

  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद को बताया कि केंद्र ने राजकोषीय वर्ष 2018-19 में सेस/लेवी (Cesses & Levies) से अर्जित 60% आय को संबंधित रिज़र्व फंड में स्थानांतरित कर दिया है और भारत की संचित निधि (CFI) में शेष राशि को बचाए रखा है।

गैर-उपयोगी निधि: केंद्र ने वित्त वर्ष 2019 में 35 सेस/लेवी (Cesses & Levies) से 2.75 लाख करोड़ रुपए प्राप्त किये थे। हालाँकि इसने केवल 1.64 लाख करोड़ रुपए स्थानांतरित किये हैं और 1.1 लाख करोड़ रुपए को संचित निधि में जमा किया है।

जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर (Cess) के 40,000 करोड़ रुपए संबंधित रिज़र्व फंड में जमा नहीं किये गए। सड़क और अवसंरचना उपकर के 10,157 करोड़ रुपए न तो संबंधित रिज़र्व फंड को हस्तांतरित किये गए और न ही उस प्रयोजन के लिये उपयोग किये गए, जिसके लिये उपकर एकत्र किया गया था। यूनिवर्सल सर्विस लेवी का 2,123 करोड़ रुपए तथा नेशनल मिनरल ट्रस्ट लेवी ( National Mineral Trust levy) के रूप में एकत्र किये गए 79 करोड़ रुपए को संबंधित रिज़र्व फंड में हस्तांतरित नहीं किया गया। सीमा शुल्क पर समाज कल्याण अधिभार आरोपित कर 8,871 करोड़ रुपए एकत्रित किये गए लेकिन इसके लिये कोई समर्पित फंड की परिकल्पना नहीं की गई थी। रिज़र्व फ़ंड के गैर-निर्माण/गैर-संचालन से यह सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है कि संसद द्वारा निर्धारित विशिष्ट उद्देश्यों के लिये सेस और लेवी का उपयोग किया गया है। इसके अलावा वर्ष 2010-20 के बीच एकत्रित कच्चे तेल पर उपकर का प्रतिनिधित्व करते हुए 1,24,399 करोड़ रुपए, तेल उद्योग विकास बोर्ड (नामित रिज़र्व फंड) को हस्तांतरित नहीं किये गए थे और इसे संचित निधि में रखा गया था। उपयोग की क्रियाविधि: संगृहीत किये गए उपकर और लेवी को पहले नामित आरक्षित निधि में स्थानांतरित किया जाता है और संसद द्वारा इच्छित विशिष्ट उद्देश्यों के लिये इसका उपयोग किया जाता है। सेस और अन्य लेवी के साथ केंद्रीय करों के माध्यम से एकत्रित फंड संचित निधि में जमा किये जाते हैं। संचित निधि में कर और अधिभार एक विभाज्य पूल में जमा किये जाते हैं और इसमें से कुल संग्रहण का 42% राज्यों को दिया जाता है। भारत की संचित निधि इसका प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 (1) के तहत किया गया है।

इसमें सम्मिलित हैं: कर के माध्यम से केंद्र को प्राप्त सभी कर राजस्व (आयकर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और अन्य रसीदें) और सभी गैर-कर राजस्व। सार्वजनिक अधिसूचना, ट्रेज़री बिल (आंतरिक ऋण) और विदेशी सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों (बाहरी ऋण) से केंद्र द्वारा प्राप्त किये गए सभी ऋण। इस निधि से सभी सरकारी व्यय होते हैं (असाधारण मदों को छोड़कर, जो आकस्मिकता निधि या सार्वजनिक खाते से मिलते हैं) और संसद से प्राधिकरण के बिना निधि से कोई राशि नहीं निकाली जा सकती। उपकर (Cess) सेस एक करदाता के कर दायित्त्व के ऊपर लगाए गए कर का एक रूप है। उपकर का उपयोग केवल तभी किया जाता है जब लोक कल्याण के लिये विशेष व्यय को पूरा करने की आवश्यकता होती है। सेस सरकार के लिये राजस्व का एक स्थायी स्रोत नहीं है और इसके लिये निर्धारित उद्देश्य के पूरा होने पर इसे बंद कर दिया जाता है। इसे अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष दोनों करों पर लगाया जा सकता है। स्वच्छ भारत उपकर: इसे वर्ष 2015 में पेश किया गया, भारत की सड़कों, गलियों और बुनियादी ढांचे की स्वच्छता हेतु एक राष्ट्रीय अभियान के लिये 0.5% का स्वच्छ भारत उपकर लगाया गया।

इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस: केंद्रीय बजट 2016 में घोषित, इस उपकर को वाहनों के उत्पादन पर लगाया गया था।

अधिभार यह किसी मौजूदा कर में जोड़ा जाता है और वस्तु या सेवा के घोषित मूल्य में शामिल नहीं होता है। यह अतिरिक्त सेवाओं या कमोडिटी मूल्य वृद्धि की लागत को कम करने के लिये लगाया जाता है।

  • 13 अगस्त, 2020 को भारतीय प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ‘पारदर्शी कराधान- ईमानदार का सम्मान’ (Transparent Taxation–Honoring the Honest) नामक एक प्लेटफॉर्म लॉन्च किया। इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य कर अनुपालन में ढील देना एवं रिफंड में तेज़ी लाना तथा ईमानदार करदाताओं को लाभ पहुँचाना है।

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (Central Board of Direct Taxes- CBDT) ने हाल के वर्षों में प्रत्यक्ष करों में कई प्रमुख कर सुधार लागू किये हैं।

  1. वर्ष 2019 में कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30% से घटाकर 22% कर दिया गया।
  2. नई विनिर्माण इकाइयों के लिये कॉरपोरेट टैक्स की दर को 15% कर दिया गया।
  3. लाभांश वितरण कर (Dividend Distribution Tax) को समाप्त कर दिया गया।

भारत सरकार के आयकर विभाग के कामकाज में दक्षता एवं पारदर्शिता लाने के लिये CBDT द्वारा की गई पहल: दस्तावेज़ पहचान संख्या (Document Identification Number- DIN): इसके तहत विभाग के प्रत्येक पत्र-व्यवहार पर कंप्यूटर सृजित एक अनूठी दस्तावेज़ पहचान संख्या दर्ज होती है। इसी तरह करदाताओं के लिये मानदंडों को अधिक आसान करने के लिये आयकर विभाग अब ‘पहले से ही भरे हुए आयकर रिटर्न फॉर्म’ को प्रस्‍तुत करने लगा है ताकि व्यक्तिगत करदाताओं के लिये मानदंडों को और भी अधिक सुविधाजनक बनाया जा सके। इसी तरह स्टार्ट-अप्‍स के लिये भी अनुपालन मानदंडों को सरल बना दिया गया है। प्रत्यक्ष कर ‘विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’: लंबित कर विवादों का समाधान प्रदान करने के उद्देश्य से आयकर विभाग ने प्रत्यक्ष कर ‘विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’ (Direct Tax ‘Vivad se Vishwas Act, 2020) भी प्रस्‍तुत किया है जिसके तहत वर्तमान में विवादों को निपटाने के लिये घोषणाएँ दाखिल की जा रही हैं। करदाताओं की शिकायतों/मुकदमों में कमी करने के लिये विभिन्न अपीलीय न्यायालयों में विभागीय अपील दाखिल करने के लिये आरंभिक मौद्रिक सीमाएँ बढ़ा दी गई हैं। डिजिटल लेन-देन एवं भुगतान के लिये इलेक्ट्रॉनिक तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह प्लेटफॉर्म प्रत्यक्ष कर सुधारों की दिशा में एक अहम कदम साबित होगा।

  • कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण उत्पन्न वित्तीय संकट से निपटने के लिये केंद्र सरकार वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax-GST) पर आपदा उपकर (Calamity Cess) लगाने पर विचार कर रही है। वित्त मंत्री के समक्ष GST पर 5 प्रतिशत वाली स्लैब के अतिरिक्त अन्य सभी स्लैबों से अतिरिक्त धन जुटाने के लिये आपदा उपकर का प्रस्ताव रखा गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279A(4)(F) के अनुसार, GST परिषद किसी भी प्राकृतिक आपदा के दौरान उपकर लागू करने की सिफारिश कर सकती है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार राज्यों को GST का मुआवजा देने के लिये बाज़ार ऋण लेने पर भी विचार कर रही है। साथ ही मुआवज़े की समय सीमा के विस्तार पर भी विचार कर रही है।

  • केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड की इन बॉन्ड मैन्युफैक्चर एंड अदर ऑपरेशंस’ पर वेबएक्स इवेंट(WebEx Event on ‘In Bond Manufacture & Other Operations’) की अध्यक्षता 7 अगस्त, 2020 को केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों के राज्य मंत्री ने की। इस कार्यक्रम का आयोजन केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) द्वारा अमेरिका-भारत सामरिक साझेदारी फोरम (USISPF) और मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MAIT) के सहयोग से किया गया।

इस कार्यक्रम में 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' और 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के महत्त्व पर चर्चा की गई और प्रतिभागियों को अवगत कराया गया कि कैसे सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 65 योजना (Section 65 Scheme- अनुबंध पर विनिर्माण की व्यवस्था) सशक्त आपूर्ति श्रृंखला बनाने एवं उसका प्रबंधन करने के लिये कारोबार के एक बहुत अच्छे विकल्प का प्रतिनिधित्त्व करती है।

‘अनुबंध पर विनिर्माण की सीमा शुल्क व्यवस्था’ में पूंजीगत सामान के साथ-साथ कच्चे माल या अनुबंध विनिर्माण में उपयोग होने वाले अन्य सामान पर अलग-अलग दर से आयात शुल्क लगाया जाता है।

अगर तैयार माल का निर्यात किया जाता है तो उस पर आयात शुल्क वापस कर दिया जाता है। हालाँकि अगर तैयार माल को घरेलू बाज़ार में मंज़ूरी दी जाती है तो उपयोग किये जाने वाले कच्चे माल पर बिना ब्याज़ के आयात शुल्क देय होता है। इस वर्तमान योजना का उद्देश्य कुशल क्षमता का उपयोग करना है, यह विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone- SEZ) और निर्यातोन्मुख इकाइयाँ (Export Oriented Units- EOU) जैसी दूसरी योजनाओं से अलग है जो काफी हद तक निर्यात केंद्रित हैं। यह योजना अधिकारियों के साथ न्यूनतम फिज़िकल इंटरफेस को बढ़ावा देती है।

  • प्रत्यक्ष कर के मामलों को निपटाने के उद्देश्य से केंद्रीय वित्त मंत्री ने 1 फरवरी 2020 को अपने बजट भाषण के दौरान विवाद से विश्वास योजना की घोषणा की। इस योजना के तहत करदाता को केवल विवादित करों की राशि का भुगतान करने की आवश्यकता होगी और उसे ब्याज तथा दंड से पूरी तरह छूट मिलेगी। हालाँकि यह आवश्यक है कि करदाता देय करराशि का भुगतान 31 मार्च,2020 से पहले कर दें। 31 मार्च, 2020 के बाद जो लोग इस योजना का लाभ उठाना चाहेंगे, उन्हें 10% अतिरिक्त राशि का भुगतान करना होगा। यह योजना 30 जून, 2020 तक प्रभावी रहेगी। इस योजना में आयुक्त (अपीलीय), आयकर अपीलीय न्यायाधिकरणों (Income Tax Appellate Tribunals- ITAT) उच्च न्यायालयों, उच्चतम न्यायालय एवं अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के स्तर पर लंबित विवादों को शामिल किया गया है। इस योजना का उद्देश्य विभिन्न अपीलीय स्तरों पर लंबित 483000 प्रत्यक्ष कर-संबंधी विवादों को हल करना है। 9 लाख करोड़ रुपए से अधिक के प्रत्यक्ष कर विवाद अदालतों में लंबित हैं।
बजट-2019 में अप्रत्यक्ष करों से संबंधित विवादों को निपटाने के लिये ‘सबका विश्वास योजना’ लाई गई थी। इसके परिणामस्वरूप 1,89,000 से अधिक मामलों को निपटाया गया था।
  • कराधान कानून (संशोधन) अध्यादेश 2019 के तहत कॉरपोरेट कर(सितंबर 2019) में किये गए हैं। इस अध्यादेश के माध्यम से आयकर अधिनियम, 1961 तथा वित्त अधिनियम, 2019 में बदलाव किये जाएंगे।

कंपनियों के लिये कॉरपोरेट कर की आधार दर 30% से घटाकर 22% कर दी गई है। इससे कॉरपोरेट कर की प्रभावी दर 34.94% से कम होकर 25.17% पर आ जाएगी, जिसमें अधिभार और उपकर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त इन कंपनियों को न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternative Tax- MAT) देने की भी आवश्यकता नहीं है। विनिर्माण के क्षेत्र में अक्तूबर 2019 या उसके बाद स्थापित होने वाली तथा 31 मार्च, 2023 से पहले उत्पादन शुरू करने वाली कंपनियों के लिये कॉरपोरेट कर की आधार दर 25% से घटाकर 15% कर दी गई है। इससे इन कंपनियों के लिये प्रभावी कॉरपोरेट कर की दर 29.12% से कम होकर 17.01% पर आ जाएगी। इन कंपनियों को भी न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternative Tax- MAT) से छूट प्राप्त है। कर छूट और प्रोत्साहन का लाभ उठा रही कंपनियों को राहत देने के लिये न्यूनतम वैकल्पिक दर (MAT) को 18.5% से घटाकर 15% करने की घोषणा की गई।

  • जून में ‘गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स काउंसिल’(GST Council) द्वारा केंद्र तथा राज्यों के मध्य बड़े पैमाने पर आई राजस्व में कमी को लेकर जुलाई में ‘एकल-बिंदु एजेंडा’ (Single-Point Agenda) बैठक को आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। इस बैठक में परिषद द्वारा धन जुटाने तथा गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स के नुकसान की भरपाई करने के तरीकों में से एक, बाज़ार ऋण को लेने पर चर्चा की जाएगी।

‘जीएसटी अधिनियम’ में इस बात की गारंटी दी गई है कि जीएसटी कार्यान्वयन (2017-2022) के पहले पाँच वर्षों में राजस्व में किसी भी नुकसान की भरपाई को उपकर (Cess) के माध्यम से पूरा किया जाएगा। उपकर कर के ऊपर लगाया जाने वाला कर है। सामान्यत: इसे किसी विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लगाया जाता है। जीएसटी अधिनियम के तहत यदि राज्यों का वास्तविक राजस्व अनुमानित राजस्व से कम संग्रहित होता है, तो इस अंतर की भरपाई की जाएगी। आधार वर्ष 2015-16 पर राज्यों के लिये अनुमानित राजस्व में हर वर्ष 14 प्रतिशत की वृद्धि होती है। चालू वित्त वर्ष (2020-21) के पहले दो माह में, राज्यों तथा केंद्र द्वारा जीएसटी द्वारा कुल राजस्व संग्रह मासिक लक्ष्य का केवल 45 प्रतिशत ही रहा है। राज्यों द्वारा संग्रहित राजस्व लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2020-21 के लिये, संयुक्त मासिक जीएसटी राजस्व लक्ष्य अनुमानित बजट अनुमान का 1.21 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। वर्ष 2017 में आयोजित GST काउंसिल की 8 वीं बैठक में राज्यों द्वारा ऋण लेने के विकल्प पर चर्चा की गई। इस बैठक में राज्यों द्वारा बाज़ार से उधार लेने तथा अतिरिक्त संसाधन जुटाने के तरीकों को जीएसटी परिषद द्वारा निश्चित किया जाना तय किया गया। जिसकी वापसी छठे वर्ष या उसके बाद के वर्षों में उपकर के संग्रह द्वारा की जा सकती है। जीएसटी क्षतिपूर्ति कानून में प्रावधान है कि परिषद द्वारा अनुशंसित अन्य राशियों को उपकर की कमी के लिये प्रदान किया जाएगा। राज्यों को मुआवज़ा उस उपकर राशि से प्रदान किया जाना है जो क्षतिपूर्ति कोष में जमा होती है। वर्तमान परिदृष्य में जीएसटी परिषद का निर्णय: जीएसटी परिषद द्वारा 5 करोड़ रुपए तक के टर्नओवर वाले छोटे करदाताओं को रिटर्न दाखिल करने से संबंधित राहत प्रदान की गई है। छोटे करदाताओं द्वारा फरवरी, मार्च तथा अप्रैल माह में जीएसटी रिटर्न दाखिल करने में हुई देरी के बावज़ूद 9 प्रतिशत तक कम दर पर किया गया है, बशर्ते रिटर्न सितंबर 2020 तक दाखिल किया जाना चाहिये। बिना किसी ब्याज या विलंब शुल्क के मई, जून और जुलाई माह के लिये रिटर्न भरने की समय सीमा को सितंबर तक बढ़ा दिया गया है।

क्षतिपूर्ति उपकर GST अधिनियम के अनुसार वर्ष 2022 यानी GST कार्यान्वयन शुरू होने के बाद पहले पाँच वर्षों तक GST कर संग्रह में 14 प्रतिशत से कम वृद्धि (आधार वर्ष 2015-16) दर्शाने वाले राज्यों के लिये क्षतिपूर्ति की गारंटी दी गई है। केंद्र द्वारा राज्यों को प्रत्येक दो महीने में क्षतिपूर्ति का भुगतान किया जाता है। क्षतिपूर्ति उपकर ऐसा उपकर है जिसे 1 जुलाई, 2022 तक चुनिंदा वस्तुओं और सेवाओं या दोनों की आपूर्ति पर संग्रहीत किया जाएगा। सभी करदाता (विशिष्ट अधिसूचित वस्तुओं को निर्यात करने वालों को और GST कंपोजीशन स्कीम का विकल्प चुनने वालों को छोड़कर) GST क्षतिपूर्ति उपकर के संग्रहण और केंद्र सरकार को इसके प्रेषण के लिये उत्तरदायी हैं। इसके बाद, केंद्र सरकार इसे राज्यों को वितरित करती है। GST राजस्व में गिरावट के कारण देश में COVID-19 के नियंत्रण हेतु लागू लॉकडाउन के कारण औद्योगिक गतिविधियों को पूरी तरह बंद करना पड़ा है। सार्वजनिक आवाजाही और पर्यटन की गतिविधियों पर रोक से होटल, परिवहन आदि क्षेत्रों से आने वाला राजस्व प्रभावित हुआ है। हालाँकि लॉकडाउन के दौरान भी लगभग 40 प्रतिशत ‘अतिआवश्यक’ श्रेणी की व्यावसायिक गतिविधियों को चालू रखने की अनुमति दी गई थी, परंतु मज़दूरों के पलायन, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और परिवहन के प्रभावित होने आदि कारणों से अपेक्षित राजस्व की प्राप्ति नहीं की जा सकी। लॉकडाउन के कारण उन राज्यों पर और अधिक प्रभाव पड़ा है जिनकी अर्थव्यवस्था में स्थानीय राजस्व की भूमिका अधिक थी। उदाहरण के लिये गुजरात, तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य जिनका 70% से अधिक राजस्व स्थानीय स्रोतों से प्राप्त होता है, उन्हें लॉकडाउन से सबसे अधिक आर्थिक क्षति हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि GST संग्रहण पर अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति का काफी असर देखने को मिला है, आत्मविश्वास की कमी और भय के कारण निवेशक निवेश करने से कतरा रहे हैं और वैश्विक महामारी के कारण अर्थव्यवस्था की मांग में वृद्धि नहीं हो रही है जिसका स्पष्ट प्रभाव GST राजस्व पर पड़ रहा है।

सकल जीएसटी राजस्व (Gross GST Revenue) में 8% की कमी दर्ज

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निगम कर (Corporation Tax):-भारत में इस कर का भुगतान कंपनी कानून 1956 के तहत पंजीकृत कंपनियों द्वारा अर्जित किये गए शुद्ध लाभ पर किया जाता है।
:प्रतिभूति विनिमय कर(Securities Transaction Tax- STT):-भारत में स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध प्रतिभूतियों की खरीद एवं बिक्री पर लगाया गया कर है।

प्रतिभूति व्यापार योग्य निवेश इंस्ट्रूमेंट (Tradable Investment Instruments) जैसे- शेयर, बॉन्ड, डिबेंचर, इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड आदि हैं। इन्हें या तो किसी कंपनी द्वारा या भारत सरकार द्वारा जारी किया जाता है। इस कर को वर्ष 2004 के केंद्रीय बजट में पेश किया गया था और यह 1 अक्टूबर, 2004 से प्रभावी हुआ।

  • वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई, 2017 से लागू हुआ है।101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 366 में एक नया खंड (12A) जोड़ा गया, जिसके अनुसार, ‘वस्तु एवं सेवा कर’ का अर्थ है- मानव उपभोग के लिये मादक पेय पदार्थों की आपूर्ति पर लगने वाले कर को छोड़कर वस्तुओं या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति पर लगने वाला कर।

GST एक अप्रत्यक्ष कर है जिसे भारत को एकीकृत साझा बाज़ार बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया है। यह निर्माता से लेकर उपभोक्ताओं तक वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति पर लगने वाला एकल कर है। GST के अंतर्गत जहाँ एक ओर केंद्रीय स्तर पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सेवा कर, काउंटरवेलिंग ड्यूटी जैसे अप्रत्यक्ष कर शामिल होंगे वहीं दूसरी ओर राज्यों में लगाए जाने वाले मूल्यवर्द्धन कर, मनोरंजन कर, चुंगी तथा प्रवेश कर, विलासिता कर आदि भी सम्मिलित हो जाएँगे।

वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 में हुए शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह की तुलना में वित्त वर्ष 2019-20 में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में कमी

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वित्त मंत्रालय के अनुसार, सरकार द्वारा लागू किये गए ऐतिहासिक कर सुधारों के साथ-साथ वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान काफी अधिक रिफंड जारी किये जाने के कारण यह गिरावट अस्थायी है। वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान कुल 1.84 लाख करोड़ रुपए का रिफंड जारी किया गया था, जो कि वित्त वर्ष 2018-19 में किये गए 1.61 लाख करोड़ रुपए के रिफंड की तुलना में काफी अधिक है। प्रमुख कर सुधार

  1. निगम कर की दर में कमी :- विकास और निवेश को बढ़ावा देने के लिये सरकार ने कराधान कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2019 के माध्यम से एक ऐतिहासिक कर सुधार लागू किया है, जिसके तहत वित्त वर्ष 2019-20 से सभी मौजूदा घरेलू कंपनियों के लिये 22 प्रतिशत की रियायती कर व्यवस्था प्रदान की गई, बशर्ते कि वे किसी भी निर्दिष्ट छूट या प्रोत्साहन का लाभ न उठाएँ। इन कंपनियों को न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternate Tax-MAT) के भुगतान से भी छूट दे दी गई है।
  2. नई विनिर्माण घरेलू कंपनियों हेतु प्रोत्साहन :-विनिर्माण क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिये कराधान कानून (संशोधन) अध्यादेश 2019 के माध्यम से नई विनिर्माण घरेलू कंपनी के लिये कर की दर को घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है, बशर्ते कि इस तरह की कंपनी किसी भी निर्दिष्ट छूट या प्रोत्साहन का लाभ न उठाए। इन कंपनियों को भी न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) के भुगतान से छूट दी गई है।

न्यूनतम वैकल्पिक कर की दर में कटौती सरकार ने कंपनियों को राहत प्रदान करने के लिये न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternate Tax-MAT) की दर भी 18.5 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दी गई है। आयकर में छूट 5 लाख रुपये तक की कर योग्य आय वाले व्यक्तियों को आयकर के भुगतान से पूरी तरह राहत प्रदान करने के लिए वित्त अधिनियम, 2019 के माध्यम से 100 प्रतिशत कर छूट प्रदान की गई है। इसके अलावा, वेतनभोगी करदाताओं को राहत देने के लिये वित्त अधिनियम, 2019 के माध्यम से मानक कटौती (Standard Deduction) को 40,000 रुपए से बढ़ाकर 50,000 रुपए कर दिया गया है। उपरोक्त सुधारों का राजस्व प्रभाव निगम कर के लिये 1.45 लाख करोड़ रुपए और व्यक्तिगत आयकर के 23,200 करोड़ रुपए आंका गया है। लाभांश वितरण कर (Dividend Distribution Tax-DDT) की समाप्ति सरकार ने भारतीय इक्विटी बाज़ार का आकर्षण बढ़ाने और निवेशकों के एक बड़े वर्ग को राहत देने के लिये वित्त अधिनियम, 2020 के माध्यम से लाभांश वितरण कर (DDT) को समाप्त कर दिया है, जिसके तहत कंपनियों को 01.04.2020 से डीडीटी का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है। विवाद से विश्वास :- वर्तमान समय में बड़ी संख्‍या में प्रत्यक्ष करों से संबंधित विवाद अधिनिर्णय के विभिन्न स्तरों पर में लंबित हैं। इन कर विवादों में सरकार के साथ-साथ करदाताओं के संसाधनों का भी एक बड़ा हिस्सा लग जाता है और इसके साथ ही ये विवाद सरकार को समय पर राजस्व संग्रह से वंचित कर देते हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए लंबित कर विवादों के त्वरित समाधान की नितांत आवश्यकता महसूस की गई, जो न केवल समय पर राजस्व सृजित करके सरकार को लाभांवित करेगा, बल्कि करदाताओं को भी लाभांवित करेगा। ‘प्रत्यक्ष कर विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’ को 17 मार्च, 2020 को कानून का रूप दिया गया जिसके तहत फि‍लहाल विवादों को निपटाने के लिये घोषणाएँ दाखिल की जा रही हैं। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण को सुगम बनाने और बेहिसाब लेन-देन को कम करने के लिये विभिन्न उपाय किये गए हैं, जिनमें डिजिटल टर्नओवर पर अनुमानित लाभ की दर में कमी करना, लेन- देन के निर्दिष्‍ट तरीकों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate-MDR) को हटाना, नकद लेन-देन के लिये प्रारंभिक सीमा को कम करना, कुछ विशेष नकदी लेन-देन पर रोक लगाना आदि शामिल हैं। अपील दाखिल करने के लिए मौद्रिक सीमा बढ़ाना करदाताओं की शिकायतों/मुकदमेबाजी में प्रभावकारी रूप से कमी लाने और मुख्यतः जटिल कानूनी मुद्दों एवं अधिक कर अदायगी वाले मुकदमों पर ही आयकर विभाग का ध्यान केंद्रित करने में मदद करने के लिये विभागीय अपील दाखिल करने हेतु आरंभिक मौद्रिक सीमा को आयकर अपील अधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal) में अपील करने के लिये 20 लाख रुपए से बढ़ाकर 50 लाख रुपए, उच्च न्यायालय में अपील करने के लिये 50 लाख रुपए से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए और सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए कर दिया गया है।

जून 1930 में ‘Dust Bowl’ से प्रभावित किसानों के समर्थन के लिये Smoot-Hawley टैरिफ (यू.एस. टैरिफ एक्ट, 1930) विदेशी कृषि आयात पर पहले से ही आरोपित उच्च शुल्क को और बढ़ा दिया। इसे ‘स्मूट-हॉली टैरिफ वॉर’ के नाम से जाना जाता है। Dust Bowl : धूल भरी तेज़ आँधियों की एक अवधि को यह संज्ञा दी गई है जिसने 1930 के दशक में अमेरिका और कनाडा के प्रेयरी घास मैदानों की पारिस्थितिकी और कृषि को तबाह कर दिया था। सहायता के बजाय इसने अमेरिकियों के लिये खाद्य मूल्यों में और वृद्धि कर दी, जबकि वे पहले से ही अमेरिकी ‘ग्रेट डिप्रेशन’ की मार झेल रहे थे। इसने अन्य देशों को अपने स्वयं के शुल्क अधिरोपण के साथ जवाबी कार्रवाई के लिये विवश किया। इससे वैश्विक व्यापार में 65 प्रतिशत गिरावट आई।

भुगतान संतुलन और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय(MoC&I)

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  • भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ, फिक्की (FICCI) के वेबिनार को संबोधित करते हुए MoC&I मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि ‘इस वर्ष जुलाई माह में पिछले वर्ष जुलाई माह के 91 प्रतिशत निर्यात स्तर को हासिल किया जा चुका है, वहीं इस वर्ष आयात जुलाई 2019 के स्तर के 70 से 71 प्रतिशत के बीच ही रहा है।

इस वर्ष जून माह में भारत के निर्यात में लगातार चौथी बार गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि पेट्रोलियम और कपड़ा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के शिपमेंट में गिरावट देखी गई है, हालाँकि भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में पहली बार अधिशेष की स्थिति(जून माह में 0.79 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज) दर्ज की गई है, क्योंकि आयात में 47.59 प्रतिशत की गिरावट आई है।

भुगतान शेष (Balance Of Payment-BoP) का अभिप्राय ऐसे सांख्यिकी विवरण से होता है, जो कि एक निश्चित अवधि के दौरान किसी देश के निवासियों के विश्व के साथ हुए मौद्रिक लेन-देनों के लेखांकन को रिकॉर्ड करता है। इसका उपयोग किसी देश की मुद्रा का अभिमूल्यन (Appreciation) अथवा मूल्यह्रास (Depreciating) दिखाने के लिए किया जा सकता है।

यह दूसरे देशों के साथ किसी एक देश के आर्थिक व्यवहार का विश्लेषण करने और उसे समझने हेतु महत्त्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। भुगतान शेष के मुख्य घटक

  • चालू खाते का उपयोग देशों के बीच माल एवं सेवाओं के अंतर्वाह और बहिर्वाह की निगरानी के लिये किया जाता है। इस खाते में कच्चे माल तथा निर्मित वस्तुओं के संबंध में किये गए सभी भुगतानों और प्राप्तियों को शामिल किया जाता है। चालू खाता के अंतर्गत मुख्यत: तीन प्रकार के लेन-देन, जिसमें
  1. वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात
  2. कर्मचारियों व विदेशी निवेश से प्राप्त आय एवं खर्च
  3. विदेशों से प्राप्त अनुदान राशि, उपहार एवं विदेश में बसे कामगारों द्वारा भेजी जाने वाली विप्रेषण (Remittance) की राशि, को शामिल किया जाता है।

व्यापार संतुलन केवल वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात और आयात से होने वाली आय और खर्च में अंतर को मापता है, जबकि चालू खाता विदेशों में घरेलू पूंजी के प्रयोग से प्राप्त भुगतान को भी शामिल करता है।

  • पूंजी खाता के माध्यम से देशों के बीच सभी पूंजीगत लेन-देनों की निगरानी की जाती है। पूंजीगत लेन-देन में भूमि जैसी गैर-वित्तीय संपत्तियों की खरीद और बिक्री को शामिल किया जाता है। पूंजी खाते के मुख्यतः तीन तत्त्व हैं।
  1. विदेश में स्थित निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों से लिया गया सभी प्रकार का ऋण
  2. गैर-निवासियों द्वारा कॉर्पोरेट शेयरों में किये गए निवेश की राशि और
  3. अंततः विनिमय दर के नियंत्रण हेतु देश के केंद्रीय बैंक द्वारा रखा गया विदेशी मुद्रा भंडार।
  • वित्तीय खाता:-रियल एस्टेट, व्यावसायिक उद्यम, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आदि में विभिन्न निवेशों के माध्यम से विदेशों से/को होने वाले धन के प्रवाह पर वित्तीय खाते के माध्यम से निगरानी की जाती है। यह खाता घरेलू परिसंपत्तियों के विदेशी स्वामित्त्व और विदेशी संपत्ति के घरेलू स्वामित्त्व में परिवर्तन को मापता है। इससे यह ज्ञात किया जा सकता है, कि कोई देश अधिक संपत्ति बेच रहा है या प्राप्त कर रहा है।

भारत और अमेरिका के बीच एक मुद्रा विनिमय समझौते (Currency Swap Agreement) पर सहमति

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आर्थिक क्षेत्र में COVID-19 के प्रभावों को देखते हुए भारत सरकार आने वाले दिनों में किसी भी अनिश्चितता की स्थिति से निपटने हेतु इस सहमति के लिये प्रयास कर रही है। आर्थिक क्षेत्र में COVID-19 से उत्पन्न हुए दबाव के कारण मार्च और अप्रैल में अब तक भारतीय इक्विटी और ऋण बाज़ार में संस्थागत विदेशी निवेशकों द्वारा बड़ी मात्रा में शेयर की बिक्री देखी गई है। भारतीय रुपए में भारी गिरावट देखी गई और इस दौरान भारतीय रुपए की कीमत 1 अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 76 रुपए तक हो गई थी। 27 मार्च, 2020 तक भारत की विदेशी मुद्रा आस्तियां (Foreign Currency Assets) 7.50 बिलियन अमेरिकी डॉलर की गिरावट के साथ 439.66 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई। भारतीय रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, भारतीय की कुल विदेशी मुद्रा अस्तियों में से 63.7% (256.17 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश विदेशी प्रतिभूतियों (विशेषकर अमेरिकी ट्रेज़री) में किया गया है। भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार को ‘भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934’ और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999 के तहत विनियमित किया जाता है।

द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय समझौता दो देशों के बीच निश्चित विनिमय दर पर दी जाने वाली एक तरह की क्रेडिट लाइन है। इसके द्वारा अमेरिकी फेडरल रिज़र्व विदेशी केंद्रीय बैंक को डॉलर प्रदान करता है और वह विदेशी केंद्रीय बैंक उस समय के बाज़ार विनिमय दर के आधार पर अमेरिकी फेडरल रिज़र्व को प्राप्त हुए डॉलर के बराबर अपनी मुद्रा देता है।

इसके साथ ही दोनों पक्ष एक निश्चित समय के बाद उसी विनिमय दर के आधार पर पुनः यह मुद्रा वापस करने के लिये एक समझौता करते हैं। इस तरह के विनिमय में कोई बाज़ार जोखिम (Market Risk) नहीं होता है क्योंकि इसकी शर्तें पहले से ही निर्धारित होती हैं।

रुपए की विनिमय दर

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कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के प्रसार के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे में रुपए की विनिमय दर को भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का अनुमान लगाने के लिये एक उपयुक्त मापदंड के रूप में देखा जा सकता है। मुद्रा विनिमय दर(Currency Exchange Rate) का अभिप्राय घरेलू मुद्रा के रूप में विदेशी मुद्रा की एक इकाई की कीमत से होता है। उदाहरण के लिये, यदि हमें एक डॉलर प्राप्त करने के लिये 76 रुपए देने पड़ते हैं तो विनिमय दर 76 रुपए प्रति डॉलर होगी। मुद्रा विनिमय दर ही अक्सर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रय और विक्रय की सामर्थ्यता निर्धारित करती है। किसी भी मुद्रा की विनिमय दर उसकी मांग और आपूर्ति की परस्पर क्रिया द्वारा निर्धारित की जाती है। कई बार एक देश का केंद्रीय बैंक विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को कम करने के लिये हस्तक्षेप करता है। किंतु आर्थिक जगत में केंद्रीय बैंक अथवा सरकार के अत्यधिक हस्तक्षेप को उचित नहीं माना जाता है।

जिन मापदंडों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:-

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) 36 व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं के संबंध में रुपए की ‘नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट’ (Nominal Effective Exchange Rate-NEER) को सारणीबद्ध करता है। यह एक प्रकार का भारित सूचकांक है अर्थात् इसमें उन देशों को अधिक महत्त्व दिया जाता है, जिनके साथ भारत अधिक व्यापार करता है। इस सूचकांक में कमी रुपए के मूल्य में ह्रास को दर्शाती है, जबकि सूचकांक में बढ़ोतरी रुपए के मूल्य में अभिमूल्यन को दर्शाती है। RBI द्वारा जारी NEER के अनुसार, बीते कुछ समय में रुपया नवंबर 2018 के पश्चात् से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है।

NEER के अतिरिक्त ‘रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट’ (Real Effective Exchange Rate-REER) भी भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों को मापने के लिये एक महत्त्वपूर्ण मापदंड है।

REER के अंतर्गत NEER में शामिल अन्य कारकों के अतिरिक्त विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू मुद्रास्फीति को भी ध्यान में रखा जाता है, जिसके कारण इसका महत्त्व अधिक बढ़ जाता है। REER के संदर्भ में बीते कुछ समय में रुपया सितंबर 2019 के पश्चात् से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है।

विनिमय दर और मुद्रास्फीति(Exchange Rate and Inflation)किसी भी देश की विनिमय दर को ब्याज दर तथा राजनीतिक स्थिरता जैसे कई अन्य कारण प्रभावित करते हैं। इन्ही कारकों में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है, मुद्रास्फीति। उदाहरण के लिये, मान लेते हैं कि पहले वर्ष में रुपए की विनिमय दर 1 रुपए प्रति डॉलर है।

इस प्रकार हम 100 रुपए में 100 अमेरिकी डॉलर प्राप्त कर सकते हैं। किंतु यदि अगले वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति 20 प्रतिशत रहती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति शून्य रहती है तो अगले वर्ष में वही 100 अमेरिकी डॉलर प्राप्त करने के लिये हमें 120 रुपए की आवश्यकता होगी।

NEER बनाम REER

NEER विदेशी मुद्राओं के संदर्भ में घरेलू मुद्रा के द्विपक्षीय विनिमय दरों का भारित औसत होता है। जबकि REER मुद्रास्फीति के प्रभावों के लिये समायोजित अन्य प्रमुख मुद्राओं के सापेक्ष घरेलू मुद्रा का भारित औसत है। NEER विदेशी मुद्रा बाज़ार के संदर्भ में देश की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा का एक संकेतक है। REER की गणना NEER में मूल्य परिवर्तन को समायोजित करने के पश्चात् की जाती है। इस प्रकार अर्थशास्त्री NEER की अपेक्षा REER को अधिक महत्त्व देते हैं। NEER = विशेष आहरण अधिकार (SDR) के संदर्भ में घरेलू विनिमय दर/विशेष आहरण अधिकार (SDR) के संदर्भ में विदेशी विनिमय दर REER = NEER × (घरेलू मूल्य सूचकांक/विदेशी मूल्य सूचकांक) मुद्रा का मूल्यह्रास (Depreciation) और अभिमूल्यन (Appreciation)

राजकोषीय नीति

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  • मई में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019-20 की अंतिम तिमाही अर्थात् जनवरी-मार्च माह में सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product-GDP) की वृद्धि दर 3.1 प्रतिशत तक गिर गई है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में सकल स्थायी पूंजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation- GFCF) में (-) 2.8 प्रतिशत दर से नकारात्मक वृद्धि हुई।

GFCF का आशय सरकारी और निजी क्षेत्र में स्थायी पूंजी पर किये जाने वाले शुद्ध पूंजी व्यय के आकलन से है। माना जाता है कि यदि किसी देश के GFCF में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है तो उस देश के आर्थिक विकास में भी तेज़ी से वृद्धि होगी। वहीं इसके विपरीत GFCF में गिरावट अर्थव्यवस्था के नीति निर्माताओं के लिये चिंताजनक विषय होता है।

  • NSO द्वारा जारी किये गए नवीनतम अनुमान के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019-20 की प्रथम तीन तिमाहियों में सकल मूल्य वर्द्धन (GVA)गिरावट दर्ज़ की गई और संशोधित वृद्धि दर क्रमशः 4.8 प्रतिशत, 4.3 प्रतिशत और 3.5 प्रतिशत का आकलन किया गया। सेवा क्षेत्र के बड़े भागीदार यथा- वित्त, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाओं की वृद्धि दर में तीव्र गिरावट हुई है।

वित्तीय वर्ष 2015-16 से प्रारंभ सकल मूल्य वर्द्धन किसी देश की अर्थव्यवस्था में सभी क्षेत्रों, यथा- प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीय क्षेत्र और तृतीयक क्षेत्र द्वारा किया गया कुल अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन का मौद्रिक मूल्य होता है। GVA से किसी अर्थव्यवस्था में होने वाले कुल निष्पादन और आय का पता चलता है। जब किसी उत्पाद के मूल्य से उसकी इनपुट लागत और कच्चे माल की लागत में कटौती के बाद जो राशि शेष बचती है उसे GVA कहते हैं। उदाहरण के लिये अगर कोई कंपनी 20 रुपये में ब्रेड का पैकेट बेचती है और इसे बनाने में 16 रुपये इनपुट और कच्चे माल की लागत के रूप में प्रयोग होता है तो उस स्थिति में GVA का संग्रहण 4 रुपये माना जाएगा।

सकल मूल्य वर्द्धन = GDP + उत्पादों पर सब्सिडी - उत्पादों पर कर

GVA की गणना आधार वर्ष 2011-12 को आधार मानकर की जाती है। NSO , सकल मूल्य वर्द्धन के लिये तिमाही और वार्षिक दोनों अनुमान प्रदान करता है । यह आठ व्यापक श्रेणियों पर क्षेत्रवार वर्गीकरण डेटा प्रदान करता है जिसमें अर्थव्यवस्था में उपलब्ध कराई गई वस्तुओं और सेवाएँ दोनों शामिल हैं। आठ श्रेणियाँ इस प्रकार हैं-

  1. कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन,
  2. खनन एवं उत्खनन,
  3. विनिर्माण,
  4. बिजली, गैस, पानी की आपूर्ति और अन्य जनोपयोगी सेवाएँ,
  5. निर्माण,
  6. व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण से संबंधित सेवाएँ समग्र GVA की गणना में लगभग 20 प्रतिशत का योगदान करती हैं।
  7. वित्तीय, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाएँ लगभग एक-चौथाई का योगदान करती हैं।
  8. लोक प्रशासन, रक्षा और अन्य सेवाएँ।

GDP केवल उन वस्तुओं और सेवाओं को प्रतिबिंबित करता है जो विपणन योग्य हैं और जिनके बाज़ार हैं। जिसका बाज़ार नहीं होता, उसे GDP में शामिल नहीं किया जाता। इसको समझने के लिये पर्यावरणीय क्षरण का उदाहरण लेते हैं, जिसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है लेकिन पर्यावरणीय क्षरण की गणना बाज़ार मूल्य में नहीं की जा सकती, अतः इसे GDP में शामिल नहीं किया जाता।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office- NSO) :- वर्ष 2019 में सरकार ने सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Office- NSSO) को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) के साथ विलय करने का निर्णय लिया और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के गठन को मंज़ूरी दी।

एक एजेंसी के रूप में NSO को राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (National Statistical Commission-NSC) द्वारा निर्धारित सांख्यिकीय मानकों को लागू करने और बनाए रखने के लिये तथा राज्य एजेंसियों की सांख्यिकीय गतिविधियों का पर्यवेक्षण करने के लिये सर्वप्रथम डॉ. सी. रंगराजन द्वारा परिकल्पित किया गया था। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अंतर्गत 4 डिविजन बनाई गई हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. सर्वे डिज़ाइन एंड रिसर्च डिविजन (Survey Design and Research Division-SDRD)
  2. फील्ड ऑपरेशंस डिविजन (Field Operations Division-FOD)
  3. डेटा प्रोसेसिंग डिविजन (Data Processing Division-DPD)
  4. सर्वे कॉर्डिनेशन डिविजन (Survey Coordination Division-SCD)

इसका उद्देश्य मंत्रालय के वर्तमान नोडल कार्यों को सुव्यवस्थित और मज़बूत करना है और मंत्रालय के भीतर प्रशासनिक कार्यों को एकीकृत कर बेहतर तालमेल स्थापित करना है। यह सांख्यिकीय प्रणाली की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करेगा क्योंकि इन दो निकायों पर नियंत्रण की कमी वर्तमान में एक चुनौती थी। यह अन्य देशों के साथ भारत की सांख्यिकीय प्रणाली को संरेखित करेगा। GDP और GVA में मुख्य अंतर सकल मूल्य वर्द्धन पद्धति के अंतर्गत जहाँ उत्पादक या आपूर्ति पक्ष की तरफ से आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर पेश की जाती है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद पद्धति के अंतर्गत उपभोक्ता पक्ष या मांग पक्ष के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक गतिविधियों का अनुमान लगाया जाता है। इस प्रकार सकल मूल्य वर्द्धन पद्धति पूर्ति आधारित जबकि सकल घरेलू उत्पाद पद्धति मांग आधारित अर्थव्यवस्था को मापने का तरीका है।

COVID-19 महामारी के परिणामस्वरूप भारत के राजकोषीय घाटे में अप्रत्याशित वृद्धि

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जून, 2020 में समाप्त पहली तिमाही में बजटीय अनुमान के 83.2 प्रतिशत यानी 6.62 लाख करोड़ रुपए पर पहुँच गया है। अर्थव्यवस्था को महामारी के प्रकोप से बचाने और महामारी के परिणामस्वरूप राजस्व की कमी को पूरा करने के लिये सरकार द्वारा लिये जा रहे अतिरिक्त ऋण के कारण देश का राजकोषीय घाटा 8 प्रतिशत के आस- पास जा सकता है।

वित्तीय वर्ष 1999 से अब तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, यह किसी भी पहली तिमाही के लिये प्रतिशत के लिहाज़ से सबसे अधिक राजकोषीय घाटा है। वित्तीय वर्ष 2020-21 के केंद्रीय बजट में सरकार ने देश के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 7.96 लाख करोड़ रुपए अथवा सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत निर्धारित किया था।

राजकोषीय घाटे में वृद्धि के कारण:

  1. अप्रैल से जून माह तक केंद्र सरकार को कर, गैर-कर राजस्व और ऋण वसूली आदि माध्यमों से 1.53 लाख करोड़ रुपए प्राप्त हुए हैं। जो कि पूरे वर्ष के बजट अनुमान के 7 प्रतिशत से भी कम है।
  2. कैग के रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के लिये केंद्र सरकार का कुल व्यय 8.15 करोड़ रुपए था, जो कि पूरे वर्ष के लिये बजट अनुमान का लगभग 27 प्रतिशत है।
  3. वहीं केंद्र सरकार ने करों के अपने हिस्से के रूप में राज्यों को 1.34 लाख करोड़ रुपए स्थानांतरित किये हैं, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 14,588 करोड़ रुपए कम है।
  4. इसके अलावा केंद्र सरकार ने अतिरिक्त उधार लेने की योजनाओं की घोषणा पहले ही कर दी है, जो जीडीपी का लगभग 5.7 प्रतिशत है।
  5. कर राजस्व में कमी:-वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की अवधि में सरकार का शुद्ध कर राजस्व 2.69 लाख करोड़ रुपए था, जबकि इसी अवधि में बीते वर्ष कुल शुद्ध कर राजस्व 4 लाख करोड़ रुपए था।

इस अवधि में प्रत्यक्ष कर संग्रह 1.19 लाख करोड़ रुपए रहा, जो कि बीते वर्ष के संग्रह से लगभग 51,460 करोड़ रुपए कम है। इस अवधि में कुल अप्रत्यक्ष कर 1.51 लाख करोड़ रुपए रहा है। इस वर्ष की पहली तिमाही में निगम कर संग्रह में बीते वर्ष की पहली तिमाही की अपेक्षा 23.2 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि लॉकडाउन के दौरान आय में कटौती और रोज़गार न होने कारण आयकर संग्रह में कुल 36 प्रतिशत ी कमी दर्ज की गई है। राजकोषीय घाटा:-कुल राजस्व की गणना करते समय ऋण को शामिल नहीं किया जाता है।

राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति (Fiscal Marksmanship)

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  • 1 फरवरी को वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिये बजट प्रस्तुत किया गया। इस बजट में भारतीय अर्थव्यवस्था को मौजूदा मंदी से उबारना और वर्ष 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य प्राप्त करना बजट निर्माताओं के समक्ष बड़ी चुनौती होगी। पिछले कुछ वर्षों में सरकार के बजट अनुमान और वास्तविक आँकड़ों में व्यापक अंतर रहने के कारण राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति (Fiscal Marksmanship) एक बार फिर चर्चा का विषय बना है।

राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति अनिवार्य रूप से राजस्व, व्यय और घाटा आदि जैसे राजकोषीय मापदंडों के सरकार के पूर्वानुमान की सटीकता को संदर्भित करता है। दूसरे शब्दों में यदि सरकार के बजट में अनुमानित कर राजस्व और वास्तविक कर राजस्व में बड़ा अंतर आता है तो उसे खराब राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति कहा जाएगा। सर्वप्रथम राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति शब्द का उल्लेख आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 में रघुराम राजन द्वारा किया गया था। उन्होंने राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति को "सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में वास्तविक परिणामों और बजटीय अनुमानों के बीच अंतर" के रूप में परिभाषित किया था। राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति का महत्त्व:- चूँकि बजट की विश्वसनीयता उसके आँकड़ों में निहित होती है तथा सार्वजनिक रूप से बजट या वार्षिक वित्तीय विवरण का लोकतंत्र में खुलासा करने और विधायिका से अनुमोदन प्राप्त करने का केंद्रीय उद्देश्य नीति निर्धारण और शासन को पारदर्शी एवं भागीदारीपूर्ण बनाना है। बजट आँकड़ों के अनुमान और आकलन पर आधारित होता है तथा एक वर्ष बाद वास्तविक आँकड़ों के साथ उसका मिलान किया जाता है जिसके बाद लक्ष्य प्राप्ति का आकलन किया जाता है। यदि राजकोषीय अनुमान बार-बार विफल होंगे अर्थात् बजट अनुमान अधिक व प्राप्ति कम होगी तो, इससे नागरिकों में बजट के प्रति विश्वसनीयता कम होगी। इसलिये राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति का राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति निर्धारण में अत्यधिक महत्त्व है। पिछले दो बजट अनुमानों (वर्ष 2019-20 के लिये अंतरिम बजट और वर्ष 2019-20 के लिये पूर्ण बजट) में काफी विसंगति है। उदाहरण के लिए जुलाई 2019 के बजट में 2019-20 में नॉमिनल GDP (Nominal GDP) 12% की दर से बढ़ने की उम्मीद की गई थी किंतु जनवरी 2020 में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा फर्स्ट एडवांस एस्टीमेट (First Advance Estimates- FAE) में नॉमिनल GDP में 7.5% की दर से वृद्धि का अनुमान लगाया है। चूँकि बजट की गणना नॉमिनल GDP के आधार पर की जाती है, इसलिये नॉमिनल GDP में व्यापक परिवर्तन का असर संपूर्ण आगामी बजट पर प्रदर्शित होगा। उदाहरण के लिये वर्तमान में सरकार के अनुमान के अनुसार, प्राप्ति के कोई आसार नही दिख रहे हैं नतीज़तन या तो राजकोषीय घाटा बजट आँकड़ों से अधिक हो जाएगा या व्यय आँकड़ा बजट की तुलना में बहुत कम होगा।

राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति में अनियमितता के कारण

किसी देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में 1 वर्ष में कमी (या वृद्धि) से राजकोषीय पूर्वानुमान कम या अधिक हो सकता है। वर्ष 2017 में एक संरचनात्मक परिवर्तन किया गया जिसके अंतर्गत बजट प्रस्तुत करने की तिथि को फरवरी के अंतिम सप्ताह या 28 या 29 फरवरी के स्थान पर फरवरी के पहले सप्ताह या 1 फरवरी कर दिया गया है जो कि लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक बना है। इस संदर्भ में सरकार का तर्क था कि एक महीने में पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि अगले वित्त वर्ष की शुरुआत में सभी मंत्रालयों के पास धन हो (यानी 1 अप्रैल तक)। लेकिन बजट प्रस्तुत करने की तिथि 1 फरवरी करने से संपूर्ण बजट बनाने की प्रक्रिया को 1 माह पहले शुरू की गई इसका आशय है कि पहले अग्रिम अनुमान, जो जनवरी के अंत तक आते थे (वित्तीय वर्ष की पहली तीन तिमाहियों की आर्थिक गतिविधि को ध्यान में रखते हुए) अब जनवरी की शुरुआत में आने लगे। इस प्रकार आँकड़ों में अनियमितता राजकोषीय पूर्वानुमान और राजकोषीय लक्ष्य प्राप्ति को प्रभावित करता है।

पी-नोट्स,प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश

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  • अगस्त 2020 में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय पूंजी बाज़ारों में पी-नोट्स (P-Notes) के माध्यम से निवेश बढ़कर जुलाई, 2020 के अंत तक 63288 करोड़ रुपए हो गया है। पी-नोट्स के माध्यम से निवेश में यह लगातार चौथी मासिक वृद्धि है। 63288 करोड़ में से इक्विटी में 52,356 करोड़ रुपए का, ऋणों में 10,429 करोड़ रुपए का, हाइब्रिड प्रतिभूतियों में 250 करोड़ रुपए का, डेरीवेटिव्स में 190 करोड़ रुपए का निवेश किया गया।

डेरीवेटिव (Derivative) एक वित्तीय साधन है जो अंतर्निहित परिसंपत्तियों से इसका मूल्य प्राप्त करता है।

पी-नोट्स या ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स (ODIs), पंजीकृत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) द्वारा विदेशी निवेशकों, हेज़ फंड और विदेशी संस्थानों को जारी किये जाते हैं, जो सेबी में पंजीकृत हुए बिना भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश करना चाहते हैं।

यद्यपि सेबी ने प्रत्येक पी-नोट्स (Participatory Notes) के लिये 1,000 डॉलर का नियामक शुल्क लगाया है ताकि सट्टे (Speculation) के लिये पी-नोट्स का प्रयोग न किया जा सके है। अब, यह शुल्क प्रत्येक पी-नोट्स जारी करने वाले सभी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) पर लगाया जाता है। सेबी, पी-नोट्स जारी करने वाले पर प्रत्येक तीन वर्ष में 1,000 डॉलर का शुल्क लगाता है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई FPI पाँच अलग-अलग निवेशकों को पी-नोट्स जारी करता है, तो उसे 5,000 डॉलर का भुगतान शुल्क के रूप में जमा करना पड़ता है।

वित्तीय बाज़ारों को उनमें कारोबार किये गए वित्तीय साधनों की परिपक्वता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
  1. मुद्रा बाज़ार (Money Market) में एक वर्ष से कम की परिपक्वता वाले वित्तीय उपकरणों का कारोबार किया जाता है। जैसे- ट्रेजरी बिल, वाणिज्यिक पत्र आदि।
  2. पूंजी बाज़ार (Capital Market) में अधिक समय की परिपक्वता वाले उपकरणों का कारोबार होता है। जैसे- शेयर, डिबेंचर आदि।
  • जुलाई 2020 में ‘सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय’ (MoSPI) द्वारा जारी किये गए नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, भारत की ‘खुदरा मुद्रास्फीति’ (Retail Inflation) वृद्धि दर जून के महीने में 6.09% के स्तर पर पहुँच गई है।

भारत में खुदरा मुद्रास्फीति दर को ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (Consumer Price Index-CPI) के आधार पर मापा जाता है। यह खरीदार के दृष्टिकोण से मूल्य परिवर्तन की माप करता है। यह चयनित वस्तुओं एवं सेवाओं के खुदरा मूल्यों के स्तर में समय के साथ बदलाव को मापता है, जिस पर उपभोक्ता अपनी आय खर्च करते हैं।CPI का आधार वर्ष 2012 है। सरकार द्वारा कोरोना महामारी की रोकथाम के चलते देशव्यापी ‘लॉकडाउन’ के कारण अप्रैल और मई माह के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति दर के आंकड़ें जारी नहीं किये गए हैं। हालांकि, अप्रैल में CPI आँकड़ों को मार्च महीने के आँकड़ों के आधार पर संशोधित कर 5.84% कर दिया गया था। मई माह में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (Consumer Food Price Index-CFPI)का स्तर 9.20 % था। सरकार द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक को मुद्रास्फीति (Inflation) की दर को 4% (2% ऊपर या नीचे) पर रखने का निश्चित किया गया है। CPI के महँगाई दर के आँकड़े रिज़र्व बैंक के मध्यम अवधि लक्ष्य 4% के ऊपर अर्थात खुदरा मुद्रास्फीति दर भारतीय रिज़र्व बैंक के मार्जिन से 6%अधिक हो गई है।

खुदरा मुद्रास्फीति दर:-जब एक निश्चित अवधि में वस्तुओं या सेवाओं के मूल्य में वृद्धि के कारण मुद्रा के मूल्य में गिरावट दर्ज़ की जाती है तो उसे मुद्रास्फीति कहते हैं। मुद्रास्फीति को जब प्रतिशत में व्यक्त करते हैं तो यह महंगाई दर या खुदरा मुद्रास्फीति दर कहलाती है। सरल शब्दों में कहें तो यह कीमतों में उतार-चढ़ाव की रफ्तार को दर्शाती है।

अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को कम करके, उत्पादन में वृद्धि दर को बढ़कर, उत्पादों का आयात करके तथा उत्पादन तकनीक में सुधार कर उत्पादों की लागत कम करके खुदरा मुद्रास्फीति दर को नियंत्रित किया जा सकता है ।

  • जून माह के पहले सप्ताह में ‘इक्विटी बाज़ार’ (Equity Market) में 'विदेशी पोर्टफोलियो निवेश' (FPI) में भारी वृद्धि देखी गई है। एक ही सप्ताह में FPI के रूप में प्राप्त हुआ यह निवेश वर्ष 2020 में अब तक किसी माह में हुआ सबसे अधिक निवेश है। जून 2020 के पहले सप्ताह में 5 दिनों के व्यापार के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा लगभग 21,000 करोड़ के शेयर की खरीद की गई है।

FPI में हुई यह वृद्धि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (Reliance Industries Limited- RIL) द्वारा जारी राइट्स इश्यू (Rights Issue से 53,124.20 करोड़), कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank) में हिस्सेदारी की बिक्री और वर्तमान महामारी के बीच भी बाज़ार के प्रति लोगों की सकारात्मक सोच में वृद्धि को भी माना जा सकता है। 4 जून को कोटक महिंद्रा बैंक के निदेशक उदय कोटक ने बैंक में 2.8% हिस्सेदारी (लगभग 6,800 करोड़ के शेयर) बेच दी, जो ‘गवर्नमेंट ऑफ सिंगापुर इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन’, ओपेनहाइमर डेवेलपिंग मार्केट फंड और टी.रो प्राइस (T. Rowe Price) जैसे कई विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा खरीदे गए। इस दौरान ऑटोमोबाइल, निजी बैंक (Private Bank) और फार्मास्यूटिकल्स (Pharmaceuticals) जैसे क्षेत्रों के निवेश में वृद्धि देखने को मिली है। हालाँकि जून माह में FPI में हुई इस वृद्धि के बावजूद भी मार्च और अप्रैल में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाज़ार से बड़ी मात्रा में पूंजी निकालने के कारण वर्तमान वर्ष में इक्विटी बाज़ार का कुल संचयी विदेशी प्रवाह (Cumulative Foreign Flow) ऋणात्मक (-19,531 करोड़ रुपए) ही बना हुआ है। गौरतलब है कि COVID-19 महामारी के कारण इक्विटी बाज़ार में मार्च माह में 61,973 करोड़ रुपए और अप्रैल में 6,884 करोड़ रुपए का बहिर्वाह (Outflow) देखा गया था।

'विदेशी पोर्टफोलियो निवेश' किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा किसी दूसरे देश की कंपनी में किया गया वह निवेश है, जिसके तहत वह संबंधित कंपनी के शेयर या बाॅण्ड खरीदता है अथवा उसे ऋण उपलब्ध कराता है। निवेशक ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ (Foreign Direct Investment- FDI) के विपरीत कंपनी के प्रबंधन (उत्पादन, विपणन आदि) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होता है। निवेशक शेयर के लाभांश या ऋण पर मिलने वाले ब्याज के रूप में लाभ प्राप्त करते हैं। विनियमन ‘भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड’ (Securities and Exchange Board of India-SEBI) द्वारा किया जाता है।
राइट्स इश्यू किसी कंपनी द्वारा पूंजी जुटाने का वह माध्यम है, जिसके तहत वह अपने मौजूदा शेयरधारकों को कंपनी में अतिरिक्त शेयर खरीदने का अधिकार (Right) प्रदान करती है।

सामान्यतः राइट्स इश्यू एक शेयर धारक को कंपनी में उसके मौजूदा शेयर के अनुपात में और बाज़ार की तुलना में कम मूल्य पर जारी किये जाते हैं। मौजूदा शेयरधारकों को कंपनी द्वारा राइट्स इश्यू के तहत दिये गए शेयरों को खरीदने की बाध्यता नहीं होती है। कंपनियों द्वारा ऋण में वृद्धि किये बगैर पूंजी जुटाने के लिये राइट्स इश्यू का प्रयोग किया जाता है।

  • अप्रैल 2020 में COVID-19 के कारण उत्पन्न हुई चुनौतियों को देखते हुए भारत सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों में भारत की थल सीमा (Land Border) से जुड़े पड़ोसी देशों से ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ (Foreign Direct Investment- FDI) के लिये सरकार की अनुमति को अनिवार्य कर दिया है। उद्योग संवर्द्धन और आतंरिक व्यापार विभाग के अनुसार, ऐसे सभी विदेशी निवेश के लिये सरकार की अनुमति की आवश्यकता होगी जिनमें निवेश करने वाली संस्थाएँ या निवेश से लाभ प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले देशों से हो।

हालाँकि इस परिवर्तन के बाद भी अन्य विदेशी संस्थाएँ या नागरिक (इस परिवर्तन के तहत चिन्हित देशों के अतिरिक्त) FDI नियमों के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों/गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में पहले की तरह निवेश कर सकेंगे।

वर्तमान में भारत 7 देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, चीन, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से थल सीमाएँ साझा करता है। वर्तमान संशोधन के बाद पाकिस्तान का कोई नागरिक या संस्थान रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और FDI नियमों के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों/गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में सरकार की अनुमति के बाद ही निवेश कर सकेगा।

विदेशी निवेश पर सख्ती के कारण: केंद्र सरकार द्वारा यह निर्णय COVID-19 के कारण उत्पन्न हुए आर्थिक दबाव के बीच भारतीय कंपनियों के ‘अवसरवादी अधिग्रहण’ (Opportunistic Takeovers/Acquisitions) को रोकने के लिये लिया गया है। हाल ही में हाऊसिंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी लिमिटेड (HDFC Ltd.) ने जानकारी दी थी कि वर्तमान में कंपनी में चीन के केंद्रीय बैंक ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना’ (People’s Bank of China) की हिस्सेदारी बढ़कर 1.1% तक पहुँच गई।

भारत की कंपनियों में चीनी निजी क्षेत्र द्वारा निवेश में वृद्धि भारतीय नियामकों के लिये एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि चीनी सरकार के नियंत्रण की कंपनियों और निजी क्षेत्र में अंतर कर पाना बहुत कठिन है। चीनी निजी क्षेत्र की कई कंपनियाँ चीनी सरकार की योजनाओं और सेंसरशिप (Censorship) जैसे प्रयासों में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। भारत में चीनी निवेश: हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 तक भारतीय कंपनियों में कुछ चीनी निवेश मात्र 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसमें से अधिकांश चीन की सरकारी कंपनियों द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) क्षेत्र में किया गया निवेश था। वर्ष 2017 तक यह निवेश पाँच गुना से अधिक की वृद्धि के साथ 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया और मार्च, 2020 में भारतीय कंपनियों में चीनी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का निवेश बढ़कर 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था। वर्ष 2017 शंघाई की ‘फोसुन’ (Fosun) नामक कंपनी द्वारा हैदराबाद स्थित ‘ग्लैंड फार्मा’ (Gland Farma) में 1.09 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के साथ कंपनी में उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 74% हो गई। पिछले कुछ वर्षों में चीन की निजी क्षेत्र की कंपनियों ने भारत बाज़ार में दूरसंचार, पेट्रोकेमिकल, सॉफ्टवेयर और आईटी (IT) जैसे विभिन्न क्षेत्रों में निवेश में वृद्धि की है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के मोबाइल उद्योग में चीन की पहुँच बढ़ी है और भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की 4 में से 3 कंपनियाँ चीनी उत्पादों पर निर्भर हैं। फरवरी 2020 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कई बड़ी कंपनियों जैसे-अलीबाबा (Alibaba) और टेंसेंट (Tencent) ने कम-से-कम 92 भारतीय स्टार्टअप में निवेश कर रखा है। इनमें से अधिकांश निवेश निजी क्षेत्र द्वारा किये गए छोटे निवेश (अधिकांश लगभग 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर) हैं, जिससे यह निवेश तात्कालिक संदेह से बचे रहते हैं। लाभ: इस परिवर्तन के बाद विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विदेशी निवेश की बेहतर निगरानी की जा सकेगी। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद वर्तमान में COVID-19 से प्रभावित भारतीय कंपनियों में चीनी हस्तक्षेप की वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकेगा। हानि और चुनौतियाँ: ‘व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (United Nations Conference on Trade and Development- UNCTAD) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत विश्व में सबसे अधिक विदेशी निवेश प्राप्त करने वाले शीर्ष के 10 देशों में शामिल था। नियमों में सख्ती के कारण निश्चित ही भारत में होने वाले विदेशी निवेश में कमी आएगी और इसका सबसे अधिक प्रभाव तकनीकी और इंटरनेट से जुड़ी कंपनियों पर होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में निवेश करने वाली बड़ी संख्या उन कंपनियों की भी है जो अमेरिका या हॉन्गकॉन्ग जैसे देशों में पंजीकृत हैं। वेंचर कैपिटल फंड (Venture Capital Fund) और कुछ अन्य निवेशों के मामलों में अंतिम लाभार्थियों की राष्ट्रीयता की पहचान करना एक बड़ी चुनौती होगी।

  • हाल ही में COVID-19 के कारण उत्पन्न हुई चुनौतियों को देखते हुए भारत सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों में भारत की थल सीमा (Land Border) से जुड़े पड़ोसी देशों से ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश’ (Foreign Direct Investment- FDI) के लिये सरकार की अनुमति को अनिवार्य कर दिया है।

उद्योग संवर्द्धन और आतंरिक व्यापार विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, ऐसे सभी विदेशी निवेश के लिये सरकार की अनुमति की आवश्यकता होगी जिनमें निवेश करने वाली संस्थाएँ या निवेश से लाभ प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले देशों से हो। हालाँकि इस परिवर्तन के बाद भी अन्य विदेशी संस्थाएँ या नागरिक (इस परिवर्तन के तहत चिन्हित देशों के अतिरिक्त) FDI नियमों के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों/गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में पहले की तरह निवेश कर सकेंगे। वर्तमान में भारत 7 देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, चीन, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से थल सीमाएँ साझा करता है। इसके अतिरिक्त वर्तमान संशोधन के बाद पाकिस्तान का कोई नागरिक या संस्थान रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और FDI नियमों के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों/गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में सरकार की अनुमति के बाद ही निवेश कर सकेगा। विदेशी निवेश पर सख्ती के कारण: केंद्र सरकार द्वारा यह निर्णय COVID-19 के कारण उत्पन्न हुए आर्थिक दबाव के बीच भारतीय कंपनियों के ‘अवसरवादी अधिग्रहण’ (Opportunistic Takeovers/Acquisitions) को रोकने के लिये लिया गया है। हाल ही में हाऊसिंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी लिमिटेड (HDFC Ltd.) ने जानकारी दी थी कि वर्तमान में कंपनी में चीन के केंद्रीय बैंक ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना’ (People’s Bank of China) की हिस्सेदारी बढ़कर 1.1% तक पहुँच गई।

भारत की कंपनियों में चीनी निजी क्षेत्र द्वारा निवेश में वृद्धि भारतीय नियामकों के लिये एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि चीनी सरकार के नियंत्रण की कंपनियों और निजी क्षेत्र में अंतर कर पाना बहुत कठिन है। चीनी निजी क्षेत्र की कई कंपनियाँ चीनी सरकार की योजनाओं और सेंसरशिप (Censorship) जैसे प्रयासों में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। भारत में चीनी निवेश: हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 तक भारतीय कंपनियों में कुछ चीनी निवेश मात्र 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसमें से अधिकांश चीन की सरकारी कंपनियों द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) क्षेत्र में किया गया निवेश था। वर्ष 2017 तक यह निवेश पाँच गुना से अधिक की वृद्धि के साथ 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया और मार्च, 2020 में भारतीय कंपनियों में चीनी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का निवेश बढ़कर 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था। वर्ष 2017 शंघाई की ‘फोसुन’ (Fosun) नामक कंपनी द्वारा हैदराबाद स्थित ‘ग्लैंड फार्मा’ (Gland Farma) में 1.09 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के साथ कंपनी में उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 74% हो गई। पिछले कुछ वर्षों में चीन की निजी क्षेत्र की कंपनियों ने भारत बाज़ार में दूरसंचार, पेट्रोकेमिकल, सॉफ्टवेयर और आईटी (IT) जैसे विभिन्न क्षेत्रों में निवेश में वृद्धि की है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के मोबाइल उद्योग में चीन की पहुँच बढ़ी है और भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की 4 में से 3 कंपनियाँ चीनी उत्पादों पर निर्भर हैं। फरवरी 2020 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कई बड़ी कंपनियों जैसे-अलीबाबा (Alibaba) और टेंसेंट (Tencent) ने कम-से-कम 92 भारतीय स्टार्टअप में निवेश कर रखा है। इनमें से अधिकांश निवेश निजी क्षेत्र द्वारा किये गए छोटे निवेश (अधिकांश लगभग 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर) हैं, जिससे यह निवेश तात्कालिक संदेह से बचे रहते हैं। लाभ: इस परिवर्तन के बाद विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विदेशी निवेश की बेहतर निगरानी की जा सकेगी। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद वर्तमान में COVID-19 से प्रभावित भारतीय कंपनियों में चीनी हस्तक्षेप की वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकेगा। हानि और चुनौतियाँ: ‘व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (United Nations Conference on Trade and Development- UNCTAD) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत विश्व में सबसे अधिक विदेशी निवेश प्राप्त करने वाले शीर्ष के 10 देशों में शामिल था। नियमों में सख्ती के कारण निश्चित ही भारत में होने वाले विदेशी निवेश में कमी आएगी और इसका सबसे अधिक प्रभाव तकनीकी और इंटरनेट से जुड़ी कंपनियों पर होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में निवेश करने वाली बड़ी संख्या उन कंपनियों की भी है जो अमेरिका या हॉन्गकॉन्ग जैसे देशों में पंजीकृत हैं। वेंचर कैपिटल फंड (Venture Capital Fund) और कुछ अन्य निवेशों के मामलों में अंतिम लाभार्थियों की राष्ट्रीयता की पहचान करना एक बड़ी चुनौती होगी।

अन्य राजकोषीय तथ्य

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  • द ग्रेट डिप्रेशन(The Great Depression)
     
    1929 की महामंदी के दौरान प्रतिव्यक्ति आय

COVID-19 महामारी के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हो रही वैश्विक अर्थव्यवस्था की तुलना ‘महामंदी’(वर्ष 1929-वर्ष 1939 तक) (The Great Depression) से की जा रही है।

24 अक्टूबर 1929 से प्रारंभ इस महामंदी के इस दिन को विश्व इतिहास में ‘ब्लैक गुरुवार’ (Black Thursday) के रूप में जाना जाता है जब न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में स्टॉक की कीमतों में 25% तक की गिरावट दर्ज की गईं।

स्टॉक की कीमतों में गिरावट के मुख्य कारणों में सकल मांग में कमी, गलत मौद्रिक नीतियाँ एवं इन्वेंट्री स्तरों में एक अनपेक्षित वृद्धि थी। प्रभाव:-संयुक्त राज्य अमेरिका में उत्पादों की कीमतों एवं वास्तविक उत्पादन में गिरावट आई। औद्योगिक उत्पादन 47%,थोक मूल्य सूचकांक 33% तथा वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में 30% तक की गिरावट दर्ज की गई। गोल्ड मानकों (Gold Standard) जो निश्चित विनिमय दरों द्वारा विश्व की अधिकांश मुद्राओं से संबंधित हैं, के कारण अमेरिका से शुरू इस मंदी का प्रभाव विश्व के अन्य देशों में भी फैल गया। इसके कारण विश्व के अधिकतर देशों में लोगों के सामने रोज़गार का संकट तथा अपस्फीति (Deflation) एवं उत्पादन का संकुचन हुआ। वर्ष 1929 से वर्ष 1933 के बीच अमेरिका में बेरोज़गारी दर 3.2% से बढ़कर 24.9% हो गई। वहीं ब्रिटेन में 7.2% से बढ़कर 15.4% हो गई। यूरोप में फासीवाद के उदय का प्रमुख कारण इस महामंदी के कारण उत्पन्न आर्थिक ठहराव को माना जाता है जिसके परिणामस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध हुआ। इस महामंदी का वैश्विक स्तर के वित्तीय संस्थानों एवं नीति निर्धारकों पर गहरा प्रभाव पड़ा परिणामतः गोल्ड मानकों को समाप्त कर दिया गया।

भारत पर प्रभाव:-वैश्विक आर्थिक संकट के कारण कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई जो भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी और औपनिवेशिक नीति निर्माताओं द्वारा रुपये का अवमूल्यन न करने से एक गंभीर क्रेडिट संकुचन की स्थिति उत्पन्न हो गई।

वर्ष 1930 में भारत में फसल कटाई के दौरान इस महामंदी के प्रभाव दिखाई देने लगे जिसके तुरंत बाद महात्मा गांधी ने वर्ष 1930 के अप्रैल महीने में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था। देश के कई हिस्सों में ‘नो रेंट’ (No Rent) अभियान शुरू किये गए और बिहार एवं पूर्वी यूपी में किसान सभाएँ शुरू हुईं। कृषि क्षेत्र में उत्पन्न इस अशांति ने कांग्रेस को ग्रामीण भारत में एक मज़बूत समर्थन का आधार प्रदान किया जिसकी पहुँच अभी तक ग्रामीण भारत में नहीं थी।

  • राउंड ट्रिपिंग(Round Tripping)-04 अप्रैल 2020 को उच्चतम न्यायालय ने प्रमुख समाचार प्रसारण कंपनी ‘नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड’(New Delhi Television Limited- NDTV) के खिलाफ राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस को रद्द कर दिया।

आयकर विभाग ने NDTV पर जुलाई 2007 में अपने यू.के. की सहायक कंपनी एनएनपीएलसी (NNPLC) के माध्यम से $100 मिलियन की राशि के स्टेप-अप कूपन बॉन्ड जारी करने के संबंध में ‘राउंड ट्रिपिंग’ (Round Tripping) का आरोप लगाया था।

राउंड ट्रिपिंग से अभिप्राय उस धन से है जो विभिन्न चैनलों के माध्यम से देश के बाहर जाता है और फिर यही धन विदेशी निवेश के रूप में देश में वापस आता है। इसमें ज्यादातर काला धन शामिल है और इसका इस्तेमाल अक्सर स्टॉक प्राइस में हेर-फेर करने के लिये किया जाता है।

राउंड ट्रिपिंग अक्सर लेन-देन की एक श्रृंखला के माध्यम से की जाती है इसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं होता है जो इसे गार (General Anti-Avoidance Rules-GAAR) के दायरे में लाता हो। यह धन ऑफशोर निधियों में निवेश किया जा सकता है जिसे बदले में भारतीय परिसंपत्तियों में निवेश किया जाता हैं। वहीं ग्लोबल डिपॉज़िटरी रिसिप्ट्स (GDR) एवं पार्टिसिपेटरी नोट्स (P- Notes) जैसे कुछ अन्य मार्ग हैं जिनका उपयोग अतीत में किया गया है।

ग्लोबल डिपॉज़िटरी रिसिप्ट्स मध्यस्थों जैसे विदेशी कंपनियों में निवेश की सुविधा के लिये बैंक द्वारा जारी किये गए प्रतिभूति प्रमाणपत्र (Securities Certificates) हैं। एक GDR किसी विदेशी कंपनी के कुछ निश्चित शेयरों का प्रतिनिधित्त्व करता है जिनकी ट्रेडिंग स्थानीय स्टॉक एक्सचेंज में नहीं की जाती है।

पार्टिसिपेटरी नोट्स (P- Notes):-पी-नोट्स या ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स (ODIs) पंजीकृत एफ.पी.आई. (FPIs) द्वारा विदेशी निवेशकों, हेज फंड और विदेशी संस्थानों को जारी किये जाते हैं,जो सेबी में पंजीकृत हुए बिना भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश करना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशों में दी जाने वाली कर रियायतों के कारण राउंड ट्रिपिंग को बढ़ावा मिलता है।

मैक्किंज़े ग्लोबल इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती ऊष्मा (Heat) से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी।

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  • बढ़ती ऊष्मा और श्रमबल पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया गया है।
  • रिपोर्ट में अगले तीन दशकों में जलवायु परिवर्तन के भौतिक जोखिमों और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण एक सामान्य व्यावसायिक परिदृश्य में किया गया है।
  • अगले तीन दशकों में अत्यधिक ऊष्मा के कारण भारत के श्रमबल की कार्यक्षमता में काफी कमी आएगी तथा भारत की लगभग 75% श्रम शक्ति (लगभग 380 मिलियन लोग) ऊष्मा संबंधी तनाव से प्रभावित होगी।
  • वर्ष 2030 तक दिन के कार्य घंटों में कमी होने से सकल घरेलू उत्पादन (GDP) में सालाना 2.5%-4.5% तक नुकसान हो सकता है।
  • यदि प्रमुख अनुकूलन और शमन उपायों को नहीं अपनाया गया तो भारत का एक बड़ा हिस्सा बहुत गर्म हो जाएगा जहाँ जीवित रहना और खुले में काम करना मुश्किल होगा।
  • बढ़ती ऊष्मा और आर्द्रता का स्तर वर्ष 2030 तक 160 मिलियन से 200 मिलियन भारतीयों को भीषण गर्म-लहरों से प्रभावित कर सकता है।
  • 100% आर्द्रता और तापमान 35°C के ऊपर होने पर मानव शरीर, पसीना आने तथा ठंडा होने की अपनी प्राकृतिक क्षमता को खो देता है। 35°C तापमान से अधिक के ‘आर्द्र बल्ब’ के तापमान पर हम कुछ घंटे ही खुले में रह सकते हैं।
  • वैश्विक स्तर पर वर्ष 2050 तक सिर्फ 700 मिलियन से 1.2 बिलियन लोग‘घातक उष्म-धाराएँ’ जैसे गैर-शून्य संभावना क्षेत्र(Non-Zero Chance Zone) में रह रहे होंगे।
  • उच्च तापमान और ‘घातक उष्म-धाराएँ’ श्रम शक्ति की बाह्य कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करेंगी।
  • अनुमान बताते हैं कि अत्यधिक ऊष्मा के कारण कार्यशील घंटों की संख्या में होने वाली कमी वर्ष 2050 तक वर्तमान के 10% से बढ़कर 15-20% हो जाएगी तथा इससे आर्थिक विकास बुरी तरह प्रभावित होगा।
  • कई अध्ययनों से पता चला है कि विकासशील गरीब देश जिनका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद कम है वे अपनी भौतिक थ्रेसहोल्ड सीमा (वह न्यूनतम स्तर जिस पर परिसंपत्ति का प्रदर्शन और स्थिति स्वीकार्य है) के करीब हैं तथा आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित होंगे।

अन्य प्रभाव:

  1. ग्लोबल वार्मिंग और महासागर:-बढ़ते सागरीय तापमान के कारण कम होती मत्स्य संख्या इस उद्योग से जुड़े 650-800 मिलियन लोगों की आजीविका को प्रभावित करेगी।

दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन से शीतोष्ण कटिबंधीय विकसित देशों के आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। यथा उत्तरी यूरोप और कनाडा के कृषि,पर्यटन जैसे क्षेत्रों को बढ़ते तापमान से कुछ फायदा हो सकता है।

  1. टिपिंग पॉइंट्स (Tipping Points) प्रभाव:-परिवर्तन की एक सीमा को पार करने के बाद जलवायु के गैर-रेखीय प्रभाव उत्पन्न होते है इस सीमा को ’टिपिंग पॉइंट्स’ कहते है। टिपिंग पॉइंट्स के बाद छोटे-छोटे परिवर्तन या घटनाएँ एक बड़े तथा अधिक परिवर्तन का कारण बन जाती हैं। अत्यधिक ऊष्मा के उपर्युक्त प्रभावों के अलावा सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र पर ’टिपिंग पॉइंट्स’ प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण के लिये वियतनाम में हो ची मिन्ह सिटी मानसून व तूफान के कारण बाढ़ से प्रभावित है जहाँ अनुकूलन के बिना 100 वर्षों की बाढ़ से बुनियादी ढाँचे को होने वाला प्रत्यक्ष नुकसान 2050 तक 1 बिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है।

  1. खाद्य उत्पादन पर प्रभाव:-यह वैश्विक उष्णता के ‘टिपिंग प्रभाव’ से प्रभावित होने वाला अन्य क्षेत्र है। यहाँ कृषि पद्धतियों को विशिष्ट मौसम और जलवायु परिस्थितियों के अनुसार विकसित तथा अनुकूलित किया गया है। अतः इन सामान्य परिस्थितियों में कोई भी बदलाव,उत्पादकता को उच्च जोखिम में डालता है।

वैश्विक अनाज उत्पादन का लगभग 60% केवल पाँच ‘अनाज की टोकरी’ (Breadbasket) क्षेत्रों में होता है। ‘अनाज की टोकरी’ एक ऐसे क्षेत्र को कहते हैं जो मिट्टी और लाभप्रद जलवायु के कारण बड़ी मात्रा में गेहूँ या अन्य अनाज पैदा करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण इन क्षेत्रों को हुए किसी भी प्रकार के नुकसान का वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। आगे की राह: रिपोर्ट में सरकारों और व्यापार जगत से आग्रह किया गया है कि वे जलवायु परिवर्तन के जोखिम को कम करने के लिये सही उपकरणों और विश्लेषण क्षमता को आगे बढ़ाएँ। जलवायु जोखिम को संबोधित करने के लिये उचित शासन व्यवस्था एवं कम कार्बन वाली तकनीकों पर काम करें।

भारतीय अर्थव्यवस्था को मिज़री इंडेक्स (Misery Index) के आधार पर मापने की मांग

सम्पादन

(फरवरी 2020)।

  • अर्थशास्त्री आर्थर ओकुन द्वारा विकसित यह इंडेक्स 1970 के शुरुआती दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक स्थिति को मापने के कारण लोकप्रिय हुआ।
  • यह इंडेक्स किसी देश में मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी की दर को जोड़कर निकाला जाता है।
  • इस सूचकांक का स्कोर जितना अधिक होगा देश के नागरिकों की स्थिति उतनी ही दयनीय होगी।
  • हाल के दिनों में इस सूचकांक में व्यापक रूप से अन्य आर्थिक संकेतकों जैसे बैंक ऋण दरों को शामिल किया गया है।
  • पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति को मापने के लिये मिज़री इंडेक्स लोकप्रिय हो रहा है।
  • मूल मिज़री इंडेक्स का एक रूप ब्लूमबर्ग मिज़री इंडेक्स (Bloomberg Misery Index) है जिसे ऑनलाइन पब्लिकेशन (Online Publication) द्वारा विकसित किया गया है।