समसामयिकी 2020/राजव्यवस्था एवं संविधान

जुलाई 2020 को केंद्र सरकार ने अटॉर्नी जनरल (Attorney General-AG) के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता के. के. वेणुगोपाल (K.K. Venugopal) के कार्यकाल को एक वर्ष के लिये बढ़ा दिया है। 30 जून, 2017 को के.के. वेणुगोपाल को 3 वर्ष के कार्यकाल के लिये भारत का 15वाँ अटॉर्नी जनरल (AG) नियुक्त किया गया था, उनका पहला कार्यकाल बीते दिनों 30 जून, 2020 को समाप्त हो गया था। 14वें अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी थे। के. के. वेणुगोपाल के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (Solicitor-General) तुषार मेहता के कार्यकाल का भी तीन वर्ष के लिये विस्तार किया गया है।

अनुच्छेद 76 के अनुसार, भारत का अटॉर्नी जनरल (AG) भारत का सबसे बड़ा कानून अधिकारी होता है।

भारत सरकार के मुख्य कानून सलाहकार होने के नाते अटॉर्नी जनरल सभी कानूनी मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देने का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त भारत का अटॉर्नी जनरल सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्त्व भी करता है।


मूल रूप से भारतीय संविधान में कुल 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभाजित) और 8 अनुसूचियाँ थी, किंतु विभिन्न संशोधनों के परिणामस्वरूप वर्तमान में इसमें कुल 470 अनुच्छेद (25 भागों में विभाजित) और 12 अनुसूचियां हैं।

अधिकार संबंधित मुद्दे सम्पादन

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ (World Press Freedom Index) 2020 में भारत 142वें स्थान पर सम्पादन

वर्ष 2019 में भारत इस सूचकांक में 140वें स्थान पर था। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders) नामक गैर-सरकारी संगठन द्वारा जारी किये जाने वाला यह सूचकांक विश्व के कुल 180 देशों और क्षेत्रों में मीडिया और प्रेस की स्वतंत्रता को दर्शाता है। ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2020’ में पहले स्थान पर नॉर्वे (Norway) है, जो कि वर्ष 2019 में भी पहले स्थान पर था। इसके अतिरिक्त दूसरा स्थान फिनलैंड (Finland) को और तीसरा स्थान डेनमार्क (Denmark) को प्राप्त हुआ है। इस सूचकांक में 180वें स्थान पर उत्तर कोरिया (North Korea) है, जो कि बीते वर्ष 179वें स्थान पर था। भारत के पड़ोसी देशों में भूटान (Bhutan) को 67वाँ स्थान, म्याँमार (Myanmar) को 139वाँ स्थान, पाकिस्तान (Pakistan) को 145वाँ स्थान, नेपाल (Nepal) को 112वाँ स्थान, अफगानिस्तान (Afghanistan) को 122वाँ स्थान, बांग्लादेश (Bangladesh) को 151 वाँ स्थान और चीन (China) को 177वाँ स्थान प्राप्त हुआ है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक प्रत्येक वर्ष रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी किया जाता है। वर्ष 2002 में इसका प्रथम संस्करण प्रकाशित किया गया था।

इस सूचकांक में पत्रकारों के लिये उपलब्ध स्वतंत्रता के स्तर के आधार पर 180 देशों की रैंकिंग की जाती है। यह सूचकांक बहुलतावाद के मूल्यांकन, मीडिया की स्वतंत्रता, विधायी ढाँचे की गुणवत्ता और प्रत्येक देश तथा क्षेत्र में पत्रकारों की सुरक्षा पर आधारित मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति का एक सरल विवरण प्रस्तुत करता है। भारतीय परिदृश्य:-RSF द्वारा एकत्रित आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत में किसी भी पत्रकार की मृत्यु नहीं हुई, जबकि वर्ष 2018 में देश में कुल 6 पत्रकारों की मृत्यु हुई है। हालाँकि इसके बावजूद देश में अभी भी लगातार मीडिया की स्वतंत्रता का उल्लंघन हो रहा है, जिसमें पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस हिंसा और आपराधिक समूहों या भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों द्वारा उकसाए गए विद्रोह शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जो लोग एक विशेष विचारधारा का समर्थन करते हैं वे अब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे सभी विचारों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनके विचार से मेल नहीं खाती हैं। इसके अतिरिक्त देश में उन सभी पत्रकारों के विरुद्ध एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जो सरकार और राष्ट्र के बीच के अंतर को समझते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं। महिला पत्रकार की स्थिति में इस प्रकार के अभियान और अधिक गंभीर हो जाते हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि भारत में आपराधिक धाराओं को उन लोगों खासकर पत्रकारों के विरुद्ध प्रयोग किया जा रहा है, जो अधिकारियों की आचोलना कर रहे हैं। उदाहरण के लिये बीते दिनों देश में पत्रकारों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (राजद्रोह) के प्रयोग के कई मामले सामने आए हैं। मीडिया की स्वतंत्रता: क्यों आवश्यक? प्रेस या मीडिया, सरकार और आम नागरिकों के मध्य संचार के माध्यम के रूप में कार्य करता है। मीडिया नागरिकों को सार्वजनिक विषयों के संदर्भ में सूचित करता और सभी स्तरों पर सरकार के कार्यों की निगरानी करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। ध्यातव्य है कि किसी भी लोकतंत्र में सूचना की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार होता है, किंतु आँकड़े दर्शाते हैं कि दुनिया की लगभग आधी आबादी की स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट की गई सूचना और समाचार तक कोई पहुँच नहीं है। कई बार ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं कि हम पत्रकारों की स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं की जाएगी तो नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों से लड़ना, नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करना और पर्यावरण जैसे विभिन्न मुद्दों को संबोधित करना किस प्रकार संभव हो सकेगा। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के अनुसार, वर्ष 2020 में वैश्विक स्तर पर अब तक कुल 10 पत्रकारों की हत्या कर दी गई है और 228 पत्रकारों को कैद कर लिया गया है। वहीं इस वर्ष अब तक 116 नागरिक पत्रकारों को भी कैद कर लिया गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी संगठन है, जो सार्वजनिक हित में संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, यूरोपीय परिषद, फ्रैंकोफोनी के अंतर्राष्ट्रीय संगठन और मानव अधिकारों पर अफ्रीकी आयोग के साथ सलाहकार की भूमिका निभाता है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स को रिपोर्टर्स संस फ्रंटियर (Reporters Sans Frontières-RSF) के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्यालय पेरिस में है।

निजता का अधिकार सम्पादन

COVID-19 के संदिग्धों की निजी जानकारी न केवल सोशल मीडिया पर पाई गई बल्कि कुछ राज्य सरकारों ने भी आधिकारिक रूप से डेटा का खुलासा किया है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य,डॉक्टर-मरीज की गोपनीयता और निजता के अधिकार का हनन हो सकता है। किसी राष्ट्रीय प्रोटोकॉल या कानून की अनुपस्थिति के कारण राज्य सरकारें COVID-19 से उत्पन्न समस्याओं से निपटने हेतु अलग-अलग उपाय अपना रही हैं।

  • कर्नाटक सरकार ने ऐसे लोगों की एक ज़िलेवार सूची प्रकाशित की है जिनको एकांत में रखा गया है। स्वास्थ्य और परिवार नियोजन विभाग की वेबसाइट पर एकांत में रखे गए लोगों का यात्रा विवरण और घर का पता मौजूद है।
  • दिल्ली,गुजरात और कर्नाटक सहित कई अन्य राज्यों ने स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिया है कि उन घरों के बाहर नोटिस चस्पा करे जहाँ व्यक्तियों को एकांत में रखा गया है।
  • हालाँकि, पश्चिम बंगाल सरकार ने व्यक्तियों या अस्पतालों की पहचान का खुलासा नहीं किया है।

कानूनी परिप्रेक्ष्य: चिकित्सा आचार संहिता के तहत,भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा निर्धारित नियम के अनुसार,उपचार के दौरान किसी विशेष परिस्थिति में रोगी से संबंधित जानकारी का खुलासा कर सकते हैं। निगरानी के लिये स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों के अनुसार एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (Integrated Disease Surveillance Programme) के तहत राज्य/ज़िला स्तर की निगरानी इकाइयों या किसी अन्य प्राधिकरण के साथ लोगों की निजी जानकारी साझा कर सकते है लेकिन इन दिशा-निर्देशों में रोगी के विवरण को सार्वजनिक रूप से साझा करने का कोई प्रावधान नहीं है। महामारी अधिनियम, 1897 (Epidemic Act, 1897) और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के तहत किसी विकट समस्या से निपटने हेतु लोगों की भलाई के लिये की गयी कार्रवाई को कानूनी शक्ति प्रदत्त है लेकिन लोगों की निजी जानकारी को सार्वजनिक रूप से साझा करने का कोई कानून नही है।

  • भारत सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में सूचना के अधिकार के तहत दायर एक याचिका के जवाब में कहा है कि भारत के समुद्रपारीय नागरिकों (Overseas Citizen of India- OCI) को मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

सरकार की यह प्रतिक्रिया रैनबैक्सी के पूर्व कार्यकारी अधिकारी द्वारा सूचना के अधिकार (Right To Information- RTI) के तहत दायर याचिका के संदर्भ में आई है। क्या है याचिका? याचिकाकर्त्ता ने संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में विदेशी नागरिकों के लिये विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 (Foreign Contribution Regulation Act- FCRA) के तहत धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं को दान करने की अनुमति लेने से छूट मांगी थी। केंद्र सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा है कि OCI कार्ड-धारकों को नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 7B के अंतर्गत प्रदत्त अधिकार केवल वैधानिक अधिकार हैं न कि संवैधानिक या मौलिक। केंद्र सरकार ने यह जवाब OCI कार्ड-धारक को भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार के संबंध में नहीं दिया है, हालाँकि सरकार ने यह कहा है कि उन्हें कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। ध्यातव्य है कि सरकार का यह रुख वर्ष 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा OCI कार्ड-धारकों के संदर्भ में दिये गए उस निर्णय, जिसमें उच्च न्यायालय ने कहा था कि OCI कार्ड-धारकों को भी भारतीय नागरिकों की भाँति समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, के बावजूद है। इस संदर्भ में पूर्व के घटनाक्रम वर्ष 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने डॉ. क्रिस्टो थॉमस फिलिप बनाम भारत संघ एवं अन्य (Dr. Christo Thomas Philip vs Union Of India & Others) मामले में डॉ. क्रिस्टो थॉमस फिलिप के OCI कार्ड को बहाल करते हुए कहा था कि एक विदेशी नागरिक को भी संविधान के तहत व्यक्तियों को दिये गए मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। ध्यातव्य है कि भारत में मिशनरी गतिविधियों में शामिल होने के कारण डॉ. फिलिप के OCI कार्ड को सरकार ने रद्द कर दिया था।

25 जनवरी, 2020 को 10वाँ राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters’ Day-NVD) देश भर में मनाया गया। सम्पादन

10वाँ राष्ट्रीय मतदाता दिवस की थीम ‘मज़बूत लोकतंत्र के लिये चुनावी साक्षरता’ (Electoral Literacy for Stronger Democracy) है। निर्वाचन आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय समारोह में भारत के राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद मुख्य अतिथि थे। यह वर्ष भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है क्योंकि इस वर्ष भारत के चुनाव आयोग ने अपनी 70 साल की यात्रा पूरी की है। इस अवसर पर भारत निर्वाचन आयोग ने बैलट-2 में विश्वास (Belief in the Ballot-2) नामक पत्रिका लाॅन्च की। इस पत्रिका में भारतीय चुनावों के बारे में देश भर की 101 मानव कथाएँ संकलित हैं। इसकी पहली प्रति चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रपति को भेंट की गई। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा 'द सेंटेनरियन वोटर: सेंटिनल्स ऑफ डेमोक्रेसी' (The Centenarian Voters: Sentinels of Democracy) नामक एक पुस्तिका का विमोचन भी किया गया जिसमें देश भर के उन दिग्गज मतदाताओं की 51 कहानियाँ हैं जिन्होंने दुर्गम इलाकों, खराब स्वास्थ्य और अन्य चुनौतियों के बावजूद मतदान किया। शुरुआत भारत निर्वाचन आयोग का गठन 25 जनवरी, 1950 को हुआ था। भारत सरकार ने राजनीतिक प्रक्रिया में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये निर्वाचन आयोग के स्थापना दिवस पर '25 जनवरी' को वर्ष 2011 से 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' के रूप में मनाने की शुरुआत की थी।

संघ एवं इसका क्षेत्र सम्पादन

1 मई, 2020 को भारतीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने गुजरात और महाराष्ट्र के लोगों को उनके राज्य दिवस (1 मई) पर बधाई दी। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (The States Reorganisation Act, 1956) के तहत भाषाई आधार पर भारत संघ के भीतर राज्यों के लिये सीमाओं को परिभाषित किया गया था। परिणामस्वरूप 1 नवंबर, 1956 को 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेशों का गठन किया गया। इस अधिनियम के तहत बॉम्बे राज्य का गठन मराठी, गुजराती, कच्छी (Kutchi) एवं कोंकणी भाषी लोगों के लिये किया गया था। वर्ष 1956 में व्यापक स्तर पर राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद भाषा या सांस्कृतिक एकरूपता एवं अन्य कारणों के आधार पर दूसरे राज्यों से अन्य राज्यों के निर्माण की मांग उठी। महागुजरात सम्मेलन (Mahagujarat Conference): वर्ष 1937 में, कराची में हुई ‘गुजरात साहित्य सभा’ की एक बैठक के दौरान लेखक एवं स्वतंत्रता सेनानी कन्हैया लाल मुंशी द्वारा ‘महागुजरात की अवधारणा’ का सुझाव दिया गया था। वर्ष 1947 में आज़ादी मिलने के बाद वर्ष 1948 में एक प्रशासनिक निकाय के तहत संपूर्ण गुजराती भाषा बोलने वाली आबादी को एकीकृत करने के लिये एक ‘महागुजरात सम्मेलन’ (Mahagujarat Conference) हुआ। संयुक्त महाराष्ट्र समिति (Sanyukta Maharashtra Samiti):

संयुक्त महाराष्ट्र समिति चाहती थी कि बॉम्बे राज्य को दो राज्यों (एक राज्य गुजराती एवं कच्छी भाषी लोगों के लिये और दूसरा राज्य मराठी एवं कोंकणी भाषी लोगों के लिये) में विभाजित किया जाए। वर्ष 1960 तक महाराष्ट्र और गुजरात बॉम्बे प्रांत का हिस्सा थे। वर्ष 1960 में बंबई पुनर्गठन अधिनियम,1960 द्वारा द्विभाषी राज्य बंबई को दो पृथक राज्यों (महाराष्ट्र मराठी भाषी लोगों के लिये और गुजरात, गुजराती भाषी लोगों के लिये) में विभक्त किया गया। 1 मई, 1960 को महाराष्ट्र और गुजरात राज्य दो स्वतंत्र राज्यों के रूप में अस्तित्त्व में आए। भारतीय संविधान के तहत ‘गुजरात’ भारतीय संघ का 15वाँ राज्य बना।

21 जनवरी को मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा राज्य का राज्य दिवस सम्पादन

21 जनवरी, 1972 को ये तीनों राज्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र अधिनियम (पुनर्गठन), 1971 के तहत पूर्ण राज्य बने। अधिकांश राज्यों के शासकों ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसन’ नामक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किये जिसका मतलब था कि उन राज्यों ने भारतीय संघ का हिस्सा बनने के लिये अपनी सहमति दे दी है। भारत में मणिपुर का विलय भारत की आज़ादी से कुछ दिन पहले मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने मणिपुर की आंतरिक स्वायत्तता को बनाए रखने के आश्वासन पर भारत सरकार के साथ ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसन’ पर हस्ताक्षर किये। जून 1948 में जनमत के दबाव में आकर महाराजा बोधचंद्र सिंह ने मणिपुर में चुनाव कराए और मणिपुर राज्य को संवैधानिक राजतंत्र में बदल दिया गया। इस प्रकार मणिपुर सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने वाला भारत का पहला भाग था। सितंबर 1949 में भारत सरकार ने मणिपुर की विधानसभा से परामर्श किये बिना महाराजा से एक विलय समझौते पर हस्ताक्षर करवाने में सफलता प्राप्त की। भारत में त्रिपुरा का विलय 15 नवंबर, 1949 को भारतीय संघ में विलय होने से पहले त्रिपुरा एक रियासत थी। त्रिपुरा रियासत के अंतिम राजा बीर बिक्रम का भारत की आज़ादी से ठीक पहले 17 मई, 1947 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके नाबालिग बेटे किर्री बिक्रम मान्निक्य (Kirri Bikram Mannikya) ने त्रिपुरा रियासत की गद्दी संभाली किंतु वह नाबालिग होने के कारण शासन नहीं कर सका, इसलिये उनकी विधवा रानी कंचन प्रभा ने त्रिपुरा के राज-प्रतिनिधि का पद संभाला। रानी कंचन प्रभा ने त्रिपुरा रियासत के भारतीय संघ के साथ विलय में अहम भूमिका निभाई। भारत में मेघालय का विलय वर्ष 1947 में गारो एवं खासी क्षेत्र के शासकों ने भारतीय संघ में प्रवेश किया। मेघालय, भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक छोटा पहाड़ी राज्य है जो 2 अप्रैल, 1970 को असम राज्य के भीतर एक स्वायत्त राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। मेघालय राज्य में संयुक्त रुप से खासी एवं जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स ज़िले शामिल थे। वर्ष 1972 में व्यापक बदलाव: वर्ष 1972 में पूर्वोत्तर भारत के राजनीतिक मानचित्र में व्यापक परिवर्तन आया। इस तरह दो केंद्रशासित प्रदेश मणिपुर और त्रिपुरा एवं उपराज्य मेघालय को राज्य का दर्जा मिला।

केंद्र सरकार ने राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य कानूनों का अनुकूलन) आदेश, 2020 की धारा 3A के तहत राज्य के अधिवासियों को पुन: परिभाषित किया है। अधिसूचना के अनुसार, जो व्यक्ति जम्मू कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में पंद्रह वर्ष की अवधि से रह रहा है या सात वर्ष तक वहाँ अध्ययन किया है और जम्मू-कश्मीर स्थित शैक्षणिक संस्थान में 10वीं तथा 12वीं कक्षा की परीक्षा में शामिल हुआ हो, नवीन अधिवास की परिभाषा में शामिल होगा। इसके माध्यम से केंद्र ने जम्मू-कश्मीर नागरिक सेवाओं (विशेष प्रावधानों) अधिनियम को निरस्त कर दिया है।

संविधान का अनुच्छेद 35A (अब निरस्त) जम्मू-कश्मीर विधानसभा को जम्मू-कश्मीर के अधिवासियों को परिभाषित करने का अधिकार देता है,तथा ऐसे निवासी ही वहाँ नौकरियों तथा अचल संपत्ति के लिये आवेदन करने के लिए पात्र थे।

नवीन अधिसूचना के लाभार्थी:-अखिल भारतीय सेवा,सार्वजनिक उपक्रमों,केंद्र सरकार के स्वायत्त निकाय,सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक,वैधानिक निकायों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों तथा मान्यता प्राप्त अनुसंधान संस्थानों के ऐसे अधिकारी जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में दस वर्ष सेवा प्रदान की है, उनके बच्चों को अधिवास की परिभाषा में शामिल करना हैं। इसके अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर के राहत और पुनर्वास आयुक्त (प्रवासियों) के तहत प्रवासी के रूप में पंजीकृत व्यक्तियों को भी नवीन परिभाषा में शामिल किया जाएगा। इसमें जम्मू और कश्मीर(J&K) में निवास करने वाले ऐसे लोग जिनके बच्चें रोज़गार,व्यवसाय,अन्य कोई पेशा या आजीविका कारणों से जम्मू और कश्मीर के बाहर रहते हैं लेकिन उनके माता-पिता उपर्युक्त शर्तों को पूरा करते हैं, शामिल होंगे।

अधिनियम के प्रावधान तहसीलदार को अधिवास प्रमाण-पत्र जारी करने के लिये सक्षम प्राधिकारी के रूप में प्राधिकृत करते हैं।
अब तक पूर्ववर्ती J&K राज्य के 29 कानूनों को निरस्त कर दिया गया है जबकि 109 में संशोधन किया गया है।

निष्कर्ष:-यह आदेश राज्य से बाहर रह रहे विशिष्ट लोगों को राज्य में नौकरी तथा अचल संपत्ति अधिग्रहण का अधिकार देता है, अत: यह आदेश राज्य को वास्तविक अर्थों में भारत के साथ एकीकृत करने की दिशा में अच्छा प्रयास है।

राष्ट्रपति द्वारा ‘कराधान और अन्य कानून (विभिन्न प्रावधानों में राहत)अध्यादेश 2020’ [Taxation and Other Laws (Relaxation of Certain Provisions) Ordinance,2020] प्रख्यापित सम्पादन

यह अध्यादेश COVID-19 महामारी के मद्देनज़र 24 मार्च,2020 को घोषित विभिन्न कर अनुपालन संबंधी उपायों को प्रभावी बनाता है। इस अध्यादेश में कराधान और बेनामी अधिनियमों के तहत विभिन्न समय सीमाएँ बढ़ाने के प्रावधान किये गए हैं। अध्यादेश में उन नियमों या अधिसूचना में निहित समय सीमाएं बढ़ाने के भी प्रावधान किये गए हैं जो इन अधिनियमों के तहत निर्दिष्‍ट/जारी किये जाते हैं। इस अध्यादेश के जरिये बढ़ाई गई समय सीमाएँ और कुछ महत्त्वपूर्ण राहत उपाय निम्नलिखित हैं:-

  • सरकार ने आयकर फाइल करने,राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र,सार्वजनिक भविष्य निधि जैसे आयकर लाभ का दावा करने वाले उपकरणों में निवेश आदि करने की अंतिम तिथि बढ़ा दी है।
  • आधार कार्ड और पैन कार्ड (PAN Card) को आपस में जोड़ने की अंतिम तिथि बढ़ाकर 30 जून 2020 कर दी गई है।
  • अध्यादेश के तहत आयकर अधिनियम के प्रावधानों में भी संशोधन किया गया है, ताकि ‘पीएम केयर्स फंड’ (PM-CARES Fund) के लिए भी ठीक वही कर राहत मिल सके जो ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ के लिए उपलब्ध है।
  1. अत: पीएम केयर्स फंड (PM-CARES Fund) में किया गया दान आयकर अधिनियम की धारा 80जी (Section 80G of the IT Act) के तहत 100% कटौती का पात्र होगा।
  2. इसके अलावा, सकल आय के 10% की कटौती की सीमा भी पीएम केयर्स फंड में किये गए दान पर लागू नहीं होगी।

संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति के पास संसद के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

आंध्र प्रदेश मंत्रिमंडल द्वारा अमरावती को विधायी,विशाखापत्तनम कार्यकारी और कर्नूल को न्यायिक राजधानी के रूप में स्थापित करने का निर्णय सम्पादन

  • दक्षिण अफ्रीका मॉडल पर राज्य की तीन विकेंद्रीकृत राजधानियाँ का यह निर्णय रिटायर्ड IAS जी. एन. राव की अध्यक्षता में बनी समिति के सुझावों के आधार पर लिया गया।
  • समिति के अध्यक्ष जी. एन. राव ने कहा कि राजधानी का विकेंद्रीकरण करना राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में संतुलन बनाए रखने में सहायक होगा।
  • राज्य के आंचलिक क्षेत्रों तक सरकार की पहुँच बढ़ेगी।

अंगूठाकार

  • दक्षिण अफ्रीका की राजधानी आधिकारिक रूप से तीन शहरों में विभाजित है-
  1. विधायिका- केपटाउन
  2. कार्यपालिका - प्रिटोरिया
  3. न्यायपालिका - ब्लूमफ़ोनटेन
  • यह व्यवस्था द्वितीय बोर-युद्ध Second Boer War (1899-1902) का परिणाम है, जिसमें ब्रिटेन ने दो अफ्रीकी भाषी राज्यों द ऑरेंज फ्री स्टेट और दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र (ट्रांसवाल गणतंत्र) को जीत लिया था।

इस दौरान वर्ष 1872 में स्वशासित राज्य बनने तक केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) ब्रिटिश साम्राज्य में ही रहा तथा अन्य तीनों उपनिवेशों के साथ मिलकर वर्ष 1910 में दक्षिण अफ्रीकी संघ का हिस्सा बना। अन्य देशों के उदाहरण:-#श्रीलंका की आधिकारिक राजधानी और राष्ट्रीय विधायिका श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे है,परंतु वास्तविक कार्यपालिका और न्यायपालिका कोलम्बो में स्थित है।

  1. मलेशिया की आधिकारिक और राजकीय राजधानी कुआलालंपुर में है और यहीं पर देश की विधायिका भी स्थित है तथा कार्यपालिका एवं न्यायपालिका पुत्रजया से कार्य करती हैं।

भारत के अन्य एक से अधिक राजधानी वाले अन्य राज्य:''

  1. भारतीय राज्यों में महाराष्ट्र की दो राजधानियाँ मुंबई और नागपुर हैं (शीतकालीन सत्र नागपुर विधानसभा में होता है)।
  2. हिमाचल प्रदेश की दो राजधानियाँ शिमला और धर्मशाला (शीतकालीन) हैं।
  3. पूर्व राज्य जम्मू और कश्मीर की दो राजधानियाँ श्रीनगर एवं जम्मू (शीतकालीन) थीं।

लाभ

  1. राज्य के सुदूर हिस्सों में सरकार की पहुँच बढ़ती है।
  2. प्रमुख सरकारी संस्थानों के विकेंद्रीकृत होने से एक ही स्थान के बजाय कई क्षेत्रों में निवेश के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
  3. जनता के मध्य सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ावा मिलता है।

दुष्प्रभाव:-संस्थानों में आपसी सामंजस्य की समस्या।

  • शासन में नौकरशाही का दखल बढ़ता है।
  • समय की हानि।

कर्नाटक-महाराष्ट्र राज्य की सीमा पर स्थित बेलगाम पर अधिकार को लेकर दोनों राज्यों में तनाव सम्पादन

  • मराठी भाषी बहुसंख्यक के निवास करने के कारण बेलगाम पर महाराष्ट्र अपना दावा करता है,लेकिन यह ज़िला कर्नाटक के अंतर्गत आता है।
  • हाल ही में एक कन्नड़ संगठन की ओर से महाराष्ट्र एकीकरण समिति पर की गई टिप्पणी के बाद बेलगाम को लेकर जारी दशकों पुराना यह विवाद फिर से गरमा गया।
  • महाराष्ट्र एकीकरण समिति कर्नाटक के मराठी भाषी आबादी वाले इलाकों को महाराष्ट्र में सम्मिलित करने के लिये संघर्ष कर रही है।
  • महाराष्ट्र सरकार ने दिसंबर, 2019 की शुरुआत में कर्नाटक सरकार के साथ सीमा विवाद से संबंधित मामलों पर बातचीत तेज़ करने के प्रयासों की समीक्षा के लिये दो मंत्रियों को ‘समन्वयक’ बनाया है।
बेलगाम का ऐतिहासिक महत्त्व:-बेलगाम में 1924 में कॉन्ग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1916 में बेलगाम से ही अपना ‘होम रूल लीग' आंदोलन शुरु किया था।

बदलते परिदृश्य में सरकारों को क्षेत्रवाद के स्वरूप को समझना होगा। यदि यह विकास की मांग तक सीमित है तो उचित है, परंतु यदि क्षेत्रीय टकराव को बढ़ावा देने वाला है तो इसे रोकने के प्रयास किये जाने चाहिये। वर्तमान में क्षेत्रवाद संसाधनों पर अधिकार करने और विकास की लालसा के कारण अधिक पनपता दिखाई दे रहा है। इसका एक ही उपाय है कि विकास योजनाओं का विस्तार सुदूर तक हो। सम-विकासवाद ही क्षेत्रवाद का सही उत्तर हो सकता है।

  • स्वदेशी मुद्दों पर स्थायी मंच के सचिवालय:-असम में एक नवगठित राजनीतिक दल असोम संग्रामी मंच (Asom Songrami Mancha) ने मानव अधिकारों के तहत नागरिकता (संशोधन) अधिनियम,2019 (CAA) की वैधता की जाँच करने के लिये संयुक्‍त राष्‍ट्र शरणार्थी उच्‍चायुक्‍त और संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत स्वदेशी मुद्दों पर स्थायी मंच के सचिवालय (Secretariat of the Permanent Forum on Indigenous Issues- SPFII) को पत्र लिखा है।
(SPFII) या स्वदेशी लोगों और विकास शाखा (Indigenous Peoples and Development Branch-IPDB) की स्थापना वर्ष 2002 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी।
यह संयुक्त राष्ट्र के तहत आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (The Department of Economic and Social Affairs- DESA) के अंतर्गत समावेशी सामाजिक विकास (Division for Inclusive Social Development- DISD) हेतु एक प्रभाग है।

यह स्वदेशी लोगों के अधिकारों हेतु संयुक्त राष्ट्र अंतर-एजेंसी सहायता समूह का सह-अध्यक्ष भी है।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को अपने विधानसभा और लोकसभा उम्मीदवारों के संपूर्ण आपराधिक इतिहास को प्रकाशित करने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि उम्मीदवारों के संपूर्ण आपराधिक इतिहास की जानकारी स्थानीय और राष्ट्रीय समाचार पत्र के साथ-साथ पार्टियों के सोशल मीडिया हैंडल में प्रकाशित होनी चाहिये। यह अनिवार्य रूप से उम्मीदवारों के चयन के 48 घंटे के भीतर या नामांकन दाखिल करने की पहली तारीख के दो सप्ताह से कम समय में (जो भी पहले हो) प्रकाशित किया जाना चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को आदेश दिया कि वे भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के सामने 72 घंटे के भीतर अदालती कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें अन्यथा उन दलों पर न्यायालय की अवमानना से संबंधित कार्रवाई की जाएगी।

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्णय केंद्र और राज्य दोनों स्तर की पार्टियों पर लागू होता है।
  • संवैधानिक पीठ ने कहा है कि बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में शामिल रहे राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारी और उम्मीदवार देश की राजनीतिक और चुनावी गरिमा का अतिक्रमण करते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों से उन कारणों को भी बताने के लिये कहा है जो उन्हें सभ्य लोगों की तुलना में संदिग्ध अपराधियों को आगे लाने के लिये प्रेरित करते हैं।

पृष्ठभूमि:

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय वर्ष 2018 के ‘पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ’मामले में गठित एक संवैधानिक पीठ के फैसले के आधार पर दिया गया है जो कि राजनीतिक दलों द्वारा अपनी वेबसाइट और इलेक्ट्रॉनिक प्रिंट मीडिया पर अपने उम्मीदवारों के आपराधिक विवरण प्रकाशित करने और सार्वजनिक जागरूकता फैलाने संबंधी एक अवमानना याचिका पर आधारित था।
  • इस फैसले (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण और नागरिकों के बीच इस तरह के अपराधीकरण के बारे में जानकारी की कमी बताई थी।

जानकारी का स्वरूप: उम्मीदवारों के पूर्व अपराधों पर प्रकाशित जानकारी विस्तृत होनी चाहिये जिसमें उनके अपराधों की प्रकृति, उनके खिलाफ लगाए गए आरोप, संबंधित न्यायालय, मामले की संख्या आदि शामिल हैं। एक राजनीतिक दल को अपनी प्रकाशित सामग्री के माध्यम से जनता को यह भरोसा दिलाना होगा क्योंकि किसी भी अभ्यर्थी की ‘योग्यता या उपलब्धियाँ’ आपराधिक पृष्ठभूमि के कारण प्रभावित होती हैं। एक पार्टी को मतदाता को बताना होगा कि किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के लिये टिकट देने का निर्णय केवल चुनावों में विजय प्राप्त करना ही नहीं था। राजनीतिक अपराध संबंधी आँकड़े: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पिछले चार आम चुनावों में राजनीतिक अपराधों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2004 में संसद के 24% सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे जो कि वर्ष 2009 में बढ़कर30%, वर्ष 2014 में 34% और वर्ष 2019 में 43% हो गए। आगे की राह: देश की राजनीति में अपराधियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि संसद ऐसा कानून लाए ताकि अपराधी राजनीति से दूर रहें। जन प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने वाले लोग अपराध की राजनीति से ऊपर हों। राष्ट्र को संसद द्वारा कानून बनाए जाने का इंतजार है। भारत की दूषित हो चुकी राजनीति को साफ करने के लिये बड़ा प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

  • भारत निर्वाचन आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से एक राजनीतिक दल पंजीकरण ट्रैकिंग प्रबंधन प्रणाली (Political Parties Registration Tracking Management System- PPRTMS) प्रारंभ की है। इसके माध्यम से 1 जनवरी, 2020 से राजनीतिक दल के पंजीकरण हेतु आवेदन करने वाले आवेदक दल अपने आवेदनों की स्थिति का पता लगा सकेंगे।

आयोग ने पिछले महीने पंजीकरण के लिये दिशा-निर्देशों में संशोधन किया था। आवेदक को अपने आवेदन में दल/आवेदक का मोबाइल नंबर और ई-मेल पता दर्ज करना होगा ताकि इसके माध्यम से वह अपने आवेदन की अद्यतन स्थिति के बारे में SMS एवं ई-मेल के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकें। आवेदन की प्रक्रिया:

राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29(A) के प्रावधानों के अंतर्गत होता है। उपयुक्त धारा के तहत भारत निर्वाचन आयोग में पंजीकरण करने वाले इच्छुक दल को अपने गठन की तारीख से 30 दिनों की अवधि के भीतर आयोग के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होता है।

इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (Economist Intelligence Unit) द्वारा जारी लोकतंत्र सूचकांक में भारत 10 स्थान की गिरावट के साथ 51वें स्थान पर आ गया है। यह सूचकांक ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ द्वारा तैयार की गई ‘अ ईयर ऑफ डेमोक्रेटिक सेटबैक्स एंड पोपुलर प्रोटेस्ट’ (A year of democratic setbacks and popular protest) नामक रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया है। यह वैश्विक सूचकांक 165 स्वतंत्र देशों और दो क्षेत्रों (Territories) में लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति को प्रदर्शित करता है। पाँच पैमानों पर दी जाती है रैंकिंग: इस रिपोर्ट में दुनिया के देशों में लोकतंत्र की स्थिति का आकलन पाँच पैमानों पर किया गया है-

  1. चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद (Electoral Process and Pluralism)
  2. सरकार की कार्यशैली (The Functioning of Government)
  3. राजनीतिक भागीदारी (Political Participation)
  4. राजनीतिक संस्कृति (Political Culture)
  5. नागरिक आज़ादी (Civil liberties)

ये सभी पैमाने एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन पाँच पैमानों के आधार पर ही किसी भी देश में मुक्त और निष्पक्ष चुनाव एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिति का पता लगाया जाता है। इस सूचकांक में 1-10 अंकों के पैमाने के आधार पर रैंक तय की जाती है।

सूचकांक से संबंधित प्रमुख बिंदु:-इस सूचकांक में दुनिया के 165 देशों और 2 क्षेत्रों को उनकी शासन व्यवस्था के आधार पर चार तरह के मानकों के आधार पर रैंकिंग दी गई है-
  1. पूर्ण लोकतंत्र (Full Democracies)
  2. दोषपूर्ण लोकतंत्र (Flawed Democracies)
  3. हाइब्रिड शासन (Hybrid Regimes)
  4. सत्तावादी शासन (Authoritarian Regimes)

इस सूचकांक में 167 देशों में केवल 22 देशों को पूर्ण लोकतांत्रिक देश बताया गया है। दोषपूर्ण लोकतांत्रिक श्रेणी के तहत कुल 54 देश शामिल हैं। हाइब्रिड शासन श्रेणी में कुल 37 देशों को शामिल किया गया है। सत्तावादी शासन श्रेणी में कुल 54 देशों को शामिल किया गया है। इस सूचकांक में नॉर्वे, आइसलैंड तथा स्वीडन क्रमशः 9.87, 9.58, 9.39 अंकों के स्कोर के साथ प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्थान पर हैं। इस सूचकांक में उत्तर कोरिया (North Korea) को 1.08 अंकों के स्कोर के आधार पर अंतिम स्थान मिला है। वर्ष 2018 के सूचकांक की तुलना में 68 देशों का स्कोर कम हुआ है तथा 65 देशों ने स्कोर में बढ़त हासिल की है। सूचकांक में भारत की स्थिति:-इस रिपोर्ट में 167 देशों की सूची में भारत को 51वें स्थान पर रखा गया है लेकिन एशिया और ऑस्ट्रेलेशिया समूह में भारत को आठवाँ स्थान मिला है। भारत को कुल 6.90 अंक मिले हैं। अगर भारत के रैंक को अलग-अलग पैमानों पर देखें तो भारत को चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद में 8.67, सरकार की कार्यशैली में 6.79, राजनीतिक भागीदारी में 6.67, राजनीतिक संस्कृति में 5.63 और नागरिक आज़ादी में 6.76 अंक दिये गए हैं। इस सूचकांक में भारत को दोषपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी में रखा गया है। दोषपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी का आशय ऐसे देशों से है जहाँ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते हैं तथा बुनियादी नागरिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है लेकिन लोकतंत्र के पहलूओं में विभिन्न समस्याएँ, जैसे- शासन में समस्याएँ, एक अविकसित राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक भागीदारी का निम्न स्तर आदि होती हैं। भारत की रैंकिंग में गिरावट का कारण: इस सूचकांक के अनुसार, भारत की रैंकिंग में गिरावट का एक प्रमुख कारण असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens- NRC) के लागू होने के कारण 1.9 मिलियन व्यक्तियों का इससे बाहर होना है। इस रिपोर्ट में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए दोनों को निरस्त करने की चर्चा की गई है। और कहा गया कि भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात किया, विभिन्न सुरक्षा उपायों को लागू किया और स्थानीय नेताओं को घर में नजरबंद रखा, जिनमें भारत समर्थक व्यक्ति भी शामिल थे। कितना सफल है भारत का लोकतंत्र? स्वतंत्रता के बाद भारत का लोकतंत्र कितना सफल रहा, यह देखने के लिये इन वर्षों का इतिहास, देश की उपलब्धियाँ, देश का विकास, सामाजिक-आर्थिक दशा, लोगों की खुशहाली आदि पर गौर करने की ज़रूरत है। भारत का लोकतंत्र बहुलतावाद पर आधारित राष्ट्रीयता की कल्पना करता है। यहाँ की विविधता ही इसकी खूबसूरती है। सिर्फ दक्षिण एशिया को ही लें, तो भारत और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच यह अंतर है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में उनके विशिष्ट धार्मिक समुदायों का दबदबा है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता भारत का एक बेहद सशक्त पक्ष रहा है। सूचकांक में भारत का पड़ोसी देशों से बेहतर स्थिति में होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट: द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट लंदन स्थित इकोनॉमिस्ट ग्रुप का एक हिस्सा है जिसकी स्थापना 1946 में हुई थी। यह दुनिया के बदलते हालात पर नज़र रखती है और दुनिया की आर्थिक-राजनीतिक स्थिति के पूर्वानुमान द्वारा देश विशेष की सरकार को खतरों से आगाह करती है।