नाम-सोनाली मंडल अनुक्रमांक- 436


फ़िल्म : दीवार निर्देशक : यश चोपड़ा निर्माता : गुलशन राय लेखक : सलीम खान, जावेद अख्तर संगीतकार : राहुल देव बर्मन संपादक : दी आर मंगेशकर प्राण मेहरा प्रदर्शन तिथि: 24 जनवरी 1975 मुख्य कलाकार : अमिताभ बच्चन (विजय वर्मा) शशि कपूर (रवि वर्मा)

-निरूपा रॉय (सुमित्रा देवी, रविव विजय की माँ)

- सत्येन्द्र कपूर (आनन्द वर्मा, रवि व विजय के पिता) - मनमोहन् कृष्णा (डीसीपी नारंगा) मदन पूरी (सामन्त) - सुधीर (जयचन्द) - जगदीश राज (जग्गी) - राज किशोर (दर्पण) युनुस पुरवेज (रहीम चाचा) मोहन शेरी (पीटर का आदमी) राजून वर्मा (लच्छ) कमल कपूर (आनन्द वर्मा का मिल मालिक)

समय सीमा : 176 मिनट

देश : भारत

भाषा : हिंदी

                     *दीवार की कहानी*

दीवार साल 1975 में रिलीज हुई एक बौलीवुड एक्शन ड्रामा फिल्म है जिसे यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था | ये फिल्म हिंदी सिनेमा की सफूल फिल्मों में से एक है। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन को 'एंग्री यंग मैन' के रूप में जाना जाने लगा। फिल्म की कहानी शुरू होती हैं आनंद वर्मा (सत्येन्द्र कपूर) जो मजदूर यूनियन का लीडर है। यह वह समय था जब सरकार मजदूर, अध्यापक, छात्र यूनियन के प्रति अपना खैया नर्म रखती थी। आनंद वर्मा फिल्म में गरीबों और मजदूरों के अधिकारी के लिए आवाज उठाते है। कंपनी के मालिका द्वारा होने वाले अत्याचारों के लिए वह लगातार संघर्ष करता है। उसके इस स्वभाव के लिए परिवार सहित जान से मारने की धमकी दी जाती है। परिवार के मारे जाने के डर से आनंद उनके सामने झूक जाता है और उनकी बात मान लेता है। इस बात से कर्मचारियों में भारी गुस्सा आ जाता है। मज़दूर आनंद को जान से मारने के लिए हमला करते हैं। दोनों तरफ डरा हुआ आनंद एक दिन घर छोड़कर भाग जाता है। आनंद की पत्नी सुमित्रा (निरुपमा रॉय) मजदूरों के गुस्से और मालिका के अत्याचार से ऊबकर अपने दो बच्चों को लेकर चली जाती है। गुस्से में मजदूर आनंद के बेटे विजय (अमिताभ बच्चन] पर 'मेरा बाप चोर है' लिख देते हैं। दूसरा छाँटा बेटा रवि (शशि कपूर) भी इनके साथ प्रताड़ित होता है। सुमित्रा अपने बच्चों के साथ मुंबई चली जाती है दोनों बच्चों को पालने के लिए वह मजदुरी करती हैं। दोनों बच्चों को पढ़ाती हैं। लेकिन माँ की स्थिति देखकर विजय भी मज़दूरी करने लगता है। वह पढ नहीं पाता है। अपने छोटे भाई रवि को पढ़ाकर बेहतर इंसान बानाने के लिए विजय दीनरात मेहनत कर ने लगता है पढ़-लिखकर रवि पुलिस बन जाता है और अपने साथ हुए अत्याचारों के कारण विजय सामाजिक सिध्दान्त सच्चाई से मेल नहीं कर पाता। विजय यह बात समझ चुका है कि जिसके पास बल और धन हैं उसी के सामने दुनिया झुकती हैं। विजय ने जब भी ईमानदारी और सच्चाई के साथ चलने की कोशिश की उसे दुख उठाना पड़ा इसलिए वह अपराध की दुनिया चुनता है। और उसके पास रुपया-पैसा, धन-दौलत, नाम सबकुछ होता है। विजय से विपरीत रवि को कानून पर पूरा विश्वास होता है। वह सच्चाई और ईमानदारी, में पूरा विश्वास रखता है। धन और नाम के लिए अपराध दुनिया चुनता है। फिल्म में बचपन से ही अमिताभ बच्चन अपनी माँ के साथ मंदिर जाना जीवन के कड़वे यथार्थ को वह इस कदर समझ चुका है कि भगवान से उसका भरोसा उठ चुका हैं। ईश्वर पर भरोसा नही करने वाला यह बच्चा बचपन से बूट पॉलिश करके परिवार का खर्चा चलाता है। वह बचपन से ही इतना स्वाभिमानी हैं कि पॉलिश करने के बाद जब एक सेठ उसे हाथ में पैसा न देकर जमीन पर फेंकता हैं वो कहता है -"मैं फेंके हुए पैसे नही उठाता।" सेठ बच्चे की इस खुद्दारी से बहुत प्रभावित होता हैं और अपने आदमी से बोलता है - "देखना ये लड़का एक दिन बहुत आगे जाएगा।" इस फिल्म के संवादों ने बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की। फिल्म के एक दृश्य में जब कुछ गुंडे विजय को पीटने पहुँचते हैं तो वह कहता है- "पीटर तेरे आदमी मुझे बाहर ढूंढ़ रहे है और मैं तुम्हारा यहाँ इंतज़ार कर रहा हैं ।

पूरे फिल्म में विजय सामंत और उसके समूह की हत्या करता है। रवि एक अंतिम संघर्ष में विजय के साथ मिलता हैं वह विजय से कहता है कि वह आत्मसमर्पण कर दें पर विजय मना कर देता है। और एक माँदर से भागते समय रवि द्वारा हाथ में गोली मार दी जाती है। विजय माँ से क्षमा माँगता है और तभी उसकी मृत्यु हो जाती है |