हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/सिद्धार्थ

हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
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सिद्धार्थ'

संदर्भ

सिद्धार्थ कविता युग प्रवर्तक छायावादी कवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित हैं। मैथिलीशरण गुप्त अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने द्विवेदी युग से आधुनिक काल तक अनेक व्यक्तियों को आत्मसात करते हुए हिंदी कविता को अनेकार्थक में समृद्ध किया।


प्रसंग

सिद्धि के लिए गौतम बुद्ध त्याग कर गए बस सोच रहे हैं कि यह कैसा विचित्र चक्र चल रहा है वह इससे मुक्ति पाने का मार्ग खुल रहे हैं गोपी जी ने सिद्धार्थ के निवारण चिंतन का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है।


व्याख्या

गौतम बुद्ध ने यह सोच रहे हैं कि यह कैसा चक्र घूम रहा है और इससे निकलने वाला सारतत्व चला जाता है और मनुष्य इसमें पिस्ता रहा है पर अब तक इसमें कोई अंतर नहीं आया है कब तक मनुष्य ऐसे ही सहता रहेगा उसे इससे मुक्ति मिलेगी किस प्रकार से मनुष्य से मुक्ति पाएगा देता तक भी आवागमन से मुक्ति नहीं दे पाए किसी देवता के शरण हुए हम जाएं पर देवता और सब अपना कुशल मनाएंगे गौतम बुध्द सोच रहे हैं बाहर से क्या जोड़ो या क्या है सामान निकालो इसे संसार को मुक्ति मिलेगी इसके लिए मुझे ही कुछ करना होगा मुझे ही कुछ उपाय करने होंगे इस संसार रूपी मगरमच्छ का दांत उखाड़ सकु।


2.

कवि कहते है कि गौतम कहते है मैने आज यशोधरा को देखा और सोचा यशोधरा कैसी हो जाएगी। अन्तिम में वह क्या मिट्ठी में मिल जाएगी। क्या बगीचे रूपी शरीर जो आज हरा भरा है वह सुख जाएगा। शरीर में बहुत सारे रोग हो जायेगे। धिधकर है मेरे रहते हुए यशोधर कि यह स्तिथि हो जाए। क्या सब कुछ रिक्त है।


3.

कवि कहते है जग में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी तय है। जीवन एक ऐसा घड़ा है जिसमें पानी छेद के द्वारा भर निकल रहा है। इसीलिए जीवन भर कर भी अपूर्ण हैं। जिएं के सफर में किसी को नहीं पता कि उसका अंतिम समय कब आ जाए। यहां हर तरफ विष है। आत्मा की शक्ति कहा चली गई है। जो मन को जीत लेता था। गौतम कहते है मै वह चीज ढूढूगा जिससे जीवन का सत्य मिल सके। मै जगत के कल्याण के लिए आ गया हूं। अब किसी बात का डर नहीं है। अब अपने से पहले दूसरों कि सहायता करनी है यही मेरा सिद्धांत है।


4.

गौतम से उनकी सिद्धियों के बारे में पूछते हुए कवि कहते है कपिलवस्तु राज्य के अधिकारी का यहां क्या है। तुम्हारे जीवन का प्रमुख लक्ष्य यही है।जीवन में खाने पीने और मारने जीने के अलावा कुछ ओर भी हैं क्या। योग्य व्यक्ति कहते है की गौतम में यही योग्य है। लोग जीवन में रोग के कारण मृत्यु लोक में चले जाते है यही वियोग है सभी लोगो के जीवन में। हिमालय के वासी के लिए यह लज्जा की बात है। अपने अपने तप से शांति मिली अर्थात् तप करने से आप अपनी सिद्धि हासिल कर पाए। कवि कहते है बोलो युवक क्या अपने अपनी अनमोल यौवन अवस्था यूहीं गवा दी। गौतम से पूछते हैं यह जीवन किस लिए है बताओ। जीवन को अंतिम में काल में ही जब है। क्या जीवन में मृत्यु का आना जरूरी हैं। क्या मृत्यू उस कर्ज की तरह है जिसे उतारना ही है। हे देव पुत्र अब चुप ना बैठो कोई उपाय बताओ। तुम क्या खोज रहे थे काहतो को अपने में लेकर बताओ।


5.

गौतम बोलते है वह मै अपनी अपने सभी सांसारिक सुखों के छोड़ कर। मैं मुक्ति के जाना चहता हूं। लोग मेरी कहानी सुन कर हसेंगे। मुझे मुक्ति का फल मिलेगा।


विशेष

1) वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है

2) भाषा खड़ी बोली है

3) गौतम के घर से चले जाने की स्तिथि का वर्णन है।