आदिकालीन एवं मध्यकालीन हिंदी कविता/सूरदास

सूरसुषमा

अबिगत गति कछु कहत न आवै।
ज्यौं गूँगै मीठे फल को रस अंतरगत ही भावै।
परम स्वाद सब ही सु निरंतर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कौ अगम अगोचर सो जानै जो पावै।
रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति बिनु निरालंब कित धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुनपद गावै॥१॥

व्याख्या

सोभित कर नवनीत लिए
घुटुरनि चलत रेनु-तन-मंडित मुख दधि लेप किए।
चारु कपोल लोल-लोचन छवि रोचन-तिलक दिए।
लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक-मधुहि पिए।
कठुला कंठ बज्र, केहरि-नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहि सुख का सत कल्प जिए॥१९॥

व्याख्या

संदेसो देवकी सौं कहियो।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की मया करत ही रहियौ।
जदपि टेव तुम जानति उनकी तऊ मोहिं कहि आवै।
प्रात उठत मेरे लाल लड़ैतेहिं माखन रोटी भावै।
उबटन तेल और तातौ जल देखत ही भजि जाते।
जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती क्रम-क्रम करिकै न्याते।
सर पथिक सुनि मोहिं रैनि-दिन बढ़यौ रहत उर सोच।
मेरौ अलक लड़ैतौ मोहन ह्वैहै करत संकोच॥९६॥

व्याख्या

बिनु गुपाल बैरिनि भई कुंजैं।
तब ये लता लगतिं अति सीतल,
अब भइँ बिषम ज्वाल की पुंजैं।
बृथा बहति जमुना, खग बोलत,
बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं।
पवन, पानि, घनसार, सजीवन,
दधिसुत-किरन भानु भइ भुँजैं।
ए ऊधौ! कहियो माधौ सौं,
मदन मारि कीन्ही हम लुंजैं।
सूरदास प्रभु कौ मग जोवत,
अँखियाँ भइँ बरन ज्यौं गुंजै॥१००॥

व्याख्या

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
हंससुता की सुंदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीं॥
वै सुरभी, वै बच्छ दोहनी, खरकि दुहावन जाहीं।
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल नाचत गहि गहि बाहीं॥
यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुकताहल जाहीं।
जबहिं सुरति आवति वा सुख की जिय उमगत ततु नाहीं॥
अनगन भाँति करी बहु लीला जसुदा नंद निबाहीं।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै यह कहि कहि पछिताहीं॥१५१॥

व्याख्या

संदर्भ