हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/बच्चे काम पर जा रहे हैं

हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
 ← झुर्रियों से भरता हुआ बच्चे काम पर जा रहे हैं मारे जायेंगे → 
बच्चे काम पर जा रहे हैं
  • कवि ने समाज का ध्यान बाल मजदूरी की और खिचा है
*बच्चो से बचपन छीन लीए जाने की पीडा को कवि ने दरशाया है
  • कवि ने उस समाजिक आथिक॔ विडम्बना की और इशारा किया है जिस कारण कुछ बच्चे खेल शिक्षा जीवन की उमंग से वंचित है

संदर्भ

सम्पादन

प्रस्तुत कविता छायावाद के बाद के कवि राजेश जोशी द्वारा रची गई है जिन्हें सूक्तियां गढ़ने में भी माहरत हासिल है। राजेश जोशी कथ्य व शिल्प दोनों ही नजरों से जनपक्षधर कवि हैं।

प्रसंग

सम्पादन

प्रस्तुत कविता में कवि ने हमारे समाज में चल रहे हैं बाल मजदूरी की समस्या को दिखाया है इस समस्या की ओर कवि ने लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कि हैं।

व्याख्या

सम्पादन

1 कोहरे में.......... काम पर जा रहे हैं।

व्याख्या
कवि ने कविता के प्रथम पंक्तियों में ही लिखा है कि बहुत ही ठंड का मौसम है और सुबह-सुबह का वक्त है चारों तरफ कोहरा छाया हुआ है सड़के भी कोहरे से ढकी हुई हैं परंतु इतनी ठंड में भी छोटे-छोटे बच्चे कोहरे से ढकी सड़क पर चलते हुए अपने अपने काम पर जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजी रोटी के इंतजाम करना कोई कारखाने में मजदूरी करता तो कोई चाय की दुकान में काम करने के लिए मजबूर है जबकि इन बच्चों की उम्र तो खेलने कूदने कि है।

2 हमारे समय के सबसे भयानक पंक्ति है.......... काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने समाज में व्याप्त बाल मजदूरी जैसी समस्या पर चिंतन करते हुए कहा है कि हमारे समय की सबसे भयानक बात यह है कि छोटे-छोटे बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है।और उस से भी भयानक कवि को यह बात लग रही है कि हम यह बात कितनी सरलता से कह देते हैं जबकि हमें इसकी और ध्यान देना चाहिए और इसका कारण पता करना चाहिए कि पढ़ने और खेलने के उम्र वाले बच्चों को अपना पेट पालने के लिए यू काम पर क्यों जाना पड़ रहा है। हमें समाज के ठैकेदारो से प्रश्न पूछना चाहिए कि इन छोटे बच्चों को काम पर क्यों जाना पड़ रहा है जबकि इनकी उम्र अभी खेलने कूदने और पढ़ने लिखने कि हैं। ऐसी स्थितिया क्यू है कि बच्चो को उनका बचपन जीने नही दिया जा रहा है उन्हे काम पर क्यू लगाया जा रहा है।

3 क्या अंतरिक्ष में गिर गए ............सारे मदरसों की इमारतें।

व्याख्या

कवि बाल मजदूरों को सुबह भीषण ठंड एवं कोहरे के बीच अपने-अपने काम पे जाते देखता है।जिसे देखकर कभी हताश एवं निराशा से भर जाता है और इसी वजह से कवि के मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते हैं कवि यह नहीं समझ पा रहा है कि क्यों यह बच्चे काम ना करने की इच्छा होते हुए भी सुबह-सुबह ठंड में ना चाह कर भी काम पर जा रहे हैं। कवि फिर सोचता है कि क्या बच्चों के लिए खेलने के लिए गेंदे क्या अंतरिक्ष मे गिर गई है जो मिल नही रही है बच्चों के पढने के लिए क्या इस संसार में एक भी किताब नहीं बची है। क्या किताबों को कोई दीमक ने खा लिया है क्या बच्चो के सारे खिलौने कहीं किसी काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं। जो अब इन बच्चों के लिए कुछ नहीं बचा और मजबूरन उन्हे काम पर जाना पड रहा है क्या मदरसे( स्कूल के भवन) क्या किसी भूकंप मे नष्ट हो गए है।

4 क्या सारे मैदान .........खत्म हो गए एकाएक।

व्याख्या

इन पंक्तियों में कभी कहते हैं क्या बच्चों के खेलने की सारी जगह खत्म हो चुकी है क्या सारे मैदान जहां बच्चे खेल सके खत्म हो गऐ है  सारे घरों के आंगन खत्म हो चुके हैं अचानक ही जो इन बच्चों के पास अब कुछ नहीं बचा इसलिए यह सुबह सुबह काम पर जा रहे हैं।

5 तो फिर बचा क्या .........सारी चीजें.....

व्याख्या

कवि के अनुसार जब बच्चों के लिए खेलने कूदने के लिए कुछ नहीं बचा तो कवि कहते हैं कि अगर सच में ऐसा है तो यह कितनी भयानक बात है और इस दुनिया का होने का भी कोई अर्थ ही नहीं है परंतु इससे भी ज्यादा भयानक तब लगता है जब कवि को पता चलता है कि बच्चों कि खेलने कूदने की सारी चीजों के होने के बाद भी बच्चे काम पर जाने के लिए विवश है इसी वजह से कवि परेशान एवं निराश भी हैं।

6 पर..........दुनिया .......काम पर जा रहे हैं।
व्याख्या

लेकिन कवि जब देखता है कि सारी सुविधाओं से यह जगह भरी हुई है यह बात उन्हें घर कर जाती है क्योंकि उन्हें यह समझ नहीं आता कि इन सारी चीजों के होने के बाद भी आखिर क्यों छोटे-छोटे बच्चे दुनिया के हजार हजार सड़कों से चलकर अपने काम पर जाने के लिए विवश हैं और बच्चे काम पर जा रहे हैं।

काव्य सौंदर्य

सम्पादन

प्रस्तुत कविता में कवि ने आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के बारे में बताया गया है।