हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/सूफी काव्य

सूफी काव्यधारा या प्रेमाश्रयी काव्यधारा की काव्यगत विशेषताएँ

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हिन्दी साहित्य में सूफी काव्य परंपरा का समय लगभग १४वीं सदी से १८वीं सदी तक माना जा सकता है। इस परंपरा का सूत्रपात १३७९ ई. में मुल्ला दाउद के 'चंदायन' से होता है। अन्य महत्त्वपूर्ण कवि जायसी हैं जिन्होंने 'पदमावत', 'अखरावट' और 'आखरी कलाम' की रचना की। अन्य कवि व उनकी रचनाएँ हैं - मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली), नूर मुहम्मद (अनुराग बाँसुरी) और कासिम शाह (हंसजवाहिर) आदि। इस धारा के साधक परमात्मा को प्रेमिका एवं बंदे को प्रेमी के रूप में परिकल्पित करते हैं। ये कवि खुदा के साथ भय का नहीं वरन् प्रेम का संबंध स्थापित करते हैं। इनका लक्ष्य 'मारिफत' यानी सिद्धावस्था है जिसमें साधक अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर देता है। ये 'इश्कमज़ाज़ी' से 'इश्क़हक़ीक़ी' तक की यात्रा में विश्वास रखते हैं। भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा के अंतर्गत इस प्रेमाख्यान परंपरा में प्रेम तत्व सर्वोपरि है। सूफी कवियों ने अपनी भक्ति संबंधी भावनाओं को भारतीय घरों में प्रचलित प्रेमाख्यानों द्वारा अभिव्यक्त किया।

भावगत विशेषताएँ

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प्रेम की मूल्य के रूप में स्थापना
यूँ तो भक्तिकाव्य के मूल में ही प्रेम तत्व की प्रधानता है, किंतु भक्तिकाव्य के अंतर्गत सूफी परंपरा में मानवीय प्रेम को जीवन के आधारभूत मूल्य के रूप में स्थापित किया गया है। उनका अलौकिक प्रेम अर्थात् इश्कहकीकी, इश्कमज़ाज़ी (लौकिक) से शुरू होता है। इस प्रकार ईश्वर प्रेम से पहले वे मानव प्रेम की स्थापना करते हैं। सूफियों ने पुरुष को आत्मा व प्रियतमा को परमात्मा माना है और काँटों से भरे रास्ते पर चलते हुए परमात्मा से मिलन की कल्पना की है। इस प्रकार इनके अध्यात्म का सार मानव प्रेम है -

"मानुस प्रेम भएउ बैकुण्ठी, नाहिं ते काह छार एक मूँठी"।

सांस्कृतिक समन्वय का सूत्रपात
इस धारा के कवियों का दृष्टिकोण समन्वयवादी था। उन्होंने इस्लाम में प्रेम का समन्वय किया। उन्होंने भारतीय लोक कथाओं के माध्यम से सूफी दर्शन को व्यक्त किया। उन्होंने फारसी लिपि में अवधी भाषा का समन्वय किया। भारत में प्रचलित प्रबंध काव्य परंपरा को मसनवी शैली से समन्वित किया। 'जायसी' पर चर्चा करते हुए विजयदेवनारायण साही ने मसनवी शैली को चौपाई और दोहा को मिश्रित शैली के रूप में पढ़ने पर जोर दिया है। सूफी काव्यधारा के प्रायः सभी कवि मुसलमान थे किन्तु उन्होंने हिंदू घरों की लोककथाओं को अपने काव्य का विषय बनाया। हिंदू समाज में अनेक प्रकार की रूढ़ियों, उत्सवों, तीर्थ-व्रतों, जादू-टोनों का प्रचलन था, इन सबकी स्पष्ट झाँकी उनके प्रेम काव्यों में मिल जाती हैं।
भावनात्मक रहस्यवाद
रहस्यवाद के मूल में 'अज्ञात के प्रति जिज्ञासा' का भाव है। भावनात्मक रहस्यवाद में यही जिज्ञासा अज्ञात प्रिय के प्रति होती है। इस धारा के कवियों का प्रेम भी अमूर्त ईश्वर के प्रति होने के कारण रहस्यवादी हो गया। यह रहस्यवाद अद्वितीय भावुकता, प्रेम और सरसता से युक्त है। इसमें साधक को 'बंदा' तथा प्रेमिका को 'खुदा' के रूप में देखा गया है। प्रेमिका के ईश्वरीय सौंदर्य का आभास मिलते ही ऐसा प्रभाव पड़ता है -

"नयन जो देखा कँवल भा, निरमल नीर सरीर।
हँसत जो देखा हंस भा, दसन जोति नग हीर।।"

भावनात्मक रहस्यवाद की प्रमुखता के बीच साधनात्मक रहस्यवाद की भी झलक दिखाई पड़ती है जब वे कहते हैं - "नौ पौरी पर दसम दुआरा, तापर बाज राज घरियारा।" इस प्रकार देखा जाय तो इनमें साधनात्मक और भावनात्मक दोनों ही तरह की रहस्यानुभूतियों के दर्शन होते हैं।

प्रकृति का रागात्मक चित्रण
सूफी काव्य परंपरा में प्रकृति का रागात्मक चित्रण किया गया है। उन्होंने अपने सुख-दुख की अनुभूति से प्रकृति को जोड़ा। संवेदनात्मक चित्रण के अतिरिक्त प्रकृति आलंबन और उद्दीपन रूप में भी चित्रित हुई है। बारहमासा और षट्-ऋतु की अपूर्व छटा इन कवियों के काव्य में उपलब्ध होती है - 'फिरि फिरि रोव कोऊ नहिं डोला, आधी रात विहंगम बोला।'
विरह का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन
सूफी काव्य में आत्मा और परमात्मा के मध्य दूरी पीड़ा उत्पन्न करती है, कष्टपूर्ण व असहाय स्थितियों को जन्म देती है। अतः यहाँ विरह की अभिव्यक्ति कठोर उपमानों में हुई है जो ऊहात्मक, बीभत्स व कुरुचिपूर्ण लगने लगते हैं -

पिउ सो कहेउ संदेसड़ा, हे भौंरा, हे काग।
सो धनि बिरहे जरि मुई, तेहिंक धुआँ हम्ह लाग।।

गुरु की प्रतिष्ठा
इनके यहाँ गुरु निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति में रत साधक को उसकी मंजिल तक पहुँचाने वाला मार्गदर्शक है। शैतान (अर्थात माया) साधक की प्रेम साधना में अड़चन पैदा करता है और साधक का पथ भ्रष्ट करना चाहता है। शैतान के पंजे से मुक्त होने के लिए गुरु की शरण लेनी पड़ती है। यहाँ संत काव्य की तरह गुरु को मानव होना अनिवार्य नहीं है। वह मार्गदर्शक हैं और मार्गदर्शन का कार्य कोई पशु-पक्षी भी कर सकता है। जैसे पदमावत का तोता - 'गुरु सूवा जेहि पंथ देखावा, बिनु गुरु जगत को निर्गुण पावा।'

शिल्पगत विशेषताएँ

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काव्य रूप
प्रायः सभी प्रेमाख्यानक काव्य प्रबंधात्मक हैं। इन प्रबंधों में सूफियों ने भारतीय प्रेम कहानियों के कलेवर में सूफी सिद्धांतों को कुशलता से प्रस्तुत किया है। इनके काव्यों में परंपरागत प्रबंध रूढ़ियाँ भी विद्यमान हैं। इन्होंने भारतीय काव्य रूपों के अनुसार सर्गों की योजना का ध्यान नहीं रखा है। उनके स्थान पर वर्ण्य वस्तु संबंधी शीर्षकों की योजना की है। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इनके प्रबंधों की शैली मसनवी है जिसमें आरंभ में ईश्वर की वंदना, फिर शाहे वक्त या तत्कालीन राजा की प्रशंसा, उसके बाद गुरु की वंदना और बाद में काव्य वस्तु आती है। बाद में विजयदेवनारायण साही और गणपतिचंद्र गुप्त ने इस मत से असहमति व्यक्त करते हुए इसे भारतीय परंपरा का ही काव्यरूप माना।
भाषा
इसकी भाषा ठेठ अवधी है। भाषा मुहावरेदार है। इन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू, भोजपुरी एवं लोक भाषा के शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया है जो इनकी समन्वयात्मक दृष्टि का प्रतीक है -

"तुरकी, अरबी, हिंदुई, भाषा जेती आहि,
जहि महँ मारग प्रेम कर सबै सराहै ताहि।"

छंद
मुख्यतः दोहा और चौपाई छंदों को अपनाया गया है। पदमावत में सात अर्द्धालियों के बाद एक दोहा आता है। इन्होंने अरबी, फारसी के छंद नहीं अपनाए।
अलंकार
उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग किया गया है।
लोक कथाओं का प्रयोग
सूफी कवियों ने प्रायः भारतीय लोक कथाओं का प्रयोग अपने साहित्य में किया जो इनकी लोकवादी, सांस्कृतिक समन्वयात्मक दृष्टि का उत्कृष्ट प्रतीक है।

निर्गुण प्रेमाश्रयी काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

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  • सूफ़ी प्रेमाश्रयी धारा का काव्य प्रेम की पीर की अभिव्यंजना का काव्य है। इसमें परम सत्ता प्रेमिका और साधक प्रेमी की भूमिका में स्वीकार किए गए हैं।
  • इस धारा में रचित काव्य प्रतीकात्मक है। आशय यह कि कथा लोक (यथार्थ) के साथ अध्यात्म (कल्पना) की भी व्यंजना करती है।
  • इस धारा में रहस्यवाद की अभिव्यक्ति दोनों रूपों - साधनात्मक और भावनात्मक - में हुई है।
  • प्रेमाश्रयी काव्य प्रबंधात्मक है, मुक्तक नहीं।
  • इस धारा के प्रायः सभी रचयिता मुसलमान हैं। इस काव्यधारा की प्रकृति नितांत पंथनिरपेक्ष (सेकुलर) है।
  • इस काव्यधारा के कवियों की भाषा अवधी है।
  • इस काव्यधारा में मसनवी शैली का प्रयोग किया गया है। मसनवी शैली की विशेषता है कि काव्य के प्रारंभ में अल्लाह, हज़रत मुहम्मद, उनके चार मित्रों, गुरु और उस वक़्त के बादशाह की वंदना की जाती है।
  • कथा का विभाजन सर्गों में न होकर घटनाओं पर आधारित शीर्षकों में किया गया है।
  • विजयदेव नारायण साही मसनवी शैली की पारंपरिक परिभाषा से असहमत होते हुए उसे दोहे-चौपाई में निबद्ध शैली के तौर पर देखते हैं। उनके अनुसार पद्मावत भी मसनवी काव्य केवल इन अर्थों में है कि उसमें सात अर्द्धालियों के बाद एक दोहे का क्रम रखा गया है।
  • प्रेमाश्रयी काव्यधारा में विरह वर्णन (बारहमासा) और नख-शिख वर्णन उत्कृष्ट कोटि का है।
  • इन कवियों ने भारतीय लोक जीवन में प्रचलित कहानियों को अपनी रचनाओं का आधार बनाया है।