कार्यालयी हिंदी/कार्यालयी हिंदी का स्वरूप, उद्देश्य और क्षेत्र

पाठ-1

          "कार्यालयी हिंदी"
        'स्वरुप, उद्देश्य, क्षेत्र'

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और 'भाषा' समाज के सदस्यों के बीच संपर्क एवं संवाद का माध्यम बनती है। बिना संपर्क और संवाद के कोई भी समाज जीवंत नहीं माना जा सकता अर्थात् बिना भाषा के किसी भी समाज का अस्तित्व संभव ही नहीं है। जिस प्रकार मनुष्य को खाने के लिए अन्न, पीने के लिए पानी, पहनने के लिए कपड़े की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आपस में सम्पर्क और संबंध बनाए रखने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है। भाषा से ही मनुष्य अपना जीवन सुगम बनाता है।

वर्षों की यात्रा के पश्चात् भाषा में निरन्तर परिवर्तन होते रहे हैं और भाषा का महत्त्व भी लगातार बढ़ता गया है। समाज के बीच संवाद-सम्प्रेषण और संबंध स्थापन भाषा का प्राथमिक कार्य है, किन्तु भाषा समाज की एक सीधी और सरल रेखा में चलने वाली इकाई नहीं है । समाज तथा इसके सदस्यों के अस्तित्व और चरित्र के अनेक आयाम होते हैं और इन सभी आयामों के संदर्भ में भाषा की विशिष्ट भूमिका होती है।

भारत में विभिन्न भाषाओं में संवाद होता है। इन सभी भाषाओं की अपनी एक यात्रा रही है लेकिन भारतीय समाज की सम्पर्क भाषा 'हिन्दी' ने जहाँ वैदिक संस्कृत से यात्रा करते हुए आधुनिक हिन्दी का स्वरूप ग्रहण किया है वह एक सामाजिक क्रिया का आधार है। समाज निरन्तर अपने विकास के साथ-साथ भाषाओं का भी विकास करता है। समाज में होने वाले परिवर्तन की तरह ही उसकी अपनी भाषा में भी कभी स्थैर्य नहीं रहा। इसीलिए निरन्तर परिवर्तनों की धार पर चलकर हिन्दी अपने अनेक रूपों के साथ वर्तमान में समाज के सम्मुख उपस्थित है। हिन्दी की प्रयोजनीयता के आधार पर उसके विभिन्न रूप इस प्रकार हैं-

1. साहित्यिक हिन्दी

2. कार्यालयी हिन्दी

3. व्यावसायिक हिन्दी

4. विधिपरक हिन्दी

5. जनसंचार के माध्यमों की हिन्दी

6. वैज्ञानिक और तकनीकी हिन्दी

7. सामाजिक हिन्दी

वैसे तो कार्यालयी हिन्दी अपने आप में एक व्यापक अर्थ की अभिव्यक्ति रखता है। चूँकि साहित्यिक क्षेत्र हो अथवा व्यावसायिक, पत्रकारिता का क्षेत्र हो ज विज्ञान और तकनीकी का क्षेत्... सभी क्षेत्रों से सम्बद्ध कार्यालयों में काम करने वाले व्यक्ति एक तरह से कार्यालयी हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। इसलिए कार्यालयी हिन्दी अपने-आप में व्यापक अर्थ की अभिव्यंजना रखती है।

     "कार्यालयी हिन्दी का अभिप्राय"

भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। अलग-अलग क्षेत्रों में भाषा का रूप भी बदलता है। दैनिक जीवन में मनुष्य अपने सम्प्रेषण के लिए जिस भाषा का प्रयोग करता है वह मौखिक व बोलचाल की भाषा होती है। वैसे तो भाषा के प्रत्येक रूप में मानकता का निर्वाह होना आवश्यक है लेकिन बोलचाल की भाषा में यदि मानकता का प्रयोग नहीं भी किया जाता तब भी वह सामाजिक जीवन में लगातार प्रयोग में अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त आधार रहती है। इसी तरह सांस्कृतिक संदर्भं में भाषा का रूप लोकगीतों में जिस प्रकार होता है वह मौखिक परम्परा के कारण मानकता का निर्वाह भले ही न करती हो लेकिन हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को संजोए रखने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी तरह साहित्यिक हिन्दी का स्वरूप जहाँ अपनी परिनिष्ठता के कारण अपनी अलग पहचान रखता है वहीं आंचलिक साहित्य में क्षेत्रीतया के प्रभाव के कारण साहित्यिक हिन्दी एक नए रूप में भी हमारे सामने आती है। इसलिए साहित्यिक हिन्दी का रूप भी पूर्णतः निर्धारित नहीं किया जा सकता।

वर्तमान दौर में तकनीकी के आगमन के बाद जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में हिन्दी का वर्चस्व तेजी से बढ़ने लगा है। जनसंचार के इन माध्यमों की हिन्दी सामान्य बोलचाल के निकट होती है। लेकिन मानकता की दृष्टि से वह भी नि्धारित मापदण्ड पर सही नहीं ठहरती। इसका कारण है कि जनसंचार का मुख्य उद्दश्य समाज के विशाल वर्ग तक सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की सूचना को सम्प्रेषण करना है और भारत जैसे विशाल राष्ट्र में सरल और सुबोध भाषा के द्वारा ही विशाल जनसमुदाय तक अभिव्यक्ति सम्भव हो सकती है। इसीलिए जनसंचार के माध्यमों में हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के शब्दों का व्यावहारिक प्रयोग उसे मानकता से परे करता है।

इन रूपों के अतिरिक्त व्यापार, वाणिज्य, विधि, खेल आदि अनेक क्षेत्रों में हिन्दी के रूप पारिभाषिक के साथ-साथ स्वतंत्र भी थे। इन क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट भाषा के कारण इसका प्रयोग सीमित रूप में ही किया जा सकता था। इन क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों में ही इस भाषा के अर्थ को समझने की क्षमता होती है। लेकिन इन क्षेत्रों में हिन्दी का मानकीकृत रूप ही स्वीकार्य होता है।

हिन्दी के इन विभिन्न रूपों और अनेक अन्य रूपों में भाषा का जो स्वरूप होता है वह कार्यालयी हिन्दी में प्रयुक्त नहीं होता। कार्यालयी हिन्दी इससे भिन्न पूर्णतः मानक एवं पारिभाषिक शब्दों को ग्रहण करके चलती है। कार्यालयी हिन्दी सामान्य रूप से वह हिन्दी है जिसका प्रयोग कार्यालयों के दैनिक कामकाज में व्यवहार में लिया जाता है। विभिन्न विद्वानों ने यह माना है कि चाहे वह किसी भी क्षेत्र का कार्यालय हो, उसमें प्रयोग में ली जाने वाली हिन्दी कार्यालयी हिन्दी ही कहलाती है। डॉ. डी.के. जैन का मत है कि-"वह हिन्दी जिसका दैनिक व्यवहार, पत्राचार, वाणिज्य, व्यापार, प्रशासन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, योग, संगीत, ज्योतिष, रसायनशास्त्र आदि क्षेत्रों में प्रयोग होता है, उसे कार्यालयी या कामकाजी हिन्दी कहा जाता है।" (प्रयोजनमूलक हिन्दी, पृष्ठ 9) इसी तरह डॉ. उषा तिवारी का मानना है कि "सरकारी कामकाज में प्रयुक्त होनें वाली भाषा को प्रशासनिक हिन्द्री या कार्यालयीन हिन्दी कहा जाता है। हिन्दी का वह स्वरूप जिसमें प्रशासन के काम में आने वाले शब्द, वाक्य अधिक प्रयोग में आते हों।

इनु दोनों परिभाषाओं में देखा जाए तो एक. परिभाषा कार्यालय के कार्यक्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत दिखाता है वहीं दूसरी परिभाषा में बह केवल सरकारी कार्यालयों में प्रयोग में ली जाने वाली भाषा ही है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यालयों की उपस्थित के कारण कार्यालय को किसी भी परिभाषा के वृत्त में समेटना बहुत कठिन कार्य है किन्तु प्रचलन की दृष्टि से कार्यालयी हिन्दी को सरकारी कार्यालयों में प्रयोग में ली जाने वाली भाषा के रूप में ही जाना है। इन सरकारी कार्यालयों में केन्द्र अथवा राज्य सरकारों के अपने अथवा उनके अधीनस्थ आने वाले विभिन्न मंत्रालय तथा उनके अधीन आने वाले संस्थान, विभाग अथवा उपविभाग एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों आदि को शामिल किया जाता है। सरकार का कोई भी कार्यालय, चाहे वह उसकी अधीनस्थ हो अथवा सम्बद्ध हो, वह सरकारी कार्यालय ही कहा जाएगा। इसलिए इन कार्यालयों के कामकाज में प्रयोग की जाने वाली हिन्दी को कार्यालयी हिन्दी का जाता है।

   "कार्यालयी हिन्दी का स्वरूप"

•सावैधनिक रूप से कार्यालयी हिन्दी के लिए 'राजभाषा हिन्दी' का प्रयोग किया जाता है। इसलिए कार्यालयी हिन्दी के उद्देश्य को समझने के लिए राजभाषा हिन्दी तथा उसके संवैधानिक प्रावधानों को जानना आवश्यक है। सामान्य नागरिक 'राजभाषा हिन्दी' को भ्रमवश राज्यों की हिन्दी मानते आए हैं। लेकिन राजभाषा का प्रयोग अंग्रेजी में 'Official Language' के रूप में किया जाता है। इसका तात्पर्य 'राज' की भाषा से है। 'राज की भाषा' से यहाँ अभिप्राय राज-काज की भाषा, प्रशासन की भाषा, सरकारी काम-काज की भाषा या कार्यालय की भाषा से है।

यह विदित ही है हिन्दी भाषा पिछले एक हजार वर्षों में भारत की प्रधान भाषा रही है। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने सबसे पहले राजकाज के लिए हिन्दी भाषा का ही प्रयोग किया था क्योंकि उस समय तक भारत की जनता अंग्रेजी नहीं जानती थी। लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा को वर्चस्व की भाषा बनाने तथा अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति आकर्षित करने के लिए सन् 1835 ई. में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शासन की भाषा के रूप में स्थापित किया। मैकाले की उस नीति का ही परिणाम रहा कि भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् राजभाषा के लिए हुई बैठक में हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का नाम भी चर्चा में रखा गया। लेकिन गांधी जी किसी भी तरह से अंग्रेजी के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने खुले तौर पर हिन्दी को राजभाषा बनाने का समर्थन किया। किन्तु अंग्रेज सरकार के पिट्ठू रहने वाले अनेक राजनीतिज्ञों ने भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी को भी रखा।

सन् 1947 में संविधान सभा के गठन के बाद से ही राजभाषा पर चर्चा की जाने लगी। उस समय हिन्दुस्तानी या अंग्रेजी में से किसी एक को राजकाज की भाषा बनाने पर बहस हुई। बाद में 'हिन्दुस्तानी' के स्थान पर 'हिन्दी' शब्द को रख दिया गया। किन्तु लम्बे समय तक चली बहसों के बाद आखिरकार 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को 'राजभाषा' के रूप में स्वीकार कर लिया गया। उसी दौरान उस प्रावधान में यह भी सम्मिलित कर दिया गया कि अंग्रेजी पन्द्रह वर्षों तक हिन्दी की सह-राजभाषा के रूप में काम करती रहेगी। लेकिन विभिन्न संशोधनों और आपसी असहमतियों के कारण संवैधानिक रूप से हिन्दी 'राजभाषा' होते हुए भी अंग्रेजी ही शासन व्यवस्था की भाषा बनी हुई है।

"भारतीय संविधान में राजभाषा सम्बन्धी प्रावधान" 14 सितम्बर, 1949 को भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। इन अनुच्छेदों को अध्यायों में विभाजित किया गया। उन संवैधानिक प्रावधानों को यथानुरूप यहाँ दिया जा रहा है

अध्याय-1

   "अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा"

1.संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।

2.खण्ड ( 1 ) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारम्भ से पन्द्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का • प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था। परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।

3.इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात् विधि द्वारा,

(क) भाषा का या

(ख) अंकों के देवनागरी रूप का

ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपवन्धित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाये।

"अनुच्छेद 344- राजभाषा के सम्बन्ध में आयोग और संसद की समिति" 1.राष्ट्रपति, इस संविधान के प्रारम्भ से पाँच वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात् ऐसे प्रारम्भ से दस वर्ष की समाप्ति पर, आदेश द्वारा एक आयोग गठित करेगा जो एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में उल्लिखित विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जिनको राष्ट्रपति नियुक्त करे और आदेश में आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।

2.आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को:-

(क) संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग;

(ख) संघ के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बन्धनों;

(ग) अनुच्छेद 348 में उल्लिखित सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा;

(घ) संघ के किसी एक या अधिक उल्लिखित प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाने वाले अंकों के रूप;

(ड) संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच पत्रदि की भाषा और उनके प्रयोग के सम्बन्ध में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को निर्देशित किए गए किसी अन्य विषय के बारे में सिफारिश करें।

3.खण्ड (2) के अधीन अपनी सिफारिशें करने में आयोग भ औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का और लोक सेवाओं के सम्बन्ध में भारत की अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तियों के न्यायसंगत दावों और हितों का सम्यक ध्यान रखेगा।

4. एक समिति गठित की जाएगी जो तीस सदस्यों से मिलकर बनेगी जिनमें से बीस लोकसभा के सदस्य होंगे और दस राज्यसभा के सदस्य होंगे जो क्रमशः • लोकसभा के सदस्यों और राज्यसभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे।

5. समिति का कर्तव्य होगा कि वह खण्ड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशें की परीक्षा करे और राष्ट्रपति को उन पर अपनी राय के बारे में प्रतिवेदन दे।

6. अनुच्छेद 343 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति खण्ड (5) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् उस सम्पूर्ण प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निर्देश दे सकेगा। के

अध्याय-2 प्रादेशिक भाषाएँ "अनुच्छेद 345 राज्य की राजभाषा या राजभाषाएँ"

अनुच्छेद 346) और अनुच्छेद (347) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, हुए, किसी राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा, उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिन्दी को उस राज्य के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं के रूप में अंगीकार किया जा सकेगा। परन्तु जब तक राज्य का विधान-मण्डल, विधि द्वारा अन्यथा उपबन्ध न करे तब तक राज्य के भीतर उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था।

"अनुच्छेद 346 एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा"

संघ में शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने के लिए तत्समय प्राधिकृत भाषा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच तथा किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा होगी। परन्तु यदि दो या अधिक राज्य यह करार करते हैं कि उन राज्यों के बीच पत्रादि की राजभाषा हिन्दी भाषा होगी तो ऐसे पत्रादि के लिए उस भाषा का प्रयोग किया जा सकेगा।

"अनुच्छेद 347 किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली - जाने वाली भाषा के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध" यदि इस निमित्त मांग किए जाने पर राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वह निर्देश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिए, जो वह विनिर्दिष्ट करें, शासकी मान्यता दी जाए।

अध्याय 3 उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा "अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों,विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा"

1.इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा, उपबन्ध न करें तब तक:-

(क) उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी।

(ख)(i) संसद के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मण्डल के सदन या प्रत्येक सदन में पुनः स्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के, (ii) संसद या किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेशों के, और (iii) इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।

2.खण्ड (1) के उपखण्ड (क) के किसी बात की होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा। परन्तु इस खण्ड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होगी।

3.खण्ड (1) के उपखण्ड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान-मण्डल ने, उस विधान-मण्डल में पुनः स्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखण्ड के पैरा (पअ) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहीं उस • राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद उस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।


"अनुच्छेद 349 भाषा से सम्बन्धित कुछ विधियाँ, अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया"

इस संविधान के प्रारम्भ से पन्द्रह वर्ष की अवधि के दौरान, अनुच्छेद 348 के खण्ड (1) में उल्लिखित किसी प्रयोजन के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए उपबन्ध करने वाला कोई विधेयक या संशोधन संसद के किसी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुनः स्थापित या प्रस्तावित नहीं किया जाएगा और राष्ट्रपति किसी ऐसे विधेयक को पुनः स्थापित या किसी ऐसे संशोधन को प्रस्तावित किए जाने की मंजूरी अनुच्छेद 344 के खण्ड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशों पर और उस अनुच्छेद के खण्ड (1) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात ही देगा, अन्यथा नहीं।


अध्याय-4 विशेष निर्देश - "अनुच्छेद 350 व्यथा के निवारण के लिए अध्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा"

प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, यथास्थिति, संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभ्यावेदन देने का हकदार होगा।

"अनुच्छेद 350 (क) प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं"

प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा और राष्ट्रपति किसी राज्य को ऐसे निर्देश दे सकेगा जो वह ऐसी सुविधाओं का उपबन्ध सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक या उचित समझता है।

"अनुच्छेद 350 (ख) भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष अधिकारी"

1.भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए एक विशेष अधिकारी होगा जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करेगा। 2.विशेष अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह इस संविधान के अधीन भाषायी अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए उपबन्धित रक्षोपायों से सम्बन्धित सभी विषयों का अन्वेषण करे और उन विषयों के सम्बन्ध में ऐसे अन्तरालों पर जो राष्ट्रपति निर्दिष्ट करें, राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दे और राष्ट्रपति ऐसे सभी प्रतिवेदनों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा और सम्बन्धित राज्यों की सरकारों को भिजवाएगा।


"अनुच्छेद 351 हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश"

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विर्निदिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। " उपर्युक्त प्रावधानों के अतिरिक्त अनुच्छेद 120 में 'संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा' के सम्बन्ध में निर्देश दिया गया कि संसद में कार्य हिन्दी या अंग्रेजी में किया • जाएगा। किन्तु राज्यसभा का सभापति या लोकसभा का अध्यक्ष अथवा ऐसे रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को जो हिन्दी या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, अपनी मातृभाषा में सदन को सम्बोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा। इसी तरह अनुच्छेद 210 के द्वारा विधान मण्डल में प्रयुक्त होने वाली भाषा के सम्बन्ध में निर्देश देते हुए लिखा गया है कि राज्य के विधान मण्डल अपना कार्य राज्य की भाषा या भाषाओं में या हिन्दी अथवा अंग्रेजी में कर सकेंगे। समय-समय पर अनेक अनुच्छेदों तथा उपबन्धों द्वारा कार्यालयी हिन्दी के समुचित प्रयोग के सम्बन्ध में भी सरकार द्वारा दिशा निर्देश जारी किए गए। जिससे हिन्दी को कार्यलय में प्रयोग की भाषा बनाया जा सके।

   "कार्यालयी हिन्दी का उद्देश्य"

भारत चूँकि एक विशाल राष्ट्र है जिसकी अधिकांश जनता हिन्दी भाषी है और शासन के साथ उसका सीधा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी से बेहतर कोई भाषा हो ही नहीं सकती। इसलिए यह आवश्यक था दि • स्वतंत्रता के पश्चात् से ही शासन और समाज के बीच 'एक भाषा' द्वारा समन्या स्थापित किया जा सके। इसलिए राजभाषा के रूप में हिन्दी भाषा को रखना और राजभाषा प्रावधानों के अनुसार अन्य क्षेत्रों में भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार द्वारा उसे राष्ट्रीय और वैश्विक बनाना इसका वास्तविक उद्देश्य रहा। लेकिन राजभाषा सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधानों में अनेक उपबन्धों द्वारा अंग्रेजी को पन्द्रह वर्षों और उसके उपरान्त निरन्तर सह-राजभाषा बनाए रखना हिन्दी के लिए अहितकारी हुआ।

● भारत की अधिकांश जनता गांवों में बसती है और ग्रामीण प्रदेशों में हिन्दी को । वह विभिन्न बोलियाँ वहाँ की बोलचाल की भाषा के रूप में अभिव्यक्ति का आधार बनती हैं। लेकिन इन्हीं क्षेत्रों में एक ऐसा तबका भी है जो अभी तक अशिक्षित है। हिन्दी बोल और समझ तो सकता है, उसका मौखिक प्रयोग भी कर सकता है लेकिन उसके लिए रोजगार का महत्त्व अन्य चीजों से अधिक है। ऐसे में राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों को बनाते हुए हिन्दी के प्रचार-प्रसार की दिशा में यह भी निर्दिष्ट किया गया कि भारत के सभी भाषा-भाषी लोगों को हिन्दी पढ़ना लिखना सिखाया जा सके। लेकिन अनेक भाषाओं का राष्ट्र होने के कारण और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते हिन्दी राजभाषा तो बन गई किन्तु उसे अभी तक वह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका जो वास्तव में किसी एक राष्ट्र की प्रधान भाषा को मिलना चाहिए।

वास्तव में राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित करने के पीछे आरम्भिक उद्देश्य भी यही था कि भारत के सभी शासकीय कार्य 'कार्यालयी हिन्दी' के माध्यम से इसलिए किए जायें जिससे भारत की अधिकांश जनता शासन द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णयों से परिचित हो सके। इन नीतिगत निर्णयों का सम्बन्ध सीधे-सीधे आम सामाजिक से होता है। ऐसे में आम सामाजिक तक यदि सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों की जानकारी पूर्ण रूप से न पहुँच सके तो आम सामाजिक शासन की सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाएगा। सरकार का कार्य समाज और सामाजिकों का विकास करना है। वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान अभी तक विकासशील राष्ट्र के रूप में ही है और विश्व के कई ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या भारत के एक छोटे से राज्य की जनसंख्या से भी बहुत कम है, किन्तु वे राष्ट्र विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में रखे जाते हैं। उन राष्ट्रों ने अपनी राष्ट्र की प्रधान भाषा को ही अपने काम-काज की भाषा में प्रयोग में लिया, जिससे वहाँ का शासन-तंत्र एक ओर तो सामाजिकों से सीधे संवाद कर पाने में सक्षम हुआ वहीं दूसरी ओर सामाजिक भी अपनी भाषा में ही सरकार द्वारा बनाए गए नियमों और प्रावधानों को सहजता से समझ पाने से अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए।

भारत में इसके विपरीत स्थिति आज तक बनी हुई है। ऐसे राज्यों में जहाँ उस राज्य की कार्यालयी भाषा हिन्दी है वहाँ भी अभी तक उच्च पदों पर अंग्रेजी मानसिकता वाले लोगों का आधिपत्य है। ऐसे में न तो वे अपने अधिकारों को जान पाते हैं और न हीं शासन से सीधा संवाद कर पाते हैं।

इतना ही नहीं, भारत के न्यायालयों को अंग्रेजी में कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में विधि के क्षेत्र में हिन्दी की जितनी उपेक्षा की गई उतनी किसी अन्य क्षेत्र में नहीं। अधिकांश न्यायालयों में प्रस्तुत किए जाने वाद और होने वाली बहसें आज भी अंग्रेजी में होती है। अपने-अपने वाद के • सम्बन्ध में वादी या प्रतिवादी को यह भी नहीं पता चल पाता कि न्यायालय में प्रस्तुत उसके बाद को अधिवक्ता (वकील) द्वारा कितनी मजबूती से प्रस्तुत किया है और उसने उस वाद को उसके पक्ष में प्रस्तुत किया भी है अथवा नहीं यह भी विचार का विषय हो सकता है। ऐसे में न्यायालयों में यदि काम-काज की भाषा हिन्दी होती तो निश्चित रूप से समाज के आम नागरिक को अपने वाद के समय अपने अधिवक्ताओं द्वारा रखे जाने वाले तर्कों की जानकारी पूर्ण रूप से मिल सकती और वह अपने लिए उचित न्याय की आशा कर सकता। इसीलिए कार्यालयी हिन्दी का यह भी उद्देश्य होता है कि वह आम सामाजिक के साथ होने वाले अन्याय को रोक सके और उसे न्याय दिला पाने में समर्थ हो ।

• जिस समय राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों को रखा गया था उस समय उसमें यह भी सुनिश्चित किया गया कि जहाँ भी राजभाषा हिन्दी में कार्य करते हुए कर्मचारी को परेशानी का सामना करना पड़े वहाँ अंग्रेजी के शब्दों को यथावत् देवनागरी में लिख सकता है। चूँकि प्रशासन की अपनी सुनिश्चित शब्दावली होती है ऐसे में अंग्रेजी के अनेक शब्दों का अनुवाद सम्भव ही नहीं हो सकता। इसीलिए उन शब्दों के स्थान पर किसी अन्य शब्द की अपेक्षाकृत अंग्रेजी के शब्द को देवनागरी में लिप्यंतरित कर उसका प्रयोग किया जा सकता है जिससे सामान्य व्यक्ति उस पत्र के मंतव्य को समझ सके।

इसलिए देखा जाए तो कार्यालयी हिन्दी का वास्तविक उद्देश्य समाज के बहुसंख्यक वर्ग तक शासन की नीतियों को सहज रूप से पहुँचाते हुए सामान्य नागरिक को उनके अधिकारों के प्रति जानकारी देना; शासन और प्रजा के बीच सीधा-संवाद स्थापित करना तथा राष्ट्र के विकास में सामान्य नागरिक की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना रहा है। कार्यालयी हिन्दी द्वारा प्रशासन की व्यवस्था में सामान्य नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त कराना सहज है। जब तक प्रशासन और प्रजा में प्रत्यक्ष संवाद नहीं होगा तब तक बिचौलियों की भूमिका समाज में भ्रष्टाचार


         "राजभाषा"

राजभाषा का अर्थ है संविधान द्वारा स्वीकृत सरकारी कामकाज की भाषा। किसी देश का सरकारी कामकाज जिस भाषा में करने का कोई निर्देश संविधान के प्रावधानों द्वारा दिया जाता है, वह उस देश की राजभाषा कही जाती है।

भारत के संविधान में हिन्दी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, किन्तु साथ ही यह भी प्रावधान किया गया है कि अंग्रेजी भाषा में भी केन्द्र सरकार अपना कामकाज तब तक कर सकती है जब तक हिन्दी पूरी तरह राजभाषा के रूप में स्वीकार्य नहीं हो जाती।

प्रारम्भ में संविधान लागू होते समय सन् 1950 में यह समय सीमा 15 वर्ष के लिए थी अर्थात अंग्रेजी का प्रयोग सरकारी कामकाज के लिए सन् 1965 तक ही हो सकता था, किन्तु बाद में संविधान संशोधन के द्वारा इस अवधि को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया। यही कारण है कि संविधान द्वारा हिन्दी को राजभाषा घोषित किये जाने पर भी केन्द्र सरकार का अधिकांश सरकारी कामकाज अंग्रेजी में हो रहा है और वह अभी तक अपना वर्चस्व बनाए हुए है।

केन्द्र सरकार की राजभाषा के अतिरिक्त अनेक राज्यों की राजभाषा के रूप में भी हिन्दी का प्रयोग स्वीकृत है। जिन राज्यों की राजभाषा हिन्दी स्वीकृत है, वे हैं- उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ एवं उत्तरांचल। इन राज्यों के अलावा अन्य राज्यों ने अपनी प्रादेशिक भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया है। यथा-पंजाब की राजभाषा पंजाबी, बंगाल की राजभाषा बंगला, आन्ध्र प्रदेश की राजभाषा तैंलुगू तथा कर्नाटक की राजभाषा कन्नड़ है। इन प्रान्तों में भी सरकारी कामकाज में प्रान्तीय भाषा में होने के साथ-साथ अंग्रेजों में हो रहा है।

निष्कर्ष यह है कि अंग्रेजी संविधान द्वारा भले ही किसी राज्य की राजभाषा स्वीकृत न की गई हो, किन्तु व्यावहारिक रूप में उसका प्रयोग एक बहुत बड़े सरकारी कर्मचारी वर्ग द्वारा सरकारी कामकाज के लिए किया जा रहा है।


  "राजभाषा अधिनियम, 1976"

इस अधिनियम के अन्तर्गत हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग • करने के लिए कुछ प्रभावी कदम उठाये गये है। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:- 1.भारत संघ के राज्य तीन वर्गों में विभक्त किये गए हैं:-

(क) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, • हिमाचल प्रदेश और संघ क्षेत्र दिल्ली। (ये सभी हिन्दी भाषी प्रदेश हैं।)

(ख) इस श्रेणी में पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, चण्डीगढ़, अण्डमान-निकोबार को रखा गया है।

(ग) शेष सभी प्रदेश एवं संघ शासित क्षेत्र 'ग' श्रेणी में. रखे गये।

इस वर्गीकरण के उपरान्त यह निर्देश दिया गया कि:-

1.केन्द्रीय कार्यालयों से 'क' श्रेणी के राज्यों को भेजे जाने वाले सभी पत्र हिन्दी में देवनागरी लिपि में भेजे जायेंगे। यदि कोई पत्र अंग्रेजी में भेजा जा रहा है, तो हिन्दी में अनुवाद भी अवश्य भेजा जायेगा।

2.'ख' श्रेणी के राज्यों से पत्र व्यवहार हिन्दी अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है

3.'ग' श्रेणी के राज्यों से पत्र व्यवहार अंग्रेजी में किया जायेगा।

4.केन्द्रीय कार्यालयों में हिन्दी में आगत पत्रों का उत्तर अनिवार्यतः हिन्दी में दिया जायेगा।

5.केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सभी प्रपत्र, रजिस्टर, हिन्दी, अंग्रेजी दोनों में होंगे।

6.केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणी लिख सकेंगे।

7.जहां 80 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी हिन्दी में कार्य करते हों, वहां टिप्पणी, प्रारूप आदि काम केवल हिन्दी में ही करने को कहा जा सकता है।

8.प्रत्येक कार्यालय के प्रधान का यह दायित्व होगा कि वह राजभाषा अधिनियमों एवं उपबन्धों का समुचित अनुपालन कराये।

स्पष्ट है कि संवैधानिक दृष्टि से हिन्दी की स्थिति बड़ी मजबूत है, किन्तु अंग्रेजी जानने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के षड्यन्त्र के कारण अभी भी हिन्दी में शत-प्रतिशत काम केन्द्र सरकार के कार्यालय में नहीं हो पा रहा है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिन्दी अपना राजभाषा का दर्जा पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सकी है।