हिन्दी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
 ← लिपि के आरंभिक रूप देवनागरी लिपि का परिचय और विकास देवनागरी लिपि का मानकीकरण → 

परिचयसंपादित करें

देवनागरी लिपि का उद्भव सेंधव अथवा ब्राह्मणी लिपि से स्वीकार किया जाता है। ब्राह्मणी की उत्तरी शैली से गुप्त लिपि और फिर कुटिल लिपि का विकास हुआ। सामान्य नागरी में परंपरागत रूप से निम्न वर्ण स्वीकार किए गए हैं।

स्वर
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
अनुस्वार: अं
विसर्ग: अः
व्यंजन
कण्ठय: क, ख, ग, घ, ङ
तालव्य: च, छ, ज, झ, ञ
मूर्धन्य: ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़
दन्त्य: त, थ, द, ध, न
ओष्ठय: प, फ, ब, भ, म
अन्तःस्थ: य, र, ल, व
सिबिलैंट: श, ष, स
महाप्राण: ह (जैस ख, ध, भ)
गृहीत: ज़, फ़, ऑ
संयुक्त व्यंजन: क्ष, त्र, ज्ञ, श्र

देवनागरी लिपि को उसका यह नाम कैसे मिला इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न मत दिए हैं। ये मत कुछ इस प्रकार हैं:

गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार: प्राचीन काल में काशी को देवनगर कहते थे। काशी को विद्या का गौरवपूर्ण स्थान माना गया है। देवनगर काशी में इस लिपि के प्रचार के कारण इसे देवनागरी कहा गया।

डॉ धीरेंद्र वर्मा के अनुसार- मध्य युग में स्थापत्य की एक शैली थी नागर, जिसमें चतुर्भुजी आकृतियाँ होती थी। नागरी लिपि में चतुर्भुजी अक्षरों के कारण इसे नागरिक कहा गया।

अतः इस प्रकार माना जा सकता है की नगरों में अधिक प्रचलित होने के कारण तथा देव भाषा से संबंध होने के कारण इसे नागरी अथवा देवनागरी कहा गया।

विकाससंपादित करें

देवनागरी लिपि का उद्भव आठवीं नौवीं शताब्दी के आसपास कुटिल लिपि से हुआ था। उत्तर भारत में इसका प्रसार 9 वीं शताब्दी के अंत में मिलता है। दक्षिण में राष्ट्रकूट राजा दंती दुर्ग के शामगढ़ से प्राप्त दान पत्र की लिपि नागरिक हीं है। बड़ौदा के राजा ध्रुव राज ने नौवीं शताब्दी में इसी लिपि का प्रयोग किया।

उत्तर भारत में प्राचीन नागरी का सबसे प्राचीन रूप कन्नौज के राजा महेंद्र पाल के दान पत्र में मिलता है। इसलिए 12वीं शताब्दी तक प्राचीन नागरी वर्तमान नागरी बन पाई। गौरीशंकर हीराचंद ओझा का कथन है 10 वीं शताब्दी की उत्तरी भारत वर्ष की नागरी लिपि में और कुटिल लिपि में समानता मिलती है। और उस समय भारत में अनेक राजाओं ने अपने राज्यकारों के संपादन के लिए नागरी को हीं अपना आधार बनाया।

आठवीं नौवीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी तक उत्तर दक्षिण भारत में अनेक राजाओं ने अपने राज्य में कार्यों के संपादन के लिए नागरी लिपि को हीं आधार बनाया। नागरी में कार्य संपादन करने वालों मैं मारवाड़ के परिहार राजा, मेवाड़ के मुहीवंशी राठौर और गुजरात के सोलंकी राजाओं का विशेष महत्व है। ये अपने आदेश नागरी में ही निकालते थे। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में खुदाई अभियान में अनेक ताम्रपत्र, हस्तलेख, पांडुलिपियां उपलब्ध हुई हैं , जिनमें नागरी लिपि का ही प्रयोग किया गया है।

आधुनिक काल में नागरी लिपि समस्त हिंदी भाषी प्रदेशों में और भारत के कुछ अन्य प्रांतों में भी प्रयुक्त की जाती है। 10 वीं शताब्दी में नागरी के कई वर्ण आधुनिक वर्णो से भिन्न थे परंतु 12वीं 13वीं शताब्दी में इनका रूप स्थिर हो गया जो थोड़े बहुत अंतर के साथ आज तक प्रचलित हैं।