हिंदी साहित्य का विधागत इतिहास/हिन्दी व्यंग्य का इतिहास

व्यंग्य का जन्म अपने समय की विद्रूपताओं के भीतर से उपजे असंतोष से होता है। विद्वानों में इस बात पर मतभेद लगातार बना रहा है कि व्यंग्य को एक अलग विधा माना जाए या कि वह किसी भी विधा के भीतर ‘स्पिरिट’ के रूप में मौजूद रहे। दरअसल व्यंग्य एक माध्यम है जिसके द्वारा व्यंग्यकार जीवन की विसंगतियों, खोखलेपन और पाखंड को दुनिया के सामने उजागर करता है। जिनसे हम सब परिचित तो होते हैं किंतु उन स्थितियों को दूर करने, बदलने की कोशिश नहीं करते बल्कि बहुधा उन्हीं विद्रूपताओं-विसंगतियों के बीच जीने की, उनसे समझौता करने की आदत बना लेते हैं। व्यंग्यकार अपनी रचनाओं में ऐसे पात्रों और स्थितियों की योजना करता है जो इन अवांछित स्थितियों के प्रति पाठकों को सचेत करते हैं। जैसा कि ‘व्यंग्य’ नाम से ही स्पष्ट है, इस विधा में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण सीधे-सीधे (अभिधा में) न होकर परेक्षतः (व्यंजना के माध्यम से) होता है। इसीलिए व्यंग्य में मारक क्षमता अधिक होती है।

आरंभिक युग सम्पादन

हिंदी में संत-साहित्य से व्यंग्य का आरंभ माना जा सकता है। कबीर व्यंग्य के आदि प्रणेता हैं। उन्होंने मध्यकाल की सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रहार किया है। जाति-भेद, हिंदू-मुस्लमानों के धर्माडंबर, गरीबी-अमीरी, रूढ़िवादिता आदि पर कबीर के व्यंग्य बड़े मारक हैं।

‘जो तू बामन-बमनी जाया। आन द्वार काहे नहिं आया’।,
‘क्या तेरा साहिब बहरा है’,
‘कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांगि दे क्या बहरा हुआ खुदाय’

आदि अनेक उद्धरण कबीर की व्यंग्य-क्षमता के प्रमाण हैं। लेकिन उत्तर-मध्यकालीन सामंती समाज कबीर आदि संतों के समाज-बोध को समझ पाने में असफल रहा और पूरे रीतिकाल में व्यंग्य रचनाओं की उपस्थिति नगण्य रही। कबीर के बाद भारतेंदु ने सामाजिक विषमताओं के प्रति व्यंग्य को हथियार बनाया। अंग्रेज़ों के खिलाफ लिखते हुए वे कहते हैं, ‘‘होय मनुष्य क्यों भये, हम गुलाम वे भूप।’’ इस पंक्ति में औपनिवेशिक भारत की मूल समस्या हमें दिखाई देती है। पराधीन भारत की समस्याएँ वर्तमान भारत से अलग थीं। ‘अंधेर नगरी’ और ‘मुकरियों’ में गुलाम भारत की विडंबनापूर्ण परिस्थितियों, अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उनकी शोषक दृष्टि के प्रति आक्रोश को देखा जा सकता है। भारतेंदु-युग के अन्य महत्वपूर्ण व्यंग्यकार बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ और प्रतापनारायण मिश्र हैं। किंतु प्रेमघन की कृति ‘हास्यबिंदु’ और प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों में व्यंग्य सहायक प्रवृत्ति के रूप में मौजूद है। व्यंग्य इनकी रचनाओं में केंद्रीय भूमिका का निर्वहन नहीं करता है। व्यंग्य का पूर्ण उन्मेष इनके बाद के व्यंग्य रचनाकार बालमुकुंद गुप्त की रचनाओं में दिखाई देता है। ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ नामक अपनी प्रसिद्ध व्यंग्य लेखमाला में इन्होंने समसामयिक परिस्थितियों पर तीव्र व्यंग्य किए। राजनीति और तत्कालीन शासन-व्यवस्था से टकराव इनकी व्यंग्य रचनाओं की आधार सामग्री का काम करते हैं।

स्वतंत्रता-पूर्व युग सम्पादन

युगीन समस्याओं पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति प्रेमचंद में भी बहुत मिलती है। इन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में आम आदमी और कृषक वर्ग की दैनंदिन कठिनाइयों पर करारा व्यंग्य किया है। प्रेमचंद के बाद के रचनाकारों में निराला साहित्य में इसे देखा जा सकता है। इनकी ‘कुकुरमुत्ता’ आदि रचनाओं में व्यंग्य की अभिव्यक्ति विद्रूपता फैलाने वाले समाज के खिलाफ चुनौती के रूप में हुई है। इनके अलावा स्वतंत्रता-पूर्व के रचनाकारों में पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और रांगेय राघव का नाम भी लिया जा सकता है लेकिन इन लेखकों में व्यंग्य की वह धार नहीं है जो हमें भारतेंदु अथवा बालमुकुंद गुप्त की रचनाओं में दिखाई देती है।

स्वातंत्रयोत्तर युग सम्पादन

सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और देश की आज़ादी के साथ ही आम आदमी खुशहाली के सपने देखने लगा। लेकिन विपरीत परिस्थितियों और राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण आम आदमी के ये सपने पूरे नहीं हो सके। स्वतंत्रता के बाद भारत में समाज, राजनीति, धर्म, शिक्षा, आदि सभी क्षेत्रों में असंगतियाँ बढ़ी हैं। सामाजिक-नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आम आदमी के लिए शांतिपूर्वक जीवन जीने के अवसर कम हुए हैं। सत्य, सदाचरण, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा आदि शाश्वत मूल्यों का स्थान अनेक विसंगतियों ने ले लिया है। आजादी पूर्व देखे गए स्वप्न तो बीसवीं शताब्दी के छठे दशक तक आते-आते ही खण्डित हो गए। गुलाम भारत में होने वाले शोषण-अत्याचार आजादी के बाद कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गए। व्यक्ति और समाज की आंतरिक जटिलताओं के साथ-साथ अन्तर्विरोध भी बढ़े हैं। व्यक्ति निजी स्वार्थ तक सीमित होकर रह गया है। ये विसंगतियाँ और जटिलताएँ व्यंग्य के लिए आधारभूमि बनीं। स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य में व्यंग्य का पर्याप्त सृजन हुआ है। निरन्तर बढ़ती सामाजिक विषमताओं से विक्षुब्ध होकर करुणापूर्ण व्यंग्य लेखन की एक लम्बी परम्परा मिलती है। हरिशंकर परसाई इस परम्परा के प्रतिनिधि रचनाकार हैं।

परसाई की रचनाएं ‘आजाद भारत का सृजनात्मक इतिहास’ कही जा सकती हैं। इन रचनाओं का वर्तमान भारत की यथार्थ स्थितियों के संदर्भ में ही आकलन किया जा सकता है। सामान्य सामाजिक स्थितियों को परसाई ने वैचारिक चिन्तन से पुष्ट करके प्रस्तुत किया है। स्वतंत्र भारत के सकारात्मक-नकारात्मक सभी पहलुओं की परसाई ने बखूबी पड़ताल की है। परसाई की रचनाओं में उस पीड़ित भारत की छटपटाहट को महसूस किया जा सकता है जो शोषकों के तिलिस्म में कैद है। शोषक इस तिलिस्म को बनाए रखने के लिए तरह-तरह के छद्म करते हैं। इन छद्मों का खुलासा परसाई करते हैं। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सतर्क वैज्ञानिक दृष्टि के कारण परसाई छद्म के उन सभी रूपों को आसानी से पहचान लेते हैं जिन तक सामान्यतः रूढ़िवादी दृष्टि नहीं पहुँच पाती। परसाई का रचना संसार बहुत व्यापक है। निजी अनुभूतियों की निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति उनके व्यंग्य लेखन की विशिष्टता है। परसाई की सृजनशील दृष्टि निम्नवर्गीय सामान्य आदमी से प्रारम्भ होकर बहुराष्ट्रीय समस्याओं तक को अपने भीतर समेटती है। परसाई व्यंग्य के माध्यम से सृजन और संहार दोनों एक साथ करते हैं। परसाई का व्यंग्य जब शोषक वर्ग के प्रति होता है तो वह उस वर्ग के प्रति घृणा और आक्रोश उत्पन्न करता है लेकिन जब वही व्यंग्य अभावग्रस्त व्यक्ति पर होता है तो करुणा पैदा करता है।

परसाई के व्यंग्य लेखन की भाषा सप्रयास नहीं है। उनका मानना है कि समाज में रहने के कारण वह हमें अनुभव देता है और विषयानुरूप नई भाषा सिखाता है। यही कारण है कि परसाई की भाषा उनके कथ्य का अनुसरण करती हैं।

शरद जोशी भी परसाई की ही तरह एक अलग भाषाई तेवर के साथ व्यंग्य लेखन करते हैं। शिल्प की सजगता इनके व्यंग्य लेखन की विशेषता है। भाषा में वक्रता के द्वारा ये शब्दों और विशेषणों का विशिष्ट संयोजन करते हैं।

श्रीलाल शुक्लका नाम भी स्वातंत्रयोत्तर व्यंग्य लेखन में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इनके उपन्यास ‘रागदरबारी’ ने मोहभंग की स्थितियों के यथार्थ को सजीव रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। रवींद्रनाथ त्यागीका लेखन आत्म-व्यंग्य के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है। इनके लेखन को हम हास्य और व्यंग्य का संयोजन कह सकते हैं। यह न सिर्फ पाठक को प्रफुल्लित करता है बल्कि उसे सोचने के लिए बाध्य भी करता है।

लतीफ घोंघी के व्यंग्य में राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ को विषय बनाया गया है। इनके व्यंग्य में मारकता का अभाव है, किंतु इनका कथ्य बहुत व्यापक है। नारी-शोषण, कालाबाज़ारी, भुखमरी, शैक्षिक-साहित्यिक दुनिया की गड़बड़ियाँ आदि विषयों के साथ-साथ इन्होंने आम आदमी की दैनिक परेशानियों को अपने व्यंग्यों में स्थान दिया है। भाषा में उर्दू का पुट है।

सामाजिक मूल्यों के विघटन को केंद्र में रखकर समकालीन साहित्यिक परिदृष्य में व्यंग्य का लगातार सृजन हो रहा है। समकालीन व्यंग्य में ज्ञान चतुर्वेदी,सुशील सिद्धार्थ,नरेन्द्र कोहली,शंकर पुणतांबेकर,जवाहर चौधरी,सुभाष चंदर,यशवंत व्यास,प्रेम जनमेजय,हरीश नवल,अरविंद तिवारी का नाम लिया जा सकता है। सुशील सिद्धार्थ के पास कमाल की भाषा थी, जो समृद्ध भी है और बेहद पठनीय भी। 'नारद की चिंता' इसका सुंदर प्रमाण है। दक्षिण भारत के रचनाकारों में डॉ सुरेश कुमार मिश्रा की ‘उरतृप्त' सबसे बहुत प्रसिद्ध व्यंग्य रचना है। उनका 'एक तिनका इक्कावन आँखें' प्रसिद्ध व्यंग्य-संग्रह है। इसी में 'किताबों की अंतिम यात्रा' जैसी प्रसिद्ध व्यंग्य रचना भी शामिल है। डॉ सुरेश कुमार मिश्रा की 'उरतृप्त' के लिए तेलंगाना सरकार की हिंदी अकादमी ने उन्हें श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान से सम्मानित किया। समकालीन व्यंग्य रचनाकारों में सुरेश कांत, ज्ञान चतुर्वेदी, सुशील सिद्धार्थ, नरेंद्र कोहली, शंकर पुणतांबेकर, जवाहर चौधरी का नाम लिया जाता है। सुरेश कांत ने व्यंग्य-जगत को एक दर्जन से अधिक व्यंग्य-संकलनों के साथ-साथ 'ब से बैंक', 'अफसर गये विदेश' जैसे दो अदभुत व्यंग्य-उपन्यास दिये हैं। नरेंद्र कोहली ने अपनी व्यंग्य रचनाओं में नये प्रयोगों पर विशेष ध्यान दिया है। व्यंग्य को सामाजिक सतर्कता के हथियार के रूप में देखा जाता है। अन्य व्यंग्यकारों में डॉ सुरेश चंद्र खरे, के पी सक्सेना, माणिक वर्मा, यशवंत व्यास, सुभाष चंद्र, अरविंद तिवारी, अनूप मणि त्रिपाठी, डॉ संतोष त्रिवेदी, सुरजीत सिंह, निर्मल गुप्त, मलय जैन, शशिकांत सिंह शशि प्रमुख हैं। केशवचंद्र वर्मा, भीमसेन त्यागी, रवींद्रनाथ त्यागी और सूर्यबाला ने (या इलाही ये माजरा क्या है) व्यंग्य विधा को समृद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया है।

व्यंग्य आलोचना सम्पादन

हिंदी व्यंग आलोचना परम्परा में सबसे पहले जी.पी श्रीवास्तव का नाम लिया जाता है जिन्होंने हास्य व्यंग्य आलोचना की प्रारंभिक अवधारणाएं हमारे सामने प्रस्तुत की इसके बाद डॉ श्यामसुंदर घोष, डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी, डॉ शेरजंग गर्ग, डॉ. शंकर पुताम्बेकर, बालेंद्र शेखर तिवारी, नंदलाल, डॉ. सुरेश महेश्वरी, डॉ. हरिशंकर दुबे, डॉ. भगवान दास काहार, बापूराव देसाई, डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा,सुभाष चंदर , मधुसूधन पाटिल, डॉ रमेश तिवारी, प्रेम जन्मेजय,गौतम सान्याल इत्यादि ने व्यंग्य आलोचना में मुख्य भूमिका निभाई है। मुख्यधारा के आलोचकों में डॉ. धनंजय, डॉ मलय इत्यादि आलोचकों भी समय के लिए सक्रिय होकर व्यंग्य आलोचना को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से समृद्ध किया है।