सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय संविधान

लोकतंत्र का उत्कृष्ट गुण यह है कि वह क्रियाशील बनाता है:-साधारण पुरुषों और महिलाओं की बुद्धि और चरित्र को।

संवैधानिक सरकार व्यक्तियों को स्वतंत्रता प्रदान करती है तथा लोगों के हितों को प्रभावित करने वाली राज्य की अतिरिक्त सत्ता को प्रतिबंधित करने तथा उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करती है।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

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अनुच्छेद 51 के अनुसार, राज्य निम्नलिखित के लिये प्रयास करेगा- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का अंतर्राष्ट्रीय विवादों के निपटारे के लिये मध्यस्थता द्वारा प्रोत्साहन देने का

भाग III/मौलिक अधिकार

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अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के खिलाफ अधिकार से संबंधित हैं। अनुच्छेद 23 के अनुसार, मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्‌ श्रम प्रतिषिद्ध किया गया है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा तथा विधि के अनुसार दंडनीय होगा। अनुच्छेद 24 यह प्रावधान करता है कि चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिये नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।

अनुच्छेद-21

निजता का मुद्दा और भारत के निगरानी कानून IT अधिनियम की धारा 69 की उपधारा (1) के तहत अगर एजेंसियों को ऐसा लागता है कि कोई व्यक्ति या संस्था देशविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं तो वे उनके कंप्यूटरों में मौज़ूद डेटा को खंगाल सकती हैं और उन पर कार्रवाई कर सकती हैं।

ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, 1923

भारत में ब्रिटिश आधिपत्य के दौरान अंग्रेज़ों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिये कई तरह के कानून भी बनाए। इसी कड़ी में उन्होंने 1923 में शासकीय गोपनीयता कानून (Official Secret Act) लागू किया। यह कानून मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है- पहला जासूसी और दूसरा गुप्तचरी से संबंधित है। गौरतलब यह है कि भारत सरकार द्वारा गठित विभिन्न आयोगों व समितियों द्वारा समय-समय पर इस कानून को समाप्त करने की सिफारिशें की जा चुकी हैं, लेकिन इन पर आज तक अमल नहीं हो पाया।

सूचना प्रौद्योगिकी कानून (IT Act), 2000 को इलेक्‍ट्रोनिक लेन-देन को प्रोत्‍साहित करने, ई-कॉमर्स और ई-ट्रांजेक्‍शन के लिये कानूनी मान्‍यता प्रदान करने, ई-शासन को बढ़ावा देने, कम्‍प्‍यूटर आधारित अपराधों को रोकने तथा सुरक्षा संबंधी कार्य प्रणाली और प्रक्रियाएँ सुनिश्चित करने के लिये अमल में लाया गया था। यह कानून 17 अक्‍तूबर, 2000 को लागू किया गया।

जस्टिस के.एस. पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के अपने निर्णय में निजता को मौलिक अधिकार तो माना, लेकिन यह भी कहा कि यह अधिकार निरंकुश और असीमित नहीं है। अनुच्छेद 20 अपराध के लिये दोषी व्यक्तियों को मनमाने और अतिरिक्त दंड से संरक्षण प्रदान करता है। इस संबंध में तीन व्यवस्थाएँ हैं: कोई भूतलक्षी प्रभाव वाला कानून नहीं (NO Ex-post-facto Law) : एक भूतलक्षी प्रभाव अथवा कार्योत्तर कानून वह है जो कार्य के बाद पूर्वव्यापी प्रभाव से दंड अध्यारोपित करता है। हालाँकि इस तरह की सीमा केवल आपराधिक कानूनों में ही लागू होगी, न कि सामान्य दीवानी कानून या कर कानूनों में। स्वयं पर दोषारोपण का प्रतिषेध (No Self-incrimination): किसी भी अपराध के लिये अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिये बाध्य नहीं किया जाएगा। हालाँकि इस संरक्षण का विस्तार केवल आपराधिक कार्रवाइयों संबंधी मामलों की सुनवाई पर ही हो सकता है, न कि दीवानी मामलों पर। दोहरी क्षति नहीं (No Double Jeopardy): किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिये एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा। दोहरी क्षति के विरुद्ध संरक्षण सिर्फ कानूनी न्यायालय या न्यायिक अधिकरण में ही उपलब्ध होता है। दूसरे शब्दों में यह विभागीय या प्रशासनिक सुनवाई में लागू नहीं हो सकता क्योंकि वे न्यायिक प्रकृति के नहीं हैं।

अनुच्छेद 16

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जून 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक आरक्षण संबंधी मामले में अनुच्छेद-32 के तहत दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरक्षण एक मौलिक अधिकार नहीं है। याचिका में तमिलनाडु में मेडिकल पाठ्यक्रमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों को 50% आरक्षण नहीं देने के केंद्र सरकार के निर्णय को चुनौती दी गई थी। याचिका में तमिलनाडु के शीर्ष नेताओं द्वारा वर्ष 2020-21 के लिये ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा’ (National Eligibility Cum Entrance Test- NEET) में राज्य के लिये आरक्षित सीटों में से 50% सीटें ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) हेतु आरक्षित करने के लिये केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत एक याचिका केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में दायर की जा सकती है। आरक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। अत: आरक्षण नहीं देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं को उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की अनुमति प्रदान करते हुए याचिका वापस लेने को कहा है। भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत अनुच्छेद 15 तथा 16 में आरक्षण संबंधी प्रावधानों को शामिल किया गया हैं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इन अनुच्छेदों की प्रकृति के आधार पर इन्हे मौलिक अधिकार नहीं माना है। इसलिये इन्हें लागू करना राज्य के लिये बाध्यकारी नहीं हैं। आरक्षण की अवधारणा आनुपातिक नहीं, बल्कि पर्याप्त (Not Proportionate but Adequate) प्रतिनिधित्व पर आधारित है, अर्थात् आरक्षण का लाभ जनसंख्या के अनुपात में उपलब्ध कराने की बजाय पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये है।

  1. सर्वोच्च न्यायालय की तत्कालीन पीठ का ऐसा मानना था कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि SC/ST को मिलने वाला पूरा लाभ उस इस वर्ग से संबंधित सिर्फ चुनिंदा सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त लोगों को न मिले, अतः आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा का प्रयोग करना आवश्यक है।
  2. इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आरक्षण का लाभ SC/ST वर्ग के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय के मत के विपरीत सरकार का मानना है कि ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा आरक्षण के लाभ से पिछड़े वर्ग को वंचित करने का बड़ा कारण बन सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी-जनरल के.के. वेणुगोपाल के अनुसार, SC/ST समुदाय अभी भी सदियों पुरानी कुप्रथाओं का सामना कर रहा है।

क्रीमी लेयर की अवधारणा सर्वप्रथम इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई थी। यह सर्वोच्च न्यायालय की 9 सदस्यीय पीठ द्वारा 16 नवंबर, 1992 को दिया गया एक ऐतिहासिक फैसला था।

इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायलय ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के सरकार के कदम को बरकरार रखा। परंतु साथ ही यह निर्णय भी दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर या सामाजिक रूप से सशक्त हिस्से को पिछड़े वर्ग में शामिल नहीं किया जाना चाहिये।

वर्ष 1993 में क्रीमी लेयर की अधिकतम सीमा 1 लाख रुपए तय की गई जिसके बाद उसे वर्ष 2004 में बढ़ाकर 2.5 लाख रुपए, वर्ष 2008 में बढ़ाकर 4.5 लाख रुपए, वर्ष 2013 में बढ़ाकर 6 लाख रुपए और 2017 में बढ़ाकर 8 लाख रुपए कर दिया गया।

SC/ST और क्रीमी लेयर

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इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में न्यायालय ने यह भी कहा था कि आरक्षण केवल प्रारंभिक नियुक्तियों पर ही लागू होगा न कि पदोन्नति पर। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर से असहमति व्यक्त करते हुए सरकार ने 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 के माध्यम से अनुच्छेद 16(4A) शामिल किया और साथ ही पदोन्नति में SC/ST के लिये कोटा बढ़ाने की अपनी नीति को भी जारी रखा।

इस कदम के पीछे सरकार ने यह तर्क दिया कि अभी भी राज्य की सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व आवश्यक स्तर तक नहीं पहुँच पाया है।

इसके पश्चात् वर्ष 2000 में सरकार ने 81वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 16(4B) जोड़ा, जिसके अनुसार राज्य द्वारा ऐसी रिक्तियों को अलग श्रेणी में आमंत्रित आरक्षित रिक्तियों के किसी वर्ष न भरे जाने की स्थिति में इन रिक्तियों को अलग श्रेणी में रखकर आगामी वर्ष में भरा जा सकेगा। साथ ही यह भी प्रावधान किया गया कि आगामी वर्ष में इन रिक्तियों को उस वर्ष के लिये आरक्षित 50 प्रतिशत की सीमा में शामिल नहीं माना जाएगा। वर्ष 2000 में 82वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 335 में एक और परंतुक जोड़कर यह निर्धारित कर दिया गया कि संघ एवं राज्यों की सेवाओं में SC/ST समुदाय के सदस्यों के लिये आरक्षित रिक्तियों को पदोन्नति के माध्यम से भरते समय अहर्ता अंकों एवं मूल्यांकन के मानकों में कमी की जा सकती है। सरकार द्वारा किये गए इन संशोधनों को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कई याचिकों के माध्यम से चुनौती दी गई और वर्ष 2006 का एम. नागराज बनाम भारत सरकार मामला इसमें सबसे प्रमुख माना जाता है। इस मामले पर फैसला देते हुए पाँच सदस्यों वाली पीठ ने सरकारी नौकरियाँ में पदोन्नति पर आरक्षण देने के लिये सरकार के समक्ष तीन शर्तें रखीं:

  1. सरकार अपने SC/ST कर्मचारियों के लिये पदोन्नति में आरक्षण तब तक लागू नहीं कर सकती है जब तक कि यह साबित न हो कि विशेष समुदाय पिछड़ा हुआ है।
  2. पदोन्नति में आरक्षण से लोक प्रशासन की समग्र दक्षता प्रभावित नहीं होनी चाहिये।
  3. सरकार की राय मात्रात्मक आँकड़ों पर आधारित होनी चाहिये।

इसी के साथ एम. नागराज बनाम भारत सरकार मामले में यह निश्चित हो गया कि सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में SC/ST आरक्षण पर क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू होगा।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक पदों पर ‘प्रोन्नति में आरक्षण’ मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य को इस संदर्भ में बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश एल नागेश्वर राव और न्यायाधीश हेमंत गुप्ता की दो सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि न्यायालय राज्य सरकारों को पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने हेतु आदेश जारी नहीं कर सकता है।

पदोन्नति में आरक्षण के विषय में क्या कहता है संविधान? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक पदों पर अवसर की समानता से संबंधित प्रावधान किये गए हैं।

  1. अनुच्छेद 16(1) के अनुसार राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समानता होगी।
  2. अनुच्छेद 16(2) के अनुसार, राज्य के अधीन किसी भी पद के संबंध में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इसमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

हालाँकि संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 16(4A) में सार्वजनिक पदों के संबंध में सकारात्मक भेदभाव या सकारात्मक कार्यवाही का आधार प्रदान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार, राज्य सरकारें अपने नागरिकों के उन सभी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण हेतु प्रावधान कर सकती हैं, जिनका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। अनुच्छेद 16(4A) के अनुसार, राज्य सरकारें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिये कोई भी प्रावधान कर सकती हैं यदि राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

वर्ष 2018 में जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए कहा कि पदोन्नति में आरक्षण के लिये राज्यों को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के पिछड़ेपन से संबंधित मात्रात्मक डेटा एकत्र करने की आवश्यकता नहीं है।

जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही 12 वर्ष पुराने एम. नागराज बनाम भारत सरकार मामले 2006 में दिये गए पूर्ववर्ती फैसले पर सहमति व्यक्त की थी। एम. नागराज बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय का पक्ष था कि देश में आरक्षण को सीमित अर्थों में लागू किया जाना चाहिये, अन्यथा यह जातिप्रथा को समाप्त करने में कभी कारगर साबित नहीं होगी। वर्ष 1882 में विलियम हंटर और ज्योतिराव फुले ने मूल रूप से जाति आधारित आरक्षण प्रणाली की कल्पना की थी। आरक्षण की मौजूदा प्रणाली को सही मायने में वर्ष 1933 में पेश किया गया था जब तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक अधिनिर्णय दिया। विदित है कि इस अधिनिर्नयन के तहत मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय और दलितों के लिये अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों का प्रावधान किया गया। आज़ादी के पश्चात् शुरुआती दौर में मात्र SC और ST समुदाय से संबंधित लोगों के लिये ही आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, किंतु वर्ष 1991 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी आरक्षण की सीमा में शामिल कर लिया गया।

अनुच्छेद 15

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जून 2019 में रिलिज अनुभव सिन्हा और गिन्ग्गर शंकर निर्देशित फिल्म आर्टिकल 15 लगातार चर्चा में बनी हुई है। बताया जा रहा है कि यह फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है, लेकिन इसके कंटेंट को लेकर कई लोगों को आपत्ति भी है। सवर्णों के एक संगठन ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। फिल्म में उत्तर प्रदेश के एक गाँव की कहानी दर्शाई गई है और इसका टाइटल संविधान के अनुच्छेद 15 से लिया गया है।

आर्टिकल 15 के बेहतर अनुपालन हेतु बनाए गए कुछ कानून
  1. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (The Protection of Civil Rights Act, 1955):-वर्ष 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 बनाया गया था। यह अधिनियम 1 जून, 1955 से प्रभावी हुआ था, लेकिन अप्रैल 1965 में गठित इलायापेरूमल समिति की अनुशंसाओं के आधार पर 1976 में इसमें व्यापक संशोधन किये गए तथा इसका नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (Protection of Civil Rights Act, 1955) कर दिया गया था। यह संशोधित अधिनियम 19 नवंबर, 1976 से प्रभावी हुआ और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अस्पृश्यता उन्मूलन संबंधी प्रावधानों के अनुरूप है।
  1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:- ऐसे अपराधों के अभियोजन के लिये विशेष न्‍यायालय बनाने तथा राहत देने और ऐसे अपराधों के शिकार लोगों के पुनर्वास के लिये प्रावधान करने वाला एक अधिनियम है। इस कानून को और प्रभावी बनाने के लिये वर्ष 2015 में इसमें संशोधन किये गए तथा यह 26 जनवरी, 2016 से लागू हुआ।
  2. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 :- यह कानून जन्म से हिंदू, बौद्ध, जैन तथा सिख या ऐसा कोई व्यक्ति जिसने इनमें से कोई धर्म अपना लिया हो, पर लागू होता है। वर्ष 2005 में इस कानून में संशोधन किया गया तथा संपत्ति के मामले में पुत्रियों को भी बराबर का हक दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधित) अधिनियम के तहत 9 सितंबर 2005 को जीवित कर्ताओं की जीवित पुत्रियों को संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार है। इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि ऐसी पुत्रियों का जन्म कब हुआ है।
  3. मातृत्व लाभ अधिनियम 1961:- यह अधिनियम मातृत्व के समय महिला के रोज़गार की रक्षा करता है और मातृत्व लाभ का हकदार बनाता है अर्थात अपने बच्चे की देखभाल के लिये पूरे भुगतान के साथ उसे काम से अनुपस्थित रहने की सुविधा देता है। यह अधिनियम 10 या उससे अधिक व्यक्तियों को रोज़गार देने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होता है। वर्ष 2017 में इस अधिनियम में संशोधन किये गए। इसके तहत कामकाजी महिलाओं को दो बच्चों के लिये मातृत्व लाभ की सुविधा 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह और दो से अधिक बच्चों के लिये 12 सप्ताह कर दी गई है। ‘कमिशनिंग मदर’ और ‘एडॉप्टिंग मदर’ को 12 सप्ताह का मातृत्व लाभ मिलेगा तथा घर से काम करने की सुविधा दी गई है। इसके साथ 50 या उसके अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में क्रेच का अनिवार्य प्रावधान किया गया है।
  4. कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013: संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अंतर्गत लिंग समानता की गारंटी में यौन उत्पीड़न से सुरक्षा और प्रतिष्ठा के साथ कार्य करने का अधिकार शामिल है। कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 में एक नागरिक के रूप में समान, सुरक्षित और निरापद वातावरण में कोई भी व्यवसाय या कार्य अपनाने का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित किया गया है। इसके लागू हो जाने के बाद विभिन्न कार्यों में महिलाओं की भागीदारी पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है तथा महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं। यह कानून समय के अनुकूल है और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने में यह उचित सहायता प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1997 में ऐतिहासिक विशाखा बनाम राजस्थान सरकार मुकदमे का निर्णय देते समय ऐसे कानून की कमी महसूस की थी।
  1. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016): इस अधिनियम में दिव्‍यांगजनों के अधिकारों और विशेष अधिकारों की रक्षा के लिये व्‍यापक प्रावधान किये गए हैं। इन प्रावधानों में सेवाओं में आरक्षण बढ़ाना और अधिनियम के तहत दिव्‍यांगता की अतिरिक्‍त 14 श्रेणियों को शामिल किया गया है। इन 14 श्रेणियों में ऐसिड अटैक पीड़ित, थैलेसीमिया, हिमोफीलिया, अवरुद्ध विकास, सीखने की असमर्थता और पार्किंसन बीमारी भी शामिल हैं। नए प्रावधान और दिव्‍यांगता की श्रेणियाँ वर्ष 2007 के संयुक्‍त राष्‍ट्र समझौते की सिफारिशों के अनुरूप तय की गई हैं। भारत इन सिफारिशों पर हस्‍ताक्षर कर चुका है।
  2. मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 (The Mental Health Care Act, 2017): यह अधिनियम मानसिक स्वास्थ्य के इलाज के तरीके को बदलने का प्रयास करता है और यह सुनिश्चित करता है कि हमारा कानून दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCRPD) के अनुरूप हो। यह अधिनियम काफी व्यापक है और इसका उद्देश्य मानसिक रूप से बीमार लोगों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल एवं सेवाएँ मुहैया कराना है। साथ ही देखभाल एवं सुविधाएँ देते समय ऐसे लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें बढ़ावा देना भी इसके उद्देश्यों शामिल है। इसके तहत मानसिक रोगियों के अधिकार, अग्रिम निर्देश, केंद्रीय और राज्य मानसिक स्वास्थ्य अथॉरिटी, मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान, मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा आयोग और बोर्ड, आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से अलग करना तथा बिजली के झटके की उपचार पद्धति को निषिद्ध करना आदि प्रावधानों की व्यवस्था की गई है।

प्रस्तावना

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संविधान के बारे में निम्नलिखित 4 बिंदुओं को प्रस्तुत करती है: संविधान के अधिकार का स्रोत, जो कि भारत के लोग हैं। भारतीय राज्य की प्रकृति- संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं गणतांत्रिक। संविधान के उद्देश्य- न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व। संविधान लागू होने की तिथि जो कि 26 नवंबर, 1949 है।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि:

  • भारत के संविधान की प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है।
  • प्रस्तावना न तो शक्ति का स्रोत है और न ही शक्ति को सीमित करती है।
  • संविधान के कानून एवं प्रावधानों की व्याख्या में प्रस्तावना की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

एस.आर. बोम्मई वाद में नौ न्यायाधीशों में से अधिकांश ने प्रस्तावना के एक नए अनुप्रयोग का प्रतिपादन किया जो इस प्रकार है: प्रस्तावना संविधान के मूल ढाँचे को दर्शाती है। अनुच्छेद 356 (1) के अंतर्गत जारी उद्घोषणा, संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करने के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन है। इसी प्रकार अनुच्छेद 356 (1) की एक उद्घोषणा के तहत यदि प्रस्तावना में वर्णित किसी भी आधारभूत विशेषता का उल्लंघन किया जाता है तो इसे असंवैधानिक माना जाएगा।


प्र्श्न-उद्येश्यिका(प्रस्तावना)में शब्द 'गणराज्य' के साथ जुड़े प्रत्येक विशेषण पर चर्चा कीजिए।क्या वर्तमान परिस्थितियों में वे प्रतिरक्षणीय है?[I.A.S-2016]

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 को भारत में प्रतिनिधि संस्थानों की शुरुआत के लिये जाना जाता है। इसने देश में विधायी शक्तियों के अंतरण की नींव रखी।

  1. लॉर्ड कैनिंग द्वारा वर्ष 1859 में शुरू की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को इस अधिनियम द्वारा मान्यता दी गई।
  2. इसके अंतर्गत वायसराय की परिषद के किसी सदस्य को एक या अधिक सरकारी विभागों का प्रभारी बनाया जा सकता था तथा उसे इस विभाग में परिषद की ओर से अंतिम आदेश जारी करने का अधिकार था।
  3. इसने वायसराय को आपातकाल के दौरान परिषद की संस्तुति के बिना अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया। ऐसे अध्यादेश की अवधि छह माह हो सकती थी। अतः कथन 2 सही है।
  4. इसके द्वारा विधि निर्माण की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई। इस प्रकार वायसराय कुछ भारतीयों को विस्तारित परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में नामांकित कर सकता था।
  5. इस अधिनियम ने बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी को पुनः विधायी शक्तियाँ देकर विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की। इस प्रकार इस अधिनियम ने रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा प्रारंभ केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को उलट दिया जो 1833 के चार्टर अधिनियम के साथ अपने चरम पर पहुँच गई थी।
  6. इस विधायी विकास की नीति के कारण 1937 तक प्रांतों को संपूर्ण आंतरिक स्वायत्तता हासिल हो गई।
  7. इसके प्रावधानों के तहत बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (NWFP) और पंजाब में क्रमशः 1862, 1866 और 1897 में विधानपरिषदों का गठन हुआ।
  8. 1853 के चार्टर अधिनियम में पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशासनिक कार्यों को अलग किया गया। इसने गवर्नर जनरल के लिये नई विधानपरिषद का गठन किया, जिसे भारतीय (केंद्रीय) विधानपरिषद के रूप में जाना जाता है।