हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )/राष्ट्रीय नवजागरण की परंपरा और 1857 की राज्य क्रांति

हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )
 ← हिन्दी नवजागरण में बंगाल का योगदान राष्ट्रीय नवजागरण की परंपरा और 1857 की राज्य क्रांति भारतेन्दु हरिश्चंद्र एवं उनका मण्डल: साहित्यिक योगदान → 

राष्ट्रीय नवजागरण की परंपरा

सम्पादन

जिस प्रकार यूरोपीय नवजागरण इटली से होते हुए फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इंग्लैंड आदि देशों में फैला, ठीक उसी प्रकार भारतीय नवजागरण बंगाल से होते हुए महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिणी भारत तथा हिन्दी प्रदेश आदि क्षेत्रों में फैला । भारतीय विचारकों ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर आधुनिक काल तक के सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक सुधार कार्य को नवजागरण की संज्ञा दी । भारतीय नवजागरण का संबंध वस्तुतः अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज, राष्ट्र और स्वाधीनता आंदोलन के साथ जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय अस्मिता के सन्दर्भ में अगर यूरोप की तुलना भारत से की जाए तो हम देखेंगे उस समय यूरोपीय देश किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं था । जबकि भारत पर विदेशी शासकों का आधिपत्य था । भारतीय नवजागरण की कड़ी में राष्ट्रीयता और देशप्रेम एक प्रमुख प्रेरक तत्व के रूप में विद्यमान है। भारत में नवजागरण संबंधी चेतना ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने और समाज में फैल हुए अंधविश्वास एवं रुढ़िवाद के विरोध में शुरू हुआ ।

भारत में यह ऐसी चेतना पंद्रहवीं शताब्दी में भी देखी गई थी, जब इस्लाम के आगमन,और समाज में फैल हुए अंधविश्वास,रुढ़िवाद, शोषण तथा अत्याचार के विरोध में जनआंदोलन (भक्तिआंदोलन) की शुरूआत हुई। जिसके फलस्वरूप हमें कबीर, जायसी, तुलसी, सुरदास, गुरू नानक, चैतन्य महाप्रभु जैसे समाज सुधारक और कवि दिखते है। जिन्होनें सति प्रथा, कुरीति, पाखण्ड, आडम्बर, सामंती विचारों की जड़े हिला दी थी। इस चेतना के द्वारा केवल भक्त कवि ही नहीं ब्लकि ताज(हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास-पृष्ठ-१५१), मीरा जैसी भक्त कवयित्री भी दिखाई दी। जिन्होनें सामंती सोच और स्त्रियों पर लगे परम्परा के बन्धन को तोड़ने का प्रयास किया।

"राम स्वरूप चतुर्वेदी" मानते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी की जागृति इस्लाम के आगमन और उसके सांस्कृतिक मेल जोल से उत्पन्न हुई और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान ब्रिटिश के आगमन और दो संस्कृति के मेल से एक रचनात्मक उर्जा जन्मी। आरम्भ में इस चेतना को समीक्षक नवोत्थान, प्रबोधन, रिनेसांस, पुनरूत्थान आदि कई नामों से पुकारते थे, किन्तु 1977 में रामविलास जी की पुस्तक "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण" में तथ्यों एवं तर्को द्वारा इसे "नवजागरण" कहा और उसके बाद सभी ने उन्नीसवीं शताब्दी को नवजागरण और भक्तिकाल को लोकजागरण नाम से स्वीकार कर लिया।

19वीं शताब्दी के दौरान राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, देवेंद्रनाथ ठाकुर, केशवचंद्र सेन, महादेव गोविंद रानाडे, ज्योतिबा फुले, नारायण स्वामी, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, देवेंद्रनाथ टैगोर और रविंद्रनाथ टैगोर जैसे रचनाकारों तथा समाज सुधारकों ने अपनी रचनाओं तथा स्थापित स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा लोगों को जागृत किया और नवजागरण की चेतना को पूरे भारत में फैलाया।


1857 की राज्य क्रांति

सम्पादन

सन् 1857 क्रांति का हिंदी साहित्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। रामविलास शर्मा ने इसे हिंदी नवजागरण का प्रथम चरण घोषित किया। 1857 की क्रांति की तीव्र अभिव्यक्ति लोकगीतों एवं पत्र-पत्रिकाओं में हुई है। इसका तत्काल प्रतिफलन साहित्य के क्षेत्र में इस रूप में नहीं हुआ जी से रूप में होना चाहिए। किन्तु बाद के वर्षों में 1857 को केंद्र में रखकर ढेर सारा साहित्य लिखा गया।

रमेशचंद्र मजूमदार कहते हैं - इस क्रांति में जनता की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी। अमीर-गरीब, उच्चवर्ण-निम्नवर्ण, हिंदू मुसलमान सभी ने मिलकर भाग लिया था। विदेशी सत्ता को बाहर निकालने के राजनीतिक उद्देश्य के साथ-साथ अन्य सामाजिक उद्देश्य भी जुड़ गए। इस संघर्ष में सभी तबकों की भागीदारी तात्कालिक प्रक्रिया ना होकर व्यापक उद्देश्य के लिए थी।

रामविलास शर्मा के शब्दों में - क्रांति का मूल कारण‌ अंग्रेजों की भूमि व्यवस्था, उनका शोषण और लूट, उनकी न्याय व्यवस्था थी। इस व्यवस्था से उत्पन्न क्षोभ‌ ही जनता को एक कर रहा था।

विशेषताएं

सम्पादन
  1. स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व उन किसानों ने किया जो फौज में सिपाहियों और सूबेदारों के रूप में काम कर रहे थे। अनेक छोटे-बड़े सामन्त इनके सहायक थे, संग्राम के नेता नहीं।
  2. इसकी एक विशेषता इसका असंप्रदायिक राष्ट्रीय रूप है। धर्म तथा वर्ण व्यवस्था को ध्यान में न रखकर अनुभव और कार्यकुशलता के आधार पर भारतीय सेना ने अपनी समिति गठित की।
  3. सैनिक नेतृत्व में दिल्ली के बादशाह को वही दर्जा दिया गया था जो ब्रिटेन में वहां के बादशाह को हासिल था। वह राजतंत्र में मुखिया बनाया गया था पर आर्थिक, राजनीतिक, और सैनिक आधार पर उस 'कोर्ट' के हाथ में था, जिसमें भारतीय सेना के चुने हुए प्रतिनिधि थे।
  4. गदर के इश्तहारों में एक बात पर बार-बार जोर दिया गया था कि अंग्रेजों की बातों का भरोसा ना करें। इश्तहारों में अंग्रेजी राज के अंतर्गत किसानों, जमींदारों, व्यापारियों आदि की स्थिति का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया तथा यह भी दिखाया गया कि भूखमरी भारतीय अर्थतंत्र की विशेषता बन गई है।
  5. 1857 की क्रांति हमारा जातीय संग्राम था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जितने लोकगीत विभिन्न जनपदों में हमारे यहां रचे गए, उतने अन्य प्रदेशों में कुल मिलाकर भी नहीं रचे गए।


भारतेंदु युग का साहित्य व्यापक स्तर पर गदर से प्रभावित है। इसका पहला प्रमाण यह है कि इस साहित्य में किसानों को लक्ष्य करके उन्हें संगठित और आंदोलित करने की दृष्टि से जितना गद्य पद्य में लिखा गया है, उतना दूसरी भारतीय भाषाओं में नहीं लिखा गया है। गदर के केवल 10 साल बाद 1868 में भारतेंदु जी ने कवि-वचन-सुधानाम की पत्रिका निकाली।

भारतेंदु जी ने अंग्रेजी राज की तारीफ करते हुए गदर के बारे में लिखा -

"कठिन सिपाही द्रोह अनल जा जल बस नासी

जिन भय सिर न हिलाय सकत कहो भारतवासी।"

गदर के बारे में खुलकर कहना संभव ना था, उसकी स्मृति इसी तरह सुरक्षित रखी जा सकती थी।