भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)/काव्य- हेतु

भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)
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काव्य- हेतु

काव्य हेतु का सामान्य अर्थ है - काव्य रचना के कारण अर्थात जिन कारणों से कवि प्रेरित होकर काव्य का निर्माण करता है। उन्हे काव्य हेतु कहते हैं आधुनिक शब्दावली में हेतु के लिए प्रेरणा शब्द का प्रयोग किया जाता है। दूसरे शब्द में कवि जिस प्रेरणा से काव्य सृष्टि करता है, उसे काव्य प्रेरणा कहते हैं। काव्य हेतु दो शब्दों से मिलकर बना है- काव्य और हेतु। जिसमें काव्य का अर्थ 'कविता' और हेतु का अर्थ 'कारण' होता है। इन्ही शब्दो से काव्यहेतु बना हैं।

विभिन्न काव्यहेतु

संस्कृत के काव्य शास्त्रों में से जिन्होंने काव्य हेतु का निरूपण किया दण्डी, वामन, रुद्रट, कुन्तक और मम्मट का नाम विशेष का उल्लेख्य है। इस प्रकार संस्कृत काव्यशास्त्र में कुल पांच - प्रतिभा,शक्ति,व्युत्पत्ति, अभ्यास और समाधि को काव्य - हेतुओं का विवेचन हुआ है।

"गुरूपदेशादध्येतुं शास्त्रं जडधियोऽप्यलम्।
काव्यं तु जायते जातुं कस्यचित् प्रतिभावतः॥"

(काव्यालंकार-१-१४)

सर्वप्रथम भामह ने 'प्रतिभा को अनिवार्यता घोषित करते हुए इसकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है । उनके कथनानुसार ' शास्त्र पढ़ लेना और बात है , और काव्य का निर्माण करना और बात । शास्त्र - पठन तो गुरूपदेश द्वारा जड़बुद्धि के लिए भी सम्भव है , पर काव्य - निर्माण के लिए प्रतिभा अपेक्षित है । आगे चल कर वामन ने भी प्रतिभा को ' कवित्व का बीज " मानकर प्रकारान्तर से उसकी महत्ता दिखायी है ।

दंडी के अनुसार काव्यहेतु -

"नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहुनिर्मलम्।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः कारणं काव्यसंपदः॥"

(काव्यादर्श-१/१०३)

दण्डी के अनुसार 'प्रतिभा निस्सन्देह एक आवश्यक काव्य हेतु है , पर इसके अभाव में श्रुत ( शास्त्र ज्ञान ) और यत्न ( अभ्यास ) के द्वारा उपासिता सरस्वती किसी - किसी पर अनुग्रह कर ही देती है । काव्य रचना के लिए केवल प्रतिभा से कार्य नहीं होता बल्कि उसके साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं व शास्त्रों के सुनने - पढ़ने से उत्पन्न निर्मल बुद्धि की भी जरूरत होती है। " अलंकारवादी दण्डी प्रतिभा जैसे आन्तरिक तथा सूक्ष्म हेतु के अभाव में शास्त्र ज्ञान और अभ्यास जैसे बाह्य तथा स्थूल हेतुओं को यदि किसी सीमा तक ग्राह्य समझते हैं और यह भी संभवतः चित्र , अनुप्रास , यमक , श्लेष अलंकारों को द्योतक काव्य - रचना में तो कुछ आश्चर्य नहीं है । किन्तु फिर भी , उन्हें इन दोनों हेतुओं को गौण स्थान ही देना अभीष्ट है , यह असन्दिग्ध है ।

वामन ने भी तीन प्रकार के काव्य हेतु मने हैं। -लोक (लोकव्यवहारज्ञान), विधा(विभिन्न शास्त्रज्ञान), प्रकीर्ण।

"लोको विद्या प्रकीर्णंच काव्यांगानि।" - काव्यालंकारसूत्रवृत्ति,

प्रतिभा को जन्मजात गुण मानते हुए इसे प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया गया है – "कवित्व बीजं प्रतिभानं कवित्वस्य बीजम्।" प्रतिभा के अतिरिक्त वे लोकव्यवहार, शास्त्रज्ञान, शब्दकोश आदि की जानकारी को भी काव्य हेतुओं में स्थान देते हैं। ध्यातव्य है कि काव्यांग में वामन ने लोक तथा विद्या के पश्चात ही प्रतिभा को महत्व दिया है।

हेमचन्द्र

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संस्कृत - साहित्यशास्त्र में हेमचन्द्र ही सम्भवतः प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने उक्त तीनों हेतुओं में से केवल प्रतिभा को , जो कि व्युत्पत्ति और अभ्यास के द्वारा परिष्कृत होती है , काव्य का हेतु माना हैं।

प्रतिभाऽस्य हेतुः व्युत्पत्त्यभ्यासाभ्यां संस्कार्या।

उनके कथन का अभिप्राय यह है कि प्रतिभा काव्य का हेतु है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास प्रतिभा के संस्कार अथवा परिष्कारक हेतु हैं , न कि काव्य के।

रुद्रट

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रुद्रट के कथन का अभिप्राय - 'जिसके बल पर कवि अपने एकाग्र मन मे विभिन्न काव्य विषयो को अनुकूल शब्दो मे अभिव्यक्त करता जाता हैं, उसे शक्ति अर्थात प्रतिभा कहते हैं।

आनन्दवर्द्धन

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शक्ति (प्रतिभा) को अनिवार्य हेतु के रूप में स्वीकार करते हैं।

"न काव्यार्थ विरामोऽस्ति यदि स्यात् प्रतिभा गुणः।
सत्स्वपि पुरातन कविप्रबंधेषु यदि स्यात् प्रतिभागुण॥"

- (ध्वन्यालोक, ४/६)

उनके कथनानुसार कवि का अशक्तिजन्य दोष तो तुरंत और अनायास ही स्पष्ट रूप से दिखायी दे जाता है , पर कवि के अव्युत्पत्तिजन्य - दोष को उसकी शक्ति आच्छादित कर देती है । " दूसरे शब्दों में , व्युत्पत्ति में अशक्तिजन्य दोष को आच्छादित करने की क्षमता नहीं है । इस कथन से आनन्दवर्द्धन का निस्सन्देह यह कहना अभीष्ट है कि शक्ति अनिवार्य हेतु है , पर व्युत्पत्ति अनिवार्य न होते हुए भी अभिवान्छित हेतु अवश्य है ।

मम्मट के सम्मुख उपयुक्त सभी काव्यहेतु थे। उन्होंने सर्वसम्मत तीन काव्यहेतु में उन सबको अन्तर्भूत कर दिया-

"शक्तिर्निपुणता लोक काव्यशास्त्राद्यवे क्षणात्।
काव्य ज्ञ शिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे॥

( काव्य प्रकाश १/३ )

अर्थात् ( १ ) शक्ति , ( २ ) लोक , काव्य , काव्यशास्त्र आदि के अवेक्षण द्वारा प्राप्त निपुणता , तथा ( ३ ) काव्य के मर्मज्ञ व्यक्तियों से प्राप्त शिक्षा के द्वारा अभ्यास ( इन तीनों का समन्वित रूप ) काव्य - रचना का हेतु है ।

मम्मट के उक्त कथन में पूर्वाचार्यों द्वारा प्रस्तुत अधिकतर काव्य - हेतुओं को स्पष्टत : अथवा प्रकारान्तर से स्थान मिल गया है ।

जगन्नाथ

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संस्कृत - साहित्यशास्त्र के अन्तिम महान आचार्य जगन्नाथ ने भी काव्य का कारण केवल प्रतिभा को ही माना है । केवल प्रतिभा को ही काव्यहेतु मानने के कारण इन्हें 'केवल प्रतिभावादी' ("प्रतिभैवकेवला कारणम्") भी कहा जाता है। और काव्यशास्त्रियों में समान व्युत्पत्ति और अभ्यास को उन्होंने भी प्रतिभा का कारण स्वीकृत किया है , न कि काव्य का । पर उनके विचार में व्यत्पति और अभ्यास किन्ही परिस्थितियों में प्रतिभा के कारण नहीं भी होते । इस अवस्था में अदृष्ट को अर्थात किसी देवता अथवा महापुरुषादि द्वारा दिये गये वरदान से जन्य प्रसाद को , प्रतिभा का कारण मानना चाहिए । किन्तु जगत्राथ की इस मान्यता पर सहज रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता कि पूर्वजन्म के अथवा पैतृक संस्कारों के बिना भी अदृष्ट अर्थात देवता अथवा महापुरुष आदि के प्रसाद से प्रतिभा की उत्पत्ति होती है ।

निष्कर्ष

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उपर्युक्त मतो से यह स्पष्ट हो जाता है कि केवल दण्डी प्रतिभा (शक्ति) के बिना भी किन्ही अवस्थाओ में व्युत्पत्ति और अभ्यास के आधार पर काव्यरचना को स्वीकृत करते है, पर शेष आचार्यो के मत में प्रतिभा का होना अनिवार्य है। उपर्युक्त जिन आचार्यों ने काव्यहेतु संबंधी मत व्यक्त किए हैं उनमें दो प्रकार के विचार दिखाई पड़ते हैं। एक मत के अनुसार प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास सम्मिलित रूप से काव्य के कारण हैं। इस विचार-वर्ग में रुद्रट तथा मम्मट का स्थान प्रमुख है। दूसरे मत के अनुसार काव्य का कारण केवल प्रतिभा है और व्युत्पत्ति एवं अभ्यास उसके संस्कारक या सहायक तत्व हैं। इस वर्ग के अंतर्गत राजशेखर तथा जगन्नाथ जैसे आचार्य प्रमुख हैं।