चाँद का मुँह टेढ़ा है (गजानन माधव मुक्तिबोध)/अँधेरे में

चाँद का मुँह टेढ़ा है (गजानन माधव मुक्तिबोध)
अँधेरे में


एक


ज़िंदगी के...

कमरों में अँधेरे

लगाता है चक्कर

कोई एक लगातार;

आवाज़ पैरों की देती है सुनाई

बार-बार... बार-बार,

वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता,

किंतु, वह रहा घूम

तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार कोई एक,

भीत-पार आती हुई पास से,

गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा

अस्तित्व जनाता

अनिवार कोई एक,

और मेरे हृदय की धक्-धक्

पूछती है—वह कौन

सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई!

इतने में अकस्मात् गिरते हैं भीतर से

फूले हुए पलिस्तर,

खिरती है चूने-भरी रेत

खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह—

ख़ुद-ब-ख़ुद

कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,

स्वयमपि

मुख बन जाता है दिवाल पर,

नुकीली नाक और

भव्य ललाट,

दृढ़ हनु,

कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।

कौन वह दिखाई जो देता, पर

नहीं जाना जाता है!

कौन मनु?


बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब...

अँधेरा सब ओर,

निस्तब्ध जल,

पर, भीतर से उभरती है सहसा

सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति

कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है

और मुस्काता है,

पहचान बताता है,

किंतु, मैं हतप्रभ,

नहीं वह समझ में आता।


अरे! अरे!!

तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष

चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक

वृक्षों के शीश पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,

शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर

चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर के अकस्मात्—

वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक

तिलस्मी खोह का शिला-द्वार

खुलता है धड् से

...

घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी,

अंतराल-विवर के तम में

लाल-लाल कुहरा,

कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक,

रहस्य साक्षात्!


तेजो प्रभावमय उसका ललाट देख

मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर

गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख

संभावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर

विलक्षण शंका,

भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्

गहन एक संदेह।


वह रहस्यमय व्यक्ति

अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,

पूर्ण अवस्था वह

निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की,

मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,

हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,

आत्मा की प्रतिभा।


प्रश्न थे गंभीर, शायद ख़तरनाक भी,

इसीलिए बाहर के गुंजान

जंगलों से आती हुई हवा ने

फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी—

कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर

मौत की सज़ा दी!


किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही

आँखों पै बँध गई,

किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया,

किसी शून्य बिंदु के अँधियारे खड्डे में

गिरा दिया गया मैं

अचेतन स्थिति में!


दो


सूनापन सिहरा,

अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे,

शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की,

मेरे ही उर पर, धँसती हुई सिर,

छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें

मीठी है दुःसह!!

अरे, हाँ, साँकल ही रह-रह

बजती है द्वार पर।

कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही

बुलाता है—बुलाता है

हृदय को सहला मानो किसी जटिल

प्रसंग में सहसा होंठों पर

होंठ रख, कोई सच-सच बात

सीधे-सीधे कहने को तड़प जाए, और फिर

वही बात सुनकर धँस जाए मेरा जी—

इस तरह, साँकल ही रह-रह बजती है द्वार पर

आधी रात, इतने अँधेरे में, कौन आया मिलने?

विमन प्रतीक्षापुर, कुहरे में घिरा हुआ

द्युतिमय मुख—वह प्रेम-भरा चेहरा—

भोला-भाला भाव—

पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है

यह वही व्यक्ति है, जी हाँ!

जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था।

अवसर-अनवसर

प्रकट जो होता ही रहता

मेरी सुविधाओं का न तनिक ख़्याल कर।

चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,

चाहे जिस रूप में

चाहे जिन प्रतीकों में प्रस्तुत,

इशारे से बनाता है, समझाता रहता,

हृदय को देता है बिजली के झटके

अरे, उसके चेहरे पर खिलती हैं सुबहें,

गालों पर चट्टानी चमक पठार की

आँखों में किरणीली शांति की लहरें,

उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास!

लगता है—दरवाज़ा खोलकर

बाँहों में कस लूँ

हृदय में रख लूँ

घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे

परंतु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत

और क्षत-विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ,

शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ ज़रा भी

(यह भी तो सही है कि

कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको)

इसीलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को

कतराता रहता,

डरता हूँ उससे।

वह बिठा देता है तुंग शिखर के

ख़तरनाक, खुरदरे कगार-तट पर

शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको।

कहता है—“पार करो, पर्वत-संधि के गह्वर,

रस्सी के पुल पर चलकर

दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो!”

अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा

मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से

बजने दो साँकल

उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले,

वह जन—वैसे ही

आप चला जाएगा आया था जैसा।

खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा

पीड़ाएँ समेटे!

क्या करूँ, क्या नहीं करूँ मुझे बताओ,

इस तम-शून्य में तैरती है जगत्-समीक्षा

की हुई उसकी

(सह नहीं सकता)

विवेक-विक्षोभ महान् उसका

तम-अंतराल में (सह नहीं सकता)

अँधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा

भविष्य का नक्षा दिया हुआ उसका

सह नहीं सकता!!

नहीं, नहीं, उसको मैं छोड़ नहीं सकूँगा,

सहना पड़े—मुझे चाहे जो भले ही।


कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल,

लड़खड़ाता हुआ मैं

उठता हूँ दरवाज़ा खोलने,

चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे

पोंछता हूँ हाथ से,

अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर

बढ़ता हूँ आगे,

पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,

हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया,

मस्तक अनुभव करता है, आकाश,

दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज़,

आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं,

केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी।

आत्मा में, भीषण

सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी।

विचार हो गए विचरण-सहचर।

बढ़ता हूँ आगे,

चलता हूँ सँभल-सँभलकर,

द्वार टटोलता,

ज़ंग-खाई, जमी हुई, जबरन

सिटकनी हिलाकर

ज़ोर लगा, दरवाज़ा खोलता

झाँकता हूँ बाहर...


सूनी है राह, अजीब है फैलाव,

सर्द अँधेरा।

ढीली आँखों से देखते हैं विश्व

उदास तारे।

हर बार सोच और हर बार अफ़सोस

हर बार फ़िक्र

के कारण बढ़े हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ

अँधियारा पीपल देता है पहरा।

हवाओं की निःसंग लहरों में काँपती

कुत्तों की दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,

टकराती रहती सियारों की ध्वनि से।

काँपती हैं दूरियाँ, गूँजते हैं फ़ासले

(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)


इतने में अँधियारे सूने में कोई चीख़ गया है

रात का पक्षी

कहता है—

“वह चला गया है,

वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं

अब तेरे द्वार पर।

वह निकल गया है गाँव में शहर में!

उसको तू खोज अब

उसका तू शोध कर!

वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,

उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक...)

वह तेरी गुरु है,

गुरु है...


तीन


समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या

जागृति शुरू है।

दिया जल रहा है,

पीतालोक-प्रसार में काल चल रहा है

आस-पास फैली हुई जग-आकृतियाँ

लगती हैं छपी हुई जड़ चित्राकृतियों-सी

अलग व दूर-दूर

निर्जीव!!

यह सिविल लाइंस है। मैं अपने कमरे में

यहाँ पड़ा हुआ हूँ।

आँखें खुली हुई हैं,

पीटे गए बालक-सा मार खाया चेहरा

उदास इकहरा,

स्लेट-पट्टी पर खींची गई तस्वीर

भूत जैसी आकृति—

क्या वह मैं हूँ?

मैं हूँ?


रात के दो हैं,

दूर-दूर जंगल में सियारों का हो-हो,

पास-पास आती हुई घहराती गूँजती

किसी रेल-गाड़ी के पहियों की आवाज़!!

किसी अनपेक्षित

असंभव घटना का भयानक संदेह,

अचेतन प्रतीक्षा,

कहीं कोई रेल-एक्सीडेंट न हो जाए।

चिंता के गणित अंक

आसमानी-स्लेट-पट्टी पर चमकते

खिड़की से दीखते।

...

हाय! हाय! तॉल्स्तॉय

कैसे मुझे दीख गए

सितारों के बीच-बीच

घूमते व रुकते

पृथ्वी को देखते।


शायद तॉल्स्तॉय-नुमा

कोई वह आदमी

और है,

मेरे किसी भीतरी धागे की आख़िरी छोर वह,

अनलिखे मेरे उपन्यास का

केंद्रीय संवेदन

दबी हाय-हाय-नुमा।

शायद तॉल्स्तॉय-नुमा।


प्रोसेशन?

निस्तब्ध नगर के मध्य-रात्रि-अँधेरे में सुनसान

किसी दूर बैंड की दबी हुई क्रमागत तान-धुन,

मंद-तार उच्च-निम्न स्वर-स्वप्न,

उदास-उदास ध्वनि-तरंगें हैं गंभीर,

दीर्घ लहरियाँ!!

गैलरी में जाता हूँ, देखता हूँ रास्ता

वह कोलतार-पथ अथवा

मरी हुई खिंची हुई कोई काली जिह्वा

बिजली के द्युतिमान् दिए या

मरे हुए दाँतों का चमकदार नमूना!


किंतु, दूर सड़क के उस छोर

शीत-भरे थर्राते तारों के अँधियारे तल में

नील तेज-उद्भास

पास-पास पास-पास

आ रहा इस ओर!

दबी हुई गंभीर स्वर-स्वप्न-तरंगें,

शत-ध्वनि-संगम-संगीत

उदास तान-धुन

समीप आ रहा!!


और, अब

गैस-लाइट-पाँतों की बिंदुएँ छिटकीं,

बीचो-बीच उनके

साँवले जुलूस-सा क्या-कुछ दीखता!!

और अब

गैस-लाइट-निलाई में रँगे हुए अपार्थिव चेहरे,

बैंड-दल,

उनके पीछे काले-काले बलवान् घोड़ों का जत्था

दीखता,

घना व डरावना अवचेतन ही

जुलूस में चलता।

क्या शोभा-यात्रा

किसी मृत्यु-दल की?


अजीब!!

दोनों ओर, नीली गैस-लाइट-पाँत

रही जल, रही जल।

नींद में खोए हुए शहर की गहन अवचेतना में

हलचल, पाताली तल में

चमकदार साँपों की उड़ती हुई लगातार

लकीरों की वारदात!!

सब सोए हुए हैं।

लेकिन, मैं जाग रहा, देख रहा

रोमांचकारी वह जादुई करामात!!


विचित्र प्रोसेशन,

गंभीर क्विक मार्च...

कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने

चमकदार बैंड-दल—

अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति

आँतों के जालों से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर

गंभीर गीत-स्वप्न-तरंगें

उभारते रहते,

ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।

बैंड के लोगों के चेहरे

मिलते हैं मेरे देखे हुओं-से,

लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार

इसी नगर के!!

बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में!

उनके पीछे चल रहा

संगीन नोकों का चमकता जंगल,

चल रही पदचाप, ताल-बद्ध दीर्घ पाँत

टैंक-दल, मोर्टार, ऑर्टिलरी, सन्नद्ध,

धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,

सैनिकों के पथराए चेहरे

चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए, गहरे!

शायद, मैंने उन्हें पहले भी तो कहीं देखा था।

शायद, उनमें मेरे कई परिचित!!

उनके पीछे यह क्या!!

कैवेलरी!

काले-काले घोड़ों पर ख़ाकी मिलिट्री ड्रेस,

चेहरे का आधा भाग सिंदूरी-गेरुआ

आधा भाग कोलतारी भैरव,

आबदार!!

कंधे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा।

कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,

रोष-भरी एकाग्रदृष्टि में धार है,

कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मॉर्शल

कई और सेनापति सेनाध्यक्ष

चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,

उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे,

उनके लेख देखे थे,

यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं

भई वाह!

उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कवि-गण

मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान्

यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात

डोमी जी उस्ताद

बनता है बलबन

हाय, हाय!!

यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय।

भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब

साफ़ उभर आया है,

छिपे हुए उद्देश्य

यहाँ निखर आए हैं,

यह शोभा-यात्रा है किसी मृत-दल की।

विचारों की फिरकी सिर में घूमती है।


इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी ओर

आँखें उठीं मेरी ओर-भर,

हृदय में मानो की संगीन नोकें ही घुस पड़ीं बर्बर,

सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर—

“मारो गोली, दाग़ो स्साले को एकदम

दुनिया की नज़रों से हटकर

छिपे तरीक़े से

हम जा रहे थे कि

आधी रात—अँधेरे में उसने

देख लिया हमको

व जान गया वह सब

मार डालो, उसको ख़त्म करो एकदम”

रास्ते पर भाग-दौड़ धका-पेल!!

गैलरी से भागा मैं पसीने से शराबोर!!


एकाएक टूट गया स्वप्न व छिन्न-भिन्न हो गए

सब चित्र

जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न,

फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे,

और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक

गहन मृतात्माएँ इसी नगर की

हर रात जुलूस में चलतीं,

परंतु, दिन में

बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र

विभिन्न दफ़्तरों-कार्यालयों, केंद्रों में, घरों में।

हाय, हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,

इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।

चार

अकस्मात्