आपेक्षिकता का आधुनिक दृष्टिकोणसंपादित करें

यद्यपि विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धान्त पहली बार वर्ष 1905 में आइंस्टीन द्वारा प्रस्तावित किया गया, लेकिन इसका वर्तमान दृष्टिकोण चतुर्विम ब्रह्माण की अवधारणा पर निर्भर करता है, इसका प्रस्ताव सर्वप्रथम हर्मन मिन्कोव्स्की द्वारा वर्ष 1908 में दिया गया।

मिन्कोव्स्की के योगदान जटिल दिखते हैं लेकिन सरल रूप में पायथोगोरस प्रमेय का विस्तार हैं:

द्विविम में:  

त्रिविम में:  

चतुर्विम में:  

(जहाँ k =  )

आधुनिक दृष्टिकोण निर्देशांक पद्धति के प्रकार को समझाने के लिए निश्चरता की अवधारणा को काम में लेता है जिनकी स्थिति और वस्तु की सीमा का पूर्ण भौतिक विवरण उपलब्ध करवाने आवश्यकता है। विशिष्ट आपेक्षिकता का आधुनिक सिद्धान्त "लम्बाई" की अवधारणा से आरम्भ होता है। दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि किसी वस्तु की लम्बाई समान ही रहती है चाहे वो एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित किया जाये या घूर्णन करवाया जाये। हम सोचते हैं किसी वस्तु की लम्बाई "निश्चर" है। हालांकि निम्नलिखित दृष्टान्त में यह प्रदर्शित किया गया है जिसमें हम सुझाव देना चाहते हैं कि लम्बाई त्रिविम निर्देशांक पद्धति में निश्चर प्रतीत होती है।

 

किसी वस्तु की द्विविम निर्देशांक पद्धति में लम्बाई पायथोगोरस प्रमेय द्वारा दी जाती है:

 

यह द्विविम लम्बाई इसी वस्तु को द्विविम समतल के बाहर झुकाये जाने पर निश्चर नहीं रहती। दैनिक जीवन में त्रिविम निर्देशांक पद्धति में ऐसा प्रतीत होता है कि लम्बाई को पूर्णतः परिभाषित किया जाता है। त्रिविम में लम्बाई को पायथोगोरस प्रमेय के त्रिविम रूप में दिया जाता है:

 

इस सूत्र की व्युत्पत्ति निम्नलिखित रूप में की जा सकती है।

 

ऐसा प्रतीत होता है कि किसी वस्तु को दी गयी दिशाओं में झुकाया जाता है अथवा व्यवस्थित किया जाता है तो उसे एक निर्देशांक पद्धति द्वारा निरुपित किया जा सकता है, उस स्थिति में निर्देशांक पद्धति उस वस्तु की लम्बाई को पूर्णतः वर्णित कर सकता है। हालांकि यह स्पष्ट है कि वस्तु समय के साथ परिवर्तित हो सकती है। समय एक अन्य विमा है जिसमें वस्तु व्यवस्थित हो सकती है। इसे निम्नलिखित चित्र में प्रदर्शित किया गया है:

 

दिक्काश और समय में दो घटनाओं के मध्य सीधी रेखा की लम्बाई "दिक्-काल अन्तराल" कहते हैं।

वर्ष 1908 में हर्मन मिन्कोव्स्की बताया कि यदि वस्तुओं को समय में पुनः व्यवस्थित किया सकता है तो ब्रह्माण्ड चतुर्विम हो सकता है। उन्होंने प्रबलता से सुझाव दिया था कि आइंस्टीन का हाल में सुझावित विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धान्त उनके चतुर्विम ब्रह्माण्ड का परिणाम था। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि दिक्-काल अन्तराल चतुर्विम में पायथोगोरस प्रमेय के दिक्काश और समय से सम्बंधित हो सकता है:

 

जहाँ i काल्पनिक इकाई (कभी कभी इसे सटीक रूप में   कहा जाता है) है, c एक नियतांक है और s दिक्-काल अंतराल द्वारा लिया गया समयांतराल t है। यहाँ प्रतीक x, y और z दिक्काश में सम्बंधित अक्ष की दिशा में विस्थापन को निरूपित करता है। इस समीकरण में 'सैकण्ड' भी लम्बाई की ही एक विमा बन जाती है। इसी रूप में जैसे सेंटीमीटर और इंच दोनों ही लम्बाई की विमा हैं और दोनों सेंटीमीटर = 'परिवर्तन नियतांक' गुणा इंच से सम्बंध से सम्बंधित हैं उसी तरह सैकण्ड और मीटर भी निम्नलिखित सूत्र से सम्बंधित हैं: मीटर = 'परिवर्तन नियतांक' गुणा सैकण्ड। यहाँ परिवर्तन नियतांक c का मान 300000000 मीटर प्रति सैकण्ड है। अब   को ऋणात्मक एक के बराबर है तो दिक्-काल अन्तराल को निम्नलिखित सूत्र से दिया जाता है:

 

मिन्कोव्स्की का काल्पनिक इकाई उपयोग उन्नत ज्यामिति के उपयोग के रूप में था जिसमें "दूरीक प्रदीश" नामक एक उपकरण काम में लिया जाता है। दूरीक प्रदीश दिक्-काल अन्तराल के वर्ग के लिए व्यंजक में "वास्तविक" समय और ऋणात्मक चिह्न के अस्तित्व को अनुमत करता है जिससे दिक्-काल में वक्रता के कारण समय के साथ दूरी में इस तरह परिवर्तन हो सके (उन्नत पाठ देखें)। अब हम वास्तविक समय काम में लेते हैं लेकिन अन्तराल के वर्ग के लिए मिन्कोव्स्की के वास्तविक समीकरण बनी रहे अतः दिक्-काल अन्तरला को इस तरह दिया जाता है:

 

दिक्-काल अन्तराल की कल्पना करना मुश्किल है; ये एक स्थान एवं समय और दूसरे स्थान एवं समय के मध्य विस्तृत होते हैं अतः अन्तराल के अनुदिश गतिशील किसी वस्तु का वेग दिये गये प्रेक्षक के लिए पहले ही ज्ञात होती है।

यदि ब्रह्माण्ड चतुर्विम है तो दिक्-काल अन्तराल (आकाशीय लम्बाई के स्थान पर) निश्चर होगा। जो भी किसी विशिष्ट दिक्-काल अन्तरालका मापन करता है, वो एक ही मान प्रेक्षित करेगा चाहे वो किसी भी वेग से गतिशील हों। भौतिकी शब्दावली में दिक्-काल अन्तराल "लोरेन्ट्स निश्चरता" का एक प्रकार है। दिक्-काल अन्तराल की निश्चरता के कुछ नाटकीय परिणाम हैं।

इसका पहला परिणाम यह है कि यदि कोई वस्तु c मीटर प्रति सैकण्ड की गति से गतिशील है तो सभी प्रेक्षकों के लिए उस वस्तु का वेग समान प्रेक्षित होगा चाहे वो स्वयं किसी भी तेज गति से गतिशील हों। वेग c सार्वत्रिक नियतांक होगा। इसे निम्नलिखित रूप में समझाया जाता है।

जब कोई वस्तु c वेग से गतिशील है तो दिक्-काल अन्तराल शून्य होगा जिसे निम्नलिखित रूप में दर्शाया जाता है:

v वेग से गतिशील वस्तु द्वारा x दिशा में t सैकण्ड में तय दूरी:
 
यदि y अथवा z दिशाओं में कोई गति नहीं है तो दिक्-काल अन्तराल   होगा।
अतः:  
लेकिन जब वेग v का मान c हो तब:
 
और चूँकि दिक्-काल अन्तराल  


दिक्-काल आरेख की विवेचनासंपादित करें

दिक्-कालसंपादित करें

प्रकाश शंकुसंपादित करें

लोरेन्ट्स रूपांतरण समीकरणसंपादित करें

लोरेन्ट्स रूपांतरण का दिक्-काल निरूपणसंपादित करें

 
समय के लिए लोरेंट्स रूपांतरण का दिक्-काल निरूपण

रामू और श्याम का सापेक्ष वेग v है और जब वो एक दुसरे पर सम्पातित हैं उस समय उनकी घड़ियों का समय समान है। रामू और श्याम दोनों रामू की गति की दिशा में एक घटना को प्रेक्षित करते हैं। रामू और श्याम ने जब घटना का प्रेक्षण किया तब उनका समय क्या था? यह पहले ही प्रदर्शित किया जा चुका है कि आपेक्षिक कला   द्वारा दी जाती है। इसका अर्थ यह है कि घटना की स्थिति के कारण श्याम के समय अक्ष की तुलना में रामू द्वारा प्रेक्षित समय का मान अधिक होगा। कला को ध्यान में रखने पर और समय विस्फारण का उपयोग करने पर रामू प्रेक्षित करता है कि उसकी घड़ी द्वारा किया गया समय का मापन श्याम की घड़ी से निम्नलिखित सूत्र से तुलना कर सकते हैं:

 .

निर्देश तंत्रों के मध्य समान घटना के लिए समयों के मध्य उपरोक्त सम्बंध समय के लिए लोरेंट्स रूपांतरण समीकरण के रूप में जाना जाता है।