हिन्दी कविता (मध्यकाल और आधुनिक काल) सहायिका/'उनको प्रणाम' कविता की काव्य संवेदना

           उनको प्रणाम 

पृष्ठभूमि


प्रस्तुत कविता प्रगतिवाद के कवि बाबा नागार्जुन दुआरा रचित है। इस कविता के माध्यम से कवि उन सभी लोगों को प्रणाम कर रहे हैं जिन्होंने अपने कर्मशील से पूरे देश समाज में अपने आतुलनिए सेवाएं दी जिनका कर्म धर्म ही देश और समाज के लिए बना रहा। उनके सेवाओं को और उनको कवि प्रणाम कर रहे है। बाबा नागर्जुन केवल प्रगतिवाद के ही नही छायावादी कवि भी है। इन्होने अपनी कविताओं से पूरे जन समाज को जागरूकता के और देश दिखाए ।ठीक उसी प्रकार उनके दुआरा रचित उनको प्रणाम कविता में उन्होंने उनका आदर प्रदशीत करते हुए समाज को जागरूक करने का प्रयास किया है ।


जो नही हो सके पूर्ण काम ............... उनको प्रणाम।


में उन सभी व्यक्तियों को प्रणाम करता हूं जिन्होंने मन्न में उत्साह भर कर कार्य को शुरू तो किया परन्तु उसे उस के अंजाम तक ना पहुंच सके जिन्होंने कार्य की शुरुआत तो की पर उसे अंत तक ना पहुंच सके। में उन सभी लोगों को प्रणाम करता हूं।

में उन वीरों को प्रणाम करता हूं जिन के अभीनंत्रीत तीर हुए। जो तीरो के समाप्त होने से पहले ही समाप्त हो गए।उन शूरवीरों के मन में कुछ कर दिखाने वाले जस्बे का सामान करके उनको प्रणाम करता हूं। 

उन शूरवीरों का अभिनन्दन करता हूं। जो व्यक्ति मन में अपनी छोटी सी नाब लेे कर बीच समुन्दर में अपने जीवन को लेे कर उतरे। किन्तु उन के ये इच्छा मन की मन में ही रह गई और खुद उसी समुन्द्र में समा गए।में उन सभी लोगों को प्रणाम करता हूं। में उन लोगो को भी प्रणाम करता हूं।

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े मन में एक उत्साह ओर आशा भरे पर कुछ व्यक्ति ने तो वहीं ले ली हीम समाधि।और कुछ आसफल ही मन में निराशा ले कर नीचे उतरे। में उनको प्रणाम करता हूं। में उनके मनोबल को प्रणाम करता हूं। चाहे कार्य में सफलता मिली हो या असफलता परन्तु उनके कार्य को पूरा कर दिखाने के मनोबल को में प्रणाम करता हूं।


'एकाकी और आकींचन ............. उनको प्रणाम।


में उन लोगो को भी प्रणाम करता हूं। जो पूरी निष्ठा और भावना से प्रथ्वी की परिक्रमा करने निकले जिनके पद के निशान कदम कदम पर नजर आते थे । जिनके रक्त से पूरी प्रथ्वी भीग गया था । आज वही निशान हम सभी की नज़रों से ओझल हो गए है। जिनके निशान पूरी तरह विलुप्त हो गए हैं। में उनको प्रणाम करता हूं।

में ऐसे लोगो को भी प्रणाम करता हूं।जो अपने किए गए महेतपुर कार्य से भी सफल नहीं हो पाए जो देश के आजादी के लिए फांसी पर गए झुल। उनके किए गए इस बलिदान को ज्यादा समय भी नहीं हुआ और ये दुनिया गए जिनको भूल। कवि यहां उन्हीं लोगो को प्रणाम कर रहे है जिन्हे अभी ज्यादा समय भी नहीं हुआ है और दुनिया उन्हें इतनी जल्दी भूल गई है। में उन्हीं सब को याद करके उन्हें प्रणाम करता हूं। जिन माह वीर्रो ने अपने देश की स्वतंत्रता के खातिर जिन्होंने अपने जान को देश के एक नए सबेरे के लिए न्योछावर कर दिया। ऐसे माहन व्यक्तियों को ये दुनिया इतनी जल्दी भूल गई। उनको याद करके कवि उन्हें प्रणाम करते हैं।


थी उग्र साधना पर जिनका ............... उनको प्रणाम।


कवि ऐसे लोगो को भी प्रणाम करते हैं जिन्होंने अपने सुखो की चिंता ना कर के अपने मित्र अपने परिवार की प्रभा ना कर के । मृत्यु को अपना कर कठिन रास्ते पर निकले। अपने ह्रदय में एक लक्ष्य ले कर अपनी राह पर नीकल गए बिना कोई परीणाम सोचे। जीवन कब कैसे व्यक्ति को मृत्यु प्राप्त हो इसका किसी को कोई भी अंदाजा नहीं है। चाहे वह राजा हो या एक मामूली कर्मचारी सब को मीटी में ही दफन होना है । इसी प्रकार देश की रक्षा करने वाला राजा से ले कर कर्मचारी के बलिदान को उनके जस्बे को उनकी कभी खत्म ना होने वाली शक्ति को कवि पूरे आदर के साथ प्रणाम करते हैं।

कवि उन माहान लोगो को भी प्रणाम करता है । जिन्होंने देश के प्रति अपनी आतुलनिए सेवाएं दी पूरी निष्ठा और भाबना मेहतवपूण कार्य किए अपने देश के प्रति। जो प्रसार से दूर रहे और पुरस्कार के भवना से दूर रहे । और जिनकी सेवाएं थी आतुलनए ओर विज्ञापन से रहे दूर। पूरी निष्ठा और भावना ने से देश और समाज के प्रति अपने जस्बे को दीखाया जो अपनी आखरी सांस तक दुश्मनों के सामने दत के खड़े रहे । सब के वाबजूद भी दुश्मनों के मनोरथ चुर चूर कर दिए। में ऐसे महान इंसानों को प्रणाम करता हूं।।