कबीर ग्रंथावली-सं. श्यामसुंदरदास, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उन्नीसवाँ संस्करण संवत् २०५४ वि.

पृष्ठ २३ दोहा २७, पृष्ठ २९ दोहा २०, पृष्ठ ३० दोहा ३ और ४, पृष्ठ ३५ दोहा ८, पृष्ठ ३९ दोहा ९

कबीर हरि की भगति बिन, ध्रिग जीमण संसार।
धूंवाँ केरा धौलहर, जात न लागै बार॥२७॥[१]

मैमंता मन मारि रे, नान्हां करि करि पीसि।
तब सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥२०॥[२]

"सन्दर्भ-मन को वश में करने से ही ब्रह्म ज्योति का प्रकाश मिलेगा।

भावार्थ-मदमस्त हाथी रूपी मन को संयम के द्वारा इतना कस कर मारो कि सूक्ष्मता को प्राप्त हो जाय। कर्मों को बारीक आटे की तह पीसना चाहिए। तभी आत्मा रूपी सुन्दरी को सुख प्राप्त होगा और सिर से ब्रह्म ज्योति का प्रकाश छिटकता रहेगा।"[३]

सबकूं बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइ।
प्रीति न जोड़ी राम सूं, रहण कहां थैं होइ॥३॥
चलौ चलौं सबको कहै, मोहि अँदेसा और।
साहिब सूं पर्चा नहीं, ए जांहिगे किस ठौर॥४॥[४]

कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ।
लालच लोभी मसकरा, तिनकू आदर होइ॥८॥[५]

नाना भोजन स्वाद सुख, नारी सेती रंग।
बेगि छाड़ि पछिताइगा, ह्वै है मूरति भंग॥९॥[६]

संदर्भसंपादित करें

  1. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, १९२८, पृ.२३
  2. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, १९२८, पृ.२९
  3. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, प्रकाशन केन्द्र, आगरा, १९७१, पृ.१८२
  4. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, १९२८, पृ.३१
  5. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, १९२८, पृ.३६
  6. कबीर-ग्रंथावली-सं. श्याम सुंदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, १९२८, पृ.४०