सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1909 से 1919 तक

भारतीय परिषद अधिनियम 1909

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जिसे मॉर्ले-मिंटो सुधार भी कहा जाता है, द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गई। निर्वाचित सदस्यों में से अधिकांश अभी भी अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे। केंद्रीय विधान परिषद् के 68 सदस्यों में से 36 सरकारी अधिकारी और 05 गैर-अधिकारी सदस्य नामित थे। निर्वाचित 27 सदस्यों में से 06 बड़े ज़मींदारों और 02 ब्रिटिश पूँजीपतियों द्वारा चुने जाने थे।

  1. अधिनियम ने सदस्यों को प्रस्तावों को पेश करने की अनुमति दी। साथ ही इसने प्रश्न पूछने का अधिकार भी दिया।
  2. अलग-अलग बजट मदों पर वोटिंग की अनुमति दी गई। लेकिन प्रस्तावित परिषद के पास अब भी कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी और ये मात्र सलाहकार निकाय ही बने रहे।

गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद में एक भारतीय सदस्य को नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। सत्येन्द्र सिन्हा को पहले भारतीय सदस्य के रूप में कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त किया गया। अतः कथन 3 सही है। सुधारों ने पृथक निर्वाचक मंडल प्रणाली शुरू की जिसके तहत मुसलमान केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट दे सकते थे, विशेष रूप से उनके लिये आरक्षित क्षेत्रों में।

गांधीजी का भारत आगमन

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जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दिस लास्ट’ का गांधीजी पर गहरा प्रभाव पड़ा था। यह पुस्तक गांधीजी को उनके मित्र श्री पोलाक द्वारा भेंट की गई थी जिसे उन्होंने जोहान्सबर्ग से डरबन तक की अपनी ट्रेन यात्रा के दौरान पढ़ा था। गांधी जी ने इससे तीन संदेश प्राप्त किये:

  1. व्यक्ति की भलाई सभी की भलाई में निहित है- सर्वोदय का दर्शन और अंत्योदय इसी के उप-उत्पाद हैं।
  2. श्रम से युक्त जीवन ही सही जीवन है।
  3. सभी को अपने काम से अपनी आजीविका कमाने का समान अधिकार है।

गांधीजी 46 वर्ष की आयु में 1915 में अफ्रीका से भारत लौटे। पूरे एक वर्ष तक उन्होंने देश का भ्रमण किया और भारतीय जनता की दशा को समझा। फिर उन्होंने 1916 में अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम की स्थापना की। गांधीजी द्वारा दक्षिण अफ्रीका से लौटने के पश्चात भारत में आरंभ किया गया प्रथम सफल सत्याग्रह चंपारन सत्याग्रह था।

बिहार के चंपारन ज़िले के नील उत्पादक किसानों पर यूरोपीय निहले बहुत अधिक अत्याचार करते थे। किसानों को अपनी ज़मीन के कम-से-कम 3/20 भाग पर नील की खेती करना तथा निहलों द्वारा तय दामों पर बेचना पड़ता था। 1917 में गांधीजी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, नरहरि पारिख और महादेव देसाई के साथ चंपारन पहुँचे और किसानों के हालात की विस्तृत जाँच पड़ताल करने लगे। अंततः सरकार ने मज़बूर होकर एक जाँच समिति बनाई जिसके एक सदस्य गांधीजी भी थे।

सन 1918 में गांधीजी ने अहमदाबाद में मज़दूरों और मिल मालिकों के एक विवाद में हस्तक्षेप किया। गांधीजी ने मज़दूरों की मज़दूरी में 35 प्रतिशत वृद्धि की मांग करने तथा इसके लिये हड़ताल पर जाने की राय दी। मज़दूरों के हड़ताल को जारी रखने के संकल्प को बल देने के लिये उन्होंने आमरण अनशन किया। उनके अनशन ने मिल मालिकों पर दबाव डाला और वे नरम पड़कर 35 प्रतिशत मज़दूरी बढ़ाने पर सहमत हो गए।

दूसरे राष्ट्रवादियों की तरह गांधीजी को भी रोलट कानून से धक्का लगा। फरवरी 1919 में उन्होंने एक सत्याग्रह सभा बनाई जिसके सदस्यों ने इस कानून का पालन न करने तथा गिरफ्तारी और जेल जाने का सामना करने की शपथ ली।


होमरूल आंदोलन

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प्रशासन में ब्रिटिश नियंत्रण को कम करने के लिये आयरलैंड में वर्ष 1870 से 1907 के बीच चले होमरूल आंदोलन की तर्ज़ पर ऐनी बेसेंट तथा तिलक के नेतृत्व में भारतीय होमरूल आंदोलन चलाया गया था। तिलक ने अप्रैल 1916 में अपनी होम रूल लीग की स्थापना की। यह महाराष्ट्र (बॉम्बे शहर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत और बरार तक सीमित थी और इसकी छह शाखाएँ थीं। एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में मद्रास में अपनी लीग स्थापित की और बॉम्बे शहर सहित शेष भारत में शाखाएँ स्थापित की। इसकी 200 शाखाएँ थीं, जो तिलक की लीग की तुलना में कमज़ोर रूप से संगठित थीं। जॉर्ज अरुंडेल इसके संगठन सचिव थे। अरुंडेल के अलावा मुख्य कार्य बी.डब्ल्यू. वाडिया और सी.पी. रामास्वामी अय्यर द्वारा किया गया। लीग के अभियान का उद्देश्य जनता को स्वशासन अर्थात् होमरूल के बारे में जागरूक करना था। इसकी प्रमुख गतिविधियों में सार्वजनिक बैठकों के माध्यम से राजनीतिक शिक्षा और चर्चा को बढ़ावा देना, राष्ट्रीय राजनीति पर पुस्तकों और पुस्तकालयों का आयोजन करना, सम्मेलन आयोजित करना, छात्रों के लिये राजनीति पर कक्षाएँ आयोजित करना, समाचार पत्रों, पंफलेट, पोस्टरों, पोस्टकार्ड, नाटक, धार्मिक गीत आदि के माध्यम से प्रचार प्रसार आदि शामिल था। तिलक की लीग की माँगों में स्वराज्य, भाषाई आधार पर राज्यों का गठन और स्थानीय भाषा (मातृभाषा) में शिक्षा देना आदि शामिल थी। एंग्लो-इंडियन, दक्षिण के अधिकांश मुस्लिम और गैर-ब्राह्मण इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए क्योंकि उन्हें लगा कि होम रूल का अर्थ हिंदू बहुसंख्यकों के शासन से है और वह भी मुख्य रूप से उच्च जातियों के शासन से।

खिलाफत आंदोलन

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मुहम्मद अली, शौकत अली, मौलाना आज़ाद, हकीम अजमल खान और हसरत मोहानी के नेतृत्व में खिलाफत कमेटी का गठन किया गया और देशव्यापी आंदोलन छेड़ा गया।

ब्रिटिश शासन के अत्याचारों ने समूची भारतीय जनता को एकसमान रूप से प्रभावित किया था और हिन्दू-मुसलमान दोनों को राजनीतिक आंदोलन में ले आया। उदाहरण के लिये राजनीतिक गतिविधियों के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल दुनिया के सामने रखने के लिये मुसलमानों ने कट्टर आर्य समाजी नेता श्रद्धानंद को आमंत्रित किया कि वे दिल्ली की जामा मस्जिद में अपना उपदेश दें। इसी तरह अमृतसर में सिखों ने अपने पवित्र स्थान स्वर्ण मंदिर की चाभियाँ एक मुसलमान नेता डॉ. किचलू को सौंप दी थी। यह राजनीतिक एकता सरकार के दमन के कारण थी। इस वातावरण में मुसलमानों के बीच राष्ट्रवादी प्रवृत्ति ने ख़िलाफ़त आंदोलन की शक्ल ले ली। जर्मनी की ओर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की, मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुआ था। युद्ध के समय ब्रिटिश राजनेताओं ने भारतीय मुसलमानों को वचन दिया था कि वे युद्ध के बाद तुर्की के साथ सम्मानजनक व्यवहार करेंगे। किंतु सेवर्स की संधि के दौरान यह खबर फैली कि ब्रिटिश सरकार तुर्की के सुल्तान पर अपमानजनक शर्तें थोप रही है। मुसलमानों का मत यह भी था कि तुर्की के सुल्तान को लोग खलीफा अर्थात् धार्मिक मामलों में मुसलमानों का प्रमुख मानते थे। अतः खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य खलीफा के सम्मान, शक्ति व सर्वोच्चता की पुनर्स्थापना करना भी था।

भारत सरकार अधिनियम 1919

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इसके द्वारा प्रांतीय सरकार के स्तर पर कार्यपालिका के लिये द्वैध शासन की शुरुआत की गई। केंद्र के स्तर पर द्वैध व्यवस्था का प्रारंभ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत हुआ। द्वैध शासन या दोहरा शासन अर्थात् कार्यकारी पार्षदों और निर्वाचित मंत्रियों द्वारा शासन शुरू किया गया था। गवर्नर प्रान्त में कार्यकारी प्रमुख था। विषय दो सूचियों में विभाजित थे: आरक्षित सूची:-इन्हें गवर्नर द्वारा उनकी कार्यकारी परिषद के माध्यम से प्रशासित किया जाना था। हस्तांतरित सूची:-इस सूची के विषयों का प्रशासन विधान परिषद के निर्वाचित सदस्यों में से मनोनीत मंत्रियों द्वारा किया जाना था। प्रांतीय विधान परिषदों का और अधिक विस्तार किया गया तथा 70 प्रतिशत सदस्यों को निर्वाचन द्वारा चुना जाना था। महिलाओं को भी मतदान का अधिकार दिया गया। केंद्र से प्रांतों को विधायी शक्ति के अंतरण का प्रावधान था। प्रांतीय विधान परिषदें विधि बना सकती थी, लेकिन गवर्नर की सहमति आवश्यक थी। गवर्नर विधेयक को वीटो कर सकता था और अध्यादेश जारी कर सकता था।

यह इस धारणा को प्रोत्साहित करने के लिये किया गया था कि हिंदू और मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हित अलग-अलग थे। भारत सरकार अधिनियम 1919 में, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार किया गया और सिख, यूरोपीय और आंग्ल-भारतीय आदि समुदायों के लिये भी पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई। भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा ही केंद्र में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था की शुरुआत की गई थी, न कि भारतीय परिषद अधिनियम 1909 द्वारा।

ब्रिटिश सरकार के भारत मंत्री मांटेग्यू तथा वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने 1918 में संविधान सुधारों की योजना सामने रखी जिसके आधार पर 1919 का भारत सरकार कानून बनाया गया। अगस्त 1918 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई में एक विशेष सत्र बुलाया ताकि सुधारों के प्रस्तावों पर विचार किया जा सके। इस सत्र में कांग्रेस के अधिकांश नेताओं ने इन प्रस्तावों को "निराशाजनक और असंतोषजनक" बतलाकर प्रभावी स्वशासन की मांग रखी।

[I.A.S-2003]सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस के कुछ वयोवृद्ध नेता सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करने के पक्ष में थे। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर इंडियन लिबरल एसोसिएशन की स्थापना(अखिल भारतीय उदारवादी संघ) की। ये लोग उदारवादी कहे गए तथा भारत की राजनीति में आगे चलकर इनकी बहुत नगण्य भूमिका रही।